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बढ़ते वजन का घुटनों पर कुप्रभाव

अधिक वजन होने से व्यक्ति में आॅस्टियोआर्थराइटिस के पनपने का खतरा बढ़ जाता है। यह जोड़ों को लगातार कमजोर कर देने वाला ऐसा रोग है जिसके चलते चलना-फिरना भी मुहाल हो जाता है और भयंकर दर्द उभर आता है। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती जाती है, घुटनों सहित रोगी के सभी जोड़ों के कमजोर पड़ते जाने के लक्षण नजर आने लगते हैं। यदि व्यक्ति का वजन बहुत ही ज्यादा हो जाता है तो जोड़ों की यह दुर्बलता कई गुना बढ़ सकती है। अव्यवस्थित लाइफ स्टाइल के कारण बहुत सारे लोगों का वजन बढ़ता जाता है, इस वजह से युवाओं में भी जोड़ों की समस्या और घुटनों का दर्द विकसित होने लगता है।

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आॅस्टियोपोरोसिस जोड़ों को कमजोर कर देने वाला रोग है जिसमें मुख्य रूप से कार्टिलेज के क्षतिग्रस्त होने के कारण जोड़ों की स्थिति कमजोर होती जाती है और उसमें अकड़न, जाम या दर्द भी उभर सकता है। हड्डी के पास का कार्टिलेज जब घिस जाता है तो जोड़ की हड्डी अत्यंत भंगुर हो जाती है, इसलिए घुटना प्रत्यारोपित करने की सख्त जरूरत भी उत्पन्न हो सकती है। वहीं, अत्यधिक वजन वाले व्यक्ति में आॅस्टियोआर्थराइटिस होने की संभावना बढ़ जाती है। हालांकि इस संबंध का सही कारण स्पष्ट नहीं है लेकिन समझा जाता है कि अधिक वजन से उनके घुटनों के जोड़ों पर अधिक दबाव पड़ता है और इसलिए उनके जोड़ों के कमजोर होने की दर भी अधिक रहती है।

घुटने के जोड़ को मोबाइल ज्वाइंट भी कहा जाता है जो पैर को जांघ से जोड़ता है और व्यक्ति को चलने-फिरने, दौड़ने, पैर मोड़ने तथा बैठने में मदद करता है। घुटने के जोड़ की हड्डी को कार्टिलेज और लिगामेंट(अस्थिबंध) से मजबूती मिलती है। इससे हड्डी सुरक्षित रहती है तथा हड्डियां आपस में घिसने के कारण उससे होने वाली फ्रिक्शन इंजरी से बची रहती हैं।
घुटने की सेहत को बनाए रखने के लिए कार्टिलेज और लिगामेंट को क्षतिग्रस्त होने से बचाना महत्त्वपूर्ण है। घुटने को जब अत्यधिक वजन सहना पड़ जाता है तो कार्टिलेज में घर्षण और नुकसान अधिक होने लगता है। शरीर का वजन अगर एक किलो भी बढ़ता है तो घुटने पर इसका बोझ कई गुना बढ़ जाता है। शरीर का एक किलो वजन घटने पर किए गए शोध में पाया गया कि घुटने के जोड़ पर बोझ या दबाव 4 किलो तक घट गया।

घुटनों का दर्द यानी आॅस्टियोपोरोसिस के कई कारण हो सकते हैं जिनमें हड्डियों के अत्यंत पतले होने और कमजोर पड़ने, चोट लगने, बढ़ती उम्र के साथ हड्डियों में घिसाव और आॅस्टियोआर्थराइटिस मुख्य हैं। वैसे तो जोड़ों के दर्द के ज्यादातर मामले ढलती उम्र के डिसआॅर्डर से जुड़े होते हैं लेकिन आजकल युवाओं में आॅस्टियोआर्थराइटिस के बढ़ते मामले इस बात का संकेत हैं कि हमारी युवा पीढ़ी ने जीवन की कुछ महत्त्वपूर्ण गतिविधियों को दरकिनार कर दिया है, जैसे व्यायाम, खेलकूद तथा सही खानपान आदि।

दरअसल, कामकाजी युवा गतिहीन लाइफस्टाइल अपनाने लगे हैं। वे अपने कार्यस्थल पर एक ही मुद्रा में, ज्यादातर गलत मुद्रा में, ही घंटों बैठे रहते हैं और शरीर के जोड़ों को गतिशील बनाए रखने का महत्त्व नहीं समझते। अब टहलना या साइकिल चलाना उनके चलन में नहीं रह गया है तथा कार्यस्थल से घर लौटने के बाद काफी वक्त वे टेलीविजन देखने में गुजारते हैं। परिणामस्वरूप, देश के शहरी हिस्से में मोटापे की समस्या महामारी की तरह फैल रही है। कार्डियोवैस्क्यूलर बीमारियां तथा डायबिटीज जैसी लाइफस्टाइल से जुड़ी कई बीमारियों का कारण बनने वाली मोटापे की समस्या से बहुत सारे लोगों को जोड़ों संबंधी तकलीफ या कम उम्र में ही आॅस्टियोआर्थराइटिस की बीमारी भी उभर आती है।

दरसअल, शरीर का अत्यधिक वजन घुटनों पर अतिरिक्त दबाव डालता है जो घुटनों के लिए न्याय संगत नहीं होता। यह ठीक वैसा ही है कि 10 किलो वजन उठाने की क्षमता रखने वाले किसी व्यक्ति पर 20 किलो का वजन लाद दिया जाए। कुछ समय तक तो व्यक्ति इस अतिरिक्त वजन को ढोते रख सकता है और अपनी गतिविधियां जारी रख सकता है लेकिन कुछ समय बाद वह किसी इंजरी या मोच का शिकार हो सकता है या फिर गिर भी सकता है।

जब हम अपने शरीर पर क्षमता से अधिक वजन लाद देते हैं तो यह अत्याचार अन्य रूपों में स्पष्ट दिखने लगता है। सबसे पहले घुटनों में दर्द से यह स्पष्ट होता है कि आप अपने घुटनों के साथ उचित बरताव नहीं कर रहे हैं। यदि किसी खास बिंदु से घुटने कमजोर पड़ने लगते हैं तो जॉइंट रिप्लेसमैंट ही एकमात्र विकल्प रह जाता है।

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