आए सतगुरु सृजनहार -105वां पावन एमएसजी अवतार दिवस विशेष

जल में तरंग दाता तू ही तू,
फूलों में सुगंध दाता तू ही तू,
धरती-आसमां में तू ही तू,
खण्डों-ब्रह्मण्डों में भी तू ही तू…।

खण्ड-ब्रह्मण्डों के मालिक परमपिता परमात्मा ने यह सृष्टि साजी है। सृष्टि की संभाल व जीवों के कल्याण के लिए वो खुद संतों के रूप में सृष्टि पर अवतार धारण करता है। संत परमपिता परमात्मा के सब गुणों से भरपूर होते हैं। वो दुनिया के भूले-भटके जीवों को सच्चा मार्ग दर्शा कर कुल मालिक परमपिता परमात्मा से जोड़ते हैं। उनका हर वचन व हर कर्म मानवता, इन्सानियत के कल्याण के लिए ही होता है।

उनके पवित्र जीवन में परमपिता परमात्मा का नूर झलकता है। संत सच का ऐसा प्रचार करते हैं कि अज्ञानता के अंधेरे में फंसी जनता को सुख व सच का रास्ता नजर आता है। जो जीव संतों का अनुसरण करते हैं, उनके बताए मार्ग पर चलते हैं, तकदीरें बदल जाया करती हैं। सच्चे संत किसी एक देश का ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व व पूरी सृष्टि का उद्धार करते हैं और ये ही उनका उद्देश्य रहता है। ऐसे समय में पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज ने नशे और बुराइयों में फंसे और परमपिता परमात्मा से गुमराह हुए करोड़ों जीवों को राम-नाम, गुरुमंत्र रूपी पारस देकर उन्हें लोहे से कंचन बनाया व बना रहे हैं।

शुभ आगमन:

पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज गांव श्री जलालआणा साहिब तहसील डबवाली जिला सरसा के रहने वाले थे। आप जी ने आज ही के दिन 25 जनवरी 1919 को पूजनीय माता आसकौर जी की पवित्र कोख से पूजनीय पिता सरदार वरियाम सिंह जी के घर इकलौती संतान के रूप में अवतार धारण किया। पूजनीय पिता सरदार वरियाम सिंह जी सिद्धू गांव के जैलदार और बहुत बड़ी जमीन-जायदाद के मालिक थे। घर में किसी चीज की कमी नहीं थी।

हर दुनियावी सुख-सुविधा घर में उपलब्ध थी। लेकिन संतान की कमी उन्हें हर समय सताय रहती थी। पूजनीय माता-पिता धार्मिक विचारों के धनी थे। गरीबों, जरूरतमंदों की मदद करना भी उनके नेक, पवित्र स्वभाव में शामिल था। पूजनीय माता-पिता जी की मुलाकात परमपिता परमात्मा के एक सच्चे फकीर से हुई। वो फकीर-बाबा जब तक गांव श्री जलालआणा साहिब में रहे, भोजन-पानी पूजनीय माता-पिता जी के यहां ही किया करते थे। वो फकीर-बाबा पूजनीय माता-पिता जी के नेक दिल, साधु-स्वभाव, सच्चाई व ईमानदारी तथा सेवा-भावना से बहुत खुश थे।

फकीर-बाबा ने पूजनीय माता-पिता जी से कहा कि भाई भगतो! आपकी सेवा परमेश्वर को मंजूर है। परमेश्वर आपकी मनोकामना जरूर पूरी करेंगे। आपके घर कोई महापुरुष ही जन्म लेगा। और इस तरह परमपिता परमात्मा की कृपा और उस फकीर-बाबा की दुआ से पूजनीय माता-पिता जी के यहां उनके विवाह के लगभग 18 वर्ष के बाद पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज शहनशाही खानदान के वारिस के रूप में अवतार धारण कर सृष्टि पर पधारे। पुत्र-रत्न भी ऐसा कि प्रत्यक्ष परमेश्वर का नूर। पूजनीय पिता सरदार वरियाम सिंह जी ने पूरे गांव में गुड़-शक्कर अर्थात् प्रचलित रीति-रिवाज के अनुसार मिठाइयां थाल भर-भरकर बांट कर खुशियां मनाई। जरूरतमंदों, गरीबों को अन्न-वस्त्र भी खूब बांटे गए।

लंबी यात्रा करके वो फकीर-बाबा भी पूजनीय माता-पिता जी को बधाई देने पहुंचे। उन्होंने पूजनीय जैलदार साहिब सरदार वरियाम सिंह जी को बधाई देते हुए कहा कि आपका बेटा एक अद्भुत शक्ति है। इसे आम बच्चा न समझना। ये खुद परमेश्वर स्वरूप है। ये आपके यहां करीब चालीस वर्ष तक ही रहेंगे और उसके बाद जिस उद्देश्य के लिए ये आए हैं, सृष्टि उद्धार के अपने उसी मकसद के लिए उन्हीं के पास चले जाएंगे, जिन्होंने इन्हें आपके यहां आपकी संतान के रूप में भेजा है।

नूरानी नूर का भंडार:

पूजनीय परमपिता जी स्वयं नूरी नूर का भण्डार थे। शहनशाही नूरी बाल-मुखड़े को जो भी देख लेता, बस देखता ही रह जाता। नूरी मुखड़े से नजर हटाने को किसी का दिल ना करता। एक झींवर भाई रोजाना घर में पानी भरने आया करता था। एक दिन पूजनीय माता जी ने उस भाई को अपने लाल के पालणे के पास खड़े देखकर कहा कि तुम इतनी देर यहां पर खड़े होकर क्या देखते हो? उस भाई ने नम्रतापूर्वक उत्तर दिया कि माता जी, आपके लाल में मुझे हमारे ईष्ट-देव के दर्श-दीदार हो रहे हैं। मैं किसी गलत भावना से नहीं, श्रद्धापूर्वक अपने परमेश्वर के दर्शन कर रहा था।

‘जा भाई, अब अपना काम करले।’ पूजनीय माता जी ने एक काला टीका अपने लाडले के चेहरे के साइड में लगा दिया कि मेरे लाल को किसी की बुरी नजर न लग जाए। ये मां की ममता है। और उस मां की जिनके घर स्वयं परमेश्वर स्वरूप उनका लाल आया है। पूजनीय माता-पिता जी ने अपने लाडले का नाम सरदार हरबंस सिंह जी रखा, लेकिन पूजनीय बेपरवाह सार्इं शाह मस्ताना जी महाराज (डेरा सच्चा सौदा के संस्थापक) के मिलाप के बाद उन्होंने आप जी का नाम बदलकर सरदार सतनाम सिंह जी (पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज) रख दिया।

आप जी अभी बाल्यावस्था में ही थे कि आप जी के पूजनीय पिता सरदार वरियाम सिंह जी परमपिता परमात्मा में विलीन हो गए। आप जी का बचपन पूजनीय माता जी और आप जी के पूजनीय मामा सरदार वीर सिंह जी (डेरा सच्चा सौदा में बतौर जीएसएस (सतब्रह्मचारी) रहते हुए ओड़ निभा गए हैं) की देख-रेख में बीता। बचपन में आप जी के खेल (बाल-क्रीड़ाएं) भी ईश्वरीय ही थे। आप जी की बोलवाणी, हावभाव, चाल-ढाल, खेल-कूद आदि हर क्रिया और हर कार्य में ईश्वरीय अनुभूति झलकती थी। ये सब देखकर हर व्यक्ति यही कहता कि ‘जैलदारां दा मुंडा कोई खास हस्ती हैं।’ दिव्य बाल्यकाल से ज्यों-ज्यों आप जी बड़े होते गए आप जी के दिव्य प्रकाश का दायरा भी बड़ा होता गया।

कभी कोई निराश नहीं लौटा:

आप जी के दर से कभी कोई निराश नहीं लौटा था। एक बार एक जमींदार भाई आप जी के यहां मदद की इच्छा लेकर आए। जमीन तो उनकी बेशक कम थी, कृषि कार्यों के लिए ऊंटनी (बोती) लेने की उनकी इच्छा थी। लेकिन आर्थिक मंदहाली के कारण उनसे संभव नहीं हो पा रहा था। वह शख्स पूजनीय माता जी के पास मदद की उम्मीद लेकर आया। पूजनीय शहनशाह परमपिता जी घर पर ही पूजनीय माता जी के पास बैठे हुए थे। उन दिनों में सौ-पचास में अच्छी ऊंटनी मिल जाया करती थी।

पूजनीय परमपिता जी ने अपनी पूजनीय माता जी से सौ रुपए दिलवा दिए कि जब भी संभव हो पाया तब लौटा देना। मन-इच्छित मदद पाकर वह शख्स बाग-बाग हो गया। एक-दो साल गुजर गए, परंतु वह रुपए लौटा नहीं पाया। इस दौरान उनके घर बच्चा पैदा हो गया। अब घर में खर्चा और भी बढ़ गया। उनके घर में लवेरी भैंस (एक भैंस ब्याई) थी। घर में दूध-घी की तो अब सख्त जरूरत थी, लेकिन दूसरी ओर सिर पर कर्ज का बोझ कब और कैसे उतरे! पूजनीय माता जी से उधार लिए पैसे कब चुका कर अपने-आपको कर्ज मुक्त करे, वह रात-दिन इसी चिंता में रहता था।

और कोई चारा चलते न देखकर एक दिन उसने अपनी वो भैंस पूजनीय माता जी के घर लाकर खूंटे पर बांध दी। हालांकि पूजनीय माता जी ने बहुत मना किया, लेकिन उसने अपनी बेबसी जाहिर करते हुए विनती की कि माता जी, पैसा घर में खर्च हो गया तथा और बन नहीं पा रहा है, इसलिए यह भैंस देकर सिर पर चढ़े कर्ज को चुकता कर रहा हूं। पूजनीय परमपिता जी उस समय घर पर नहीं थे। घर आने पर पता चला तो तुरंत उसे बुलवाकर समझाया कि तूने यह क्या किया! घर में तुम्हारी पत्नी को दूध-घी की सख्त जरूरत है, छोटा बच्चा है। कोई बात नहीं, हमारे पैसे नहीं आएंगे, तो कोई चिंता वाली बात नहीं है, लेकिन ये हम नहीं सह सकेंगे। तुम्हारा बच्चा है, क्या हमारा कुछ नहीं लगता? इस प्रकार पूजनीय परमपिता जी ने उस भाई का मनोबल बढ़ाया और उसे अपनी भैंस को खोलकर ले जाने को कहा तथा और भी मदद करने का भरोसा दिया।

इसी प्रकार एक बार एक अन्य परिवार में बेटी की शादी थी। परिवार अपनी गरीबी के कारण बहुत चिंतित था। विवाह का दिन बिलकुल नजदीक था। कहीं से भी इंतजाम नहीं हो पा रहा था। वह परिवार माता जी के पास मदद के लिए आया कि शादी का दिन नजदीक है और घर में कुछ भी प्रबंध नहीं हो पाया है। वह कुछ रुपयों की मदद के लिए आए थे। पूजनीय परमपिता जी उस समय बाल्यावस्था में पूजनीय माता जी के पास ही बैठे हुए थे। पूजनीय माता जी अभी कुछ कहते, आप जी ने पूजनीय माता जी से कहा कि जितने रुपए ये मांग रहे हैं, उससे ज्यादा (सौ-दो सौ) इन्हें दे दो। कारज पूरा होने पर अगर बच गए तो वापिस दे जाएंगे और अगर नहीं भी लौटाएंगे तो माता जी समझ लेना कि यह मेरी बहन की शादी है। आप जी की इस दयालुता व हमदर्दी से जो उन्हें सुकून, जो उन्हें खुशी मिली वो ही जानते हैं।

भगता! तुर-फिर के चर लेया कर:

इन्सान तो इन्सान, जानवर भी आप जी की दयालुता के कायल (आभारी) थे। पढ़ाई पूरी करने के बाद आप जी कृषि-कार्यों में लग गए। उन दिनों खेतों में चने की फसल लहलहा रही थी। एक झोटा आता और आप जी की मौजूदगी में फसल चरता और पेट भरने के बाद आप जी के पास ही आकर बैठ जाया करता था। लेकिन आप जी उसे न हटाते कि जीव है, पेट तो इसने भरना ही है। यह बात पूजनीय माता जी के पास भी पहुंच गई। पूजनीय माता जी के कहने पर आप जी ने अगले दिन उस झोटे की पीठ पर हाथ फेरा, उसे प्यार-दुलार दिया और कहा कि भगता, अब अपनी शिकायत हो गई है। अब तू हिस्से आउंदा तुर-फिर के चर लेया कर। आदरणीय गांव के लोग इस बात के गवाह हैं कि उस दिन के बाद जब तक वह झोटा जीवित रहा, कभी एक खेत में खड़े होकर नहीं चरा था। चलते-चलते ही चारा चर लिया करता था, अपना पेट भर लिया करता था।

सामाजिक कार्यों में रूचि, श्री गुरुद्वारा साहिब का निर्माण:

पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ-साथ आप जी सामाजिक कार्यों में भी बढ़-चढ़कर सहयोग करते। गांव के बीचों-बीच श्री गुरुद्वारा साहिब की स्थापना का कार्य पूजनीय माता जी की प्रेरणा से आप जी ने अपनी हक-हलाल की कमाई से शुरू करवाया और अपनी निजी दिलचस्पी से यह शुभ कार्य पूरा करवाया। इसके अतिरिक्त गांव का हर सांझा कार्य जैसे स्कूल, अस्पताल, पशुओं की डिस्पेंसरी, सड़क, बिजली, पानी इत्यादि मूलभूत आवश्यकताओं के लिए आप जी ने दिन-रात एक किया।

सच की तलाश:

सच की तलाश आप जी को बचपन से ही थी। परमात्मा (सच) की तलाश के लिए आप जी कई महात्माओं से मिले, उनके आचार-व्यवहार को भी परखा, परंतु कहीं से भी तसल्ली नहीं हुई थी। लेकिन अब वह भी समय आ गया था, जोकि उस फकीर बाबा ने आप जी के पूज्य माता-पिता जी से पहले ही कह दिया था कि आपका बेटा ईश्वर की दिव्य ज्योति है। ये आपके पास तो करीब चालीस वर्ष तक ही रहेंगे और फिर अपने असल उद्देश्य (मानवता व समाज उद्धार) के लिए चले जाएंगे। इसी कड़ी के तहत सच को प्राप्त करने के लिए आप जी डेरा सच्चा सौदा के संस्थापक पूजनीय बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज के सत्संग में डेरा सच्चा सौदा दरबार में पधारे।

वर्णनीय है कि बेपरवाह सार्इं मस्ताना जी महाराज के अजब-गजब रूहानी खेलों के बारे में आप जी काफी-कुछ पहले ही सुन व जान चुके थे। आप जी ने पावन हजूरी में बैठकर बेपरवाही वचनों को सुना और बेपरवाही नूरानी स्वरूप को करीब से निहारा। आप जी की अंदर-बाहर की पूरी तसल्ली, पूर्ण संतुष्टि हो गई। उसी दिन से ही आप जी ने अपने-आपको पूर्ण तौर पर पूजनीय बेपरवाह जी के प्रति अर्पण कर दिया। जहां भी पूजनीय बेपरवाह जी का सत्संग होता, आप जी अपने साथियों सहित हर सत्संग में पहुंचते।

इस दौरान आप जी की प्रेरणा से आप जी के साथ वालों ने पूजनीय सार्इं जी से नाम-शब्द, गुरुमंत्र ले लिया था। आप जी ने भी नाम-शब्द लेने की कई बार कोशिश की, लेकिन पूजनीय बेपरवाह जी आप जी को हर बार यह कहकर नाम लेने वाले अधिकारी जीवों में से उठा दिया करते कि ‘अभी आपको नाम-शब्द लेने का हुक्म नहीं हुआ है और जब हुक्म हुआ तो आपको आवाज देकर, आप जी को बुलाकर नाम देंगे, आप सत्संग करते रहो। आपको काल नहीं बुलाएगा। इस प्रकार आप जी लगभग तीन साल तक बेपरवाह जी का सत्संग सुनते रहे।’

ये रब्ब की पैड़ है:

एक बार सार्इं मस्ताना जी महाराज ने एक पैड़ (पांव के निशान) पर अपनी डंगोरी से घेरा बनाकर अपने साथ चल रहे सेवादारों से कहा, ‘आओ भई, तुम्हें रब्ब की पैड़ दिखाएं।’ उन दिनों पूजनीय सार्इं जी सत्संग के लिए गदराना गांव में पधारे हुए थे। उन सेवादारों में गदराना निवासी एक भाई भी था। वह जानता था कि ये पांव का निशान पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज का है। उस भाई ने कहा कि सार्इं जी, यह पैड़ (पांव का निशान) तो श्री जलालआणा साहिब के जैलदार सरदार हरबंस सिंह जी (पूजनीय परमपिता जी का बचपन का नाम) की है। इस पर सार्इं मस्ताना जी महाराज ने अपनी डंगोरी को जमीन पर ठोक कर कहा, ‘असीं किसी जैलदार को नहीं जानते। असीं तो ये जानते हैं कि ये पैड़ रब्ब की है। इत्थों रब्ब लंघेया है।’

जिंदाराम (रूहानियत) का लीडर:

पूजनीय सार्इं शाह मस्ताना जी महाराज ने 14 मार्च 1954 को घूकांवाली दरबार में सत्संग फरमाया। सत्संग के बाद पूजनीय सार्इं जी ने आप जी को आवाज लगाई, बुलाकर फरमाया कि ‘आज आप जी को नाम-शब्द लेने का हुक्म हुआ है। आप अंदर चलकर हमारे मूढे के पास बैठो, असीं भी अभी आ रहे हैं।’ आप जी ने अंदर जाकर देखा, नाम लेने वाले काफी जीव थे और मूढे के पास जगह भी खाली नहीं थी, तो आप जी नाम-शब्द लेने वालों में पीछे ही बैठ गए। पूजनीय सार्इं जी जब अंदर आए, तो आप जी को बुलाकर अपने पास बिठाया।

पूजनीय बेपरवाह सार्इं जी ने फरमाया कि ‘आपको इसलिए पास बिठाकर नाम देते हैं कि आपसे कोई काम लेना है। आपको जिंदाराम (रूहानियत) का लीडर बनाएंगे जो दुनिया को नाम जपाएगा।’ इस प्रकार पूजनीय बेपरवाह सार्इं मस्ताना जी महाराज ने घूकांवाली में नाम-शब्द के बहाने मालिक की असल सच्चाई, खुदाई स्वरूप को जाहिर किया कि आप जी (पूजनीय परमपिता जी) स्वयं कुल मालिक खुद-खुदा स्वरूप जीव-सृष्टि के उद्धार के लिए मानवता का सहारा बनकर धरत पर पधारे हैं।

कठिन परीक्षा:

पूजनीय परमपिता जी जब से पूजनीय सार्इं मस्ताना जी महाराज की पावन दृष्टि में आए, उसी दिन से ही बेपरवाह सार्इं जी आप जी की परीक्षा पर परीक्षा भी साथ-साथ लेते रहे। इन्हीं रूहानी परीक्षाओं के चलते एक बार पूजनीय सार्इं जी लगातार 18 दिन तक श्री जलालआणा साहिब दरबार में रहे। अपने इस लम्बे प्रवास के दौरान बेपरवाह जी ने कभी गदराना का डेरा गिरवा दिया और कभी चोरमार का डेरा गिरवा कर उसका मलबा लक्कड़-बाला, शतीर, लोहे के गार्डर, जंगले, दरवाजे इत्यादि सामान भी श्री जलालआणा साहिब डेरे में इकट्ठा करने का हुक्म फरमाया। पूजनीय बेपरवाह जी ने आप जी की ड्यूटी गदराना के डेरे का मलबा ढोने की लगाई हुई थी।

उधर गिराए गए डेरों का मलबा ढोया जा रहा था, तो इधर इकट्ठा किया गया सामान (मलबा) घूकांवाली के सेवादारों को बुलवा कर घूकांवाली डेरे में भिजवा दिया। आप जी अभी गदराना डेरे का मलबा ढोने में लगे हुए थे कि इसी दौरान पूजनीय सार्इं जी ने गदराना का डेरा फिर से बनाने की वहां के सेवादारों को मंजूरी दे दी। कुल मालिक का ये अजब-गजब खेल आम इन्सान की समझ से बाहर की बात थी। कुल मालिक का यह अलौकिक खेल वास्तव में आप जी की परीक्षाओं में शुमार था, आप जी की परीक्षा थी। लेकिन आप जी तो पहले दिन से ही अपने आपको पूर्ण तौर पर अपने पीरो-मुर्शिद को अर्पण कर चुके थे। आप जी ने अपने मुर्शिद प्यारे के हर हुक्म को सत्यवचन कहकर माना। इस प्रकार इन परीक्षाओं की लड़ी के द्वारा पूजनीय सार्इं जी ने आप जी को हर तरह से योग्य पाया और एक दिन इस वास्तविकता को सेवादारों में प्रकट करते हुए फरमाया, ‘असीं सरदार हरबंस सिंह जी का इम्तिहान लिया, पर उन्हें पता नहीं चलने दिया।’

सख्त से सख्त परीक्षा हवेली-मकान तोड़-गिराने का आदेश:

और फिर एक दिन पूजनीय बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज ने आप जी के लिए अपनी हवेली, अपने मकान को तोड़ने और सारा सामान छोटी से छोटी चीज यानि सूई से लेकर बड़ी से बड़ी चीज तक दरबार से लाने का आदेश फरमाया। बाहरी निगाह, दुनियादारी के हिसाब से बेशक यह बहुत ही सख्त आदेश, सख्त इम्तिहान था, कड़ी से कड़ी परीक्षा थी, लेकिन आप जी ने यह बेपरवाही आदेश पाकर अपने रहबर खुद-खुदा सार्इं मस्ताना जी महाराज के इस आदेश को भी हृदय से लगाया और बेपरवाही वचनों पर फूल चढ़ाते हुए अपनी इतनी बड़ी हवेली को स्वयं अपने हाथों से तोड़ दिया, हवेली की र्इंट-र्इंट कर दी तथा बेपरवाही हुक्मानुसार हवेली का सारा मलबा (छोटी कंकर तक) और घर का सारा सामान ट्रकों, ट्रैक्टर-ट्रालियों में भरकर अपने प्यारे खुदा की पावन हुजूरी में डेरा सच्चा सौदा सरसा में लाकर रख दिया।

दरबार में महावारी सत्संग का दिन था। शनिवार आधी रात को पूजनीय सार्इं जी तेरावास से बाहर आए और सामान का इतना बड़ा ढेर दरबार में देखकर हुक्म फरमाया, ‘ये सामान किसका है? अभी बाहर निकालो। कोई हम से आकर पूछे तो असीं क्या जवाब देंगे? जिसका भी ये सामान है, अपने सामान की आप ही रखवाली करे।’ सख्त सर्दी का मौसम था। ऊपर से बूंदाबांदी और ठंडी तेज हवा, शीत लहर भी चल रही थी। आप जी अपने प्यारे सतगुरु-खुदा के हुक्म में रात-भर खुले आसमान में अपने सामान के पास बैठकर बेपरवाही अलौकिक खेल का लुत्फ लेते रहे। सुबह होते ही सारा सामान एक-एक करके आई हुई संगत में अपने हाथों से बांट दिया और अपने मुर्शिद प्यारे की पावन हजूरी में आकर बैठ गए और शहनशाही खुशियों को हासिल किया।

गुरगद्दी बख्शिश: सतनाम कुल मालिक बनाया:

28 फरवरी 1960 का दिन डेरा सच्चा सौदा के इतिहास में सुनहरी अक्षरों में लिखा हुआ है। इस दिन पूजनीय बेपरवाह सार्इं शाह मस्ताना जी महाराज के हुक्मानुसार आप जी को सिर से पैरों तक नए-नए नोटों के लंबे-लंबे हार पहनाए गए। आप जी को एक बहुत ही सुंदर सजी जीप में सवार करके पूरे सरसा शहर में शहनशाही जुलूस के रूप में घुमाया गया। इस जुलूस में दरबार का बच्चा-बच्चा (सब छोटे-बड़े) शामिल था, ताकि दुनिया को भी पता चले कि पूजनीय सार्इं जी ने श्री जलालआणा साहिब के जैलदार सरदार हरबंस सिंह जी (पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज) को अपना उत्तराधिकारी बना लिया है।

शहनशाही जुलूस शाम को वापिस अभी दरबार के मुख्य गेट पर ही पहुंचा था कि पूजनीय सार्इं जी ने स्वयं आप जी का स्वागत किया। पूजनीय बेपरवाह जी ने सरेआम वहीं खड़े होकर साध-संगत में वचन फरमाया, ‘आज से सरदार हरबंस सिंह जी को सतनाम, कुल मालिक, आत्मा से परमात्मा करते हैं।’ आप जी ने फरमाया, ‘ये वो ही सतनाम है, जिसके सहारे सारे खण्ड-ब्रह्मण्ड खड़े हैं।’ पूजनीय सार्इं जी ने आप जी को स्वयं अपने हाथों से तीन मंजिला अनामी गुफा, तेरावास में विराजमान किया, जोकि आप जी की हवेली के सामान (लक्कड़-बाला, शतीर, गार्डर, र्इंटों आदि) से विशेष तौर पर आपजी के लिए तैयार की गई थी।

शुभ दिन 28 फरवरी 1960:

इधर दरबार में शाही स्टेज को विशेष रूप से सजाया गया था। पूजनीय सार्इं जी शाही स्टेज पर विराजमान हुए और अपने सेवादारों को आप जी को बुलाकर लाने का हुक्म फरमाया। हुक्म पाकर एक-दो सेवादार तेरावास की ओर दौड़े। पूजनीय सार्इं जी ने उन्हें रोका, ‘भई ऐसे नहीं! दस सेवादार पंचायत रूप में जाएं और सरदार सतनाम सिंह जी को पूरे सम्मान के साथ बुलाकर लाएं।’ इस प्रकार पूजनीय सार्इं जी ने आप जी को बड़े प्यार व सम्मान से अपने साथ शाही स्टेज पर विराजमान किया। पूजनीय सार्इं जी के इस नूरानी खेल को साध-संगत बड़े आदर-भाव से निहार रही थी।

पूजनीय सार्इं जी ने साध-संगत में फरमाया, ‘आज से असीं सरदार सतनाम सिंह जी (पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज) को अपना स्वरूप बना लिया है।’ बेपरवाह जी ने फरमाया, ‘ये वो ही सतनाम है, जिसे दुनिया जपदी-जपदी मर गई। असीं इन्हें अपने दाता सावण शाह के हुक्म से अर्शो से लाकर तुम्हारे सामने बिठा दिया है। जो इनके पीठ पीछे से भी दर्शन कर लेगा, वो नर्कों में नहीं जाएगा। उसका भी उद्धार ये अपनी रहमत से करेंगे।’ इस प्रकार 28 फरवरी 1960 को पूजनीय बेपरवाह जी ने पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज को अपना स्वरूप (अपना उत्तराधिकारी) बनाकर डेरा सच्चा सौदा की गुरगद्दी पर बतौर दूसरे पातशाह विराजमान किया।

डेरा सच्चा सौदा में बतौर दूसरी पातशाही:

पूजनीय बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज ने पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज को 28 फरवरी 1960 को डेरा सच्चा सौदा में बतौर दूसरी पातशाही विराजमान किया। आप जी ने 30-31 वर्ष तक डेरा सच्चा सौदा रूपी फुलवाड़ी को अपने अंदर-हृदय का बेइंतहा प्यार बख्शा और इस रूहानी फुलवाड़ी को अपने रहमो-करम से खूब महकाया। आप जी के अपार रहमो-करम के अमृत का पान करके साध-संगत तन-मन-धन से डेरा सच्चा सौदा की पावन शिक्षाओं को समर्पित है। जो साध-संगत पहले हजारों में थी, आप जी के अपार प्यार को पाकर हजारों से बढ़कर लाखों की संख्या में डेरा सच्चा सौदा में आने लगी, बल्कि अब तो करोड़ों की संख्या में एमएसजी भण्डारों पर पहुंचती है।

आप जी ने पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में दिन-रात एक करते हुए गांव-गांव, शहर-शहर और कस्बों में हजारों सत्संग लगाए। आप जी की रहमत से राम-नाम का जिक्र घर-घर में होने लगा। आप जी ने 11 लाख से ज्यादा लोगों को नशों आदि बुराइयों से मुक्त कर परमपिता परमात्मा कुल मालिक के दर्श-दीदार के काबिल बनाया। जो लोग नशों आदि बुरी आदतों के कारण गंदगी के घर बन चुके थे, आप जी की प्रेरणा से आज वों दूसरों के लिए प्रेरणा बने हुए हैं। साध-संगत के प्रति आप जी के परोपकार अवर्णनीय है। स्वस्थ मानवीय समाज की स्थापना के लिए आप जी का महान योगदान कहने-सुनने से परे है। आप जी ने डेरा सच्चा सौदा में बिना दान-दहेज की शादी-विवाह की स्वस्थ परम्परा चलाई, जो आज भी ज्यों की त्यों चल रही है।

आप जी ने साध-संगत को रूढ़िवादी कुरीतियों, पाखण्डों, लोक-दिखावे के रस्मो-रिवाज, बुजुर्गों की मृत्यु व बच्चों के जन्म पर फिजूलखर्ची के विरुद्ध जागरूक किया। छोटा परिवार, सुखी परिवार यानि परिवार को सीमित रखने, बच्चों को अच्छी शिक्षा, अच्छे संस्कार देना, उनकी अच्छे से संभाल करना आदि आप जी की पावन शिक्षाओं को डेरा सच्चा सौदा की साध-संगत अपनाकर अपने व अपने परिवार के उज्जवल भविष्य के प्रति कर्मशील है। देश व समाज के प्रति आप जी का यह महान करम है।

अपार रहमो-करम जो जाए न बताया:

पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज ने 23 सितम्बर 1990 को पूज्य मौजूदा गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां को अपने अपार रहमो-करम से अपना उत्तराधिकारी घोषित कर स्वयं डेरा सच्चा सौदा में गुरगद्दी पर विराजमान किया। आप जी का ये अपार रहमो-करम साध-संगत कभी भुला नहीं सकती। आप जी की पावन शिक्षाओं का प्रसार करते हुए पूज्य मौजूदा गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां (एमएसजी) ने रूहानियत के साथ-साथ मानवता भलाई के कार्यों से जहां डेरा सच्चा सौदा को बुलंदियों पर पहुंचाया, वहीं डेरा सच्चा सौदा के सेवादारों व साध-संगत के हौंसलों को भी अच्छे, नेकी के कार्य, दीन-दुखियों की मदद करने के लिए और बुलंद किया।

पूज्य गुरु जी की पावन परमार्थी शिक्षाओं को आज देश व दुनिया के करोड़ों (साढे छ: करोड़ से ज्यादा) श्रद्धालु अपना ध्येय मानते हैं। पूज्य गुरु जी ने डेरा सच्चा सौदा में मानवता व समाज भलाई के 160 कार्य चलाए हुए हैं। आप जी द्वारा स्थापित शाह सतनाम जी ग्रीन एस वैल्फेयर फोर्स विंग के हजारों सेवादार डेरा सच्चा सौदा व साध-संगत मानवता भलाई कार्यों के प्रति तन-मन-धन से समर्पित है। डेरा सच्चा सौदा साध-संगत व ये सेवादार बहन-भाई इन पवित्र कार्यों के माध्यम से दीन-दुखियों की मदद करने में तन-मन-धन से लगे हुए हैं। पूज्य गुरु जी की पावन प्रेरणाओं से डेरा सच्चा सौदा का नाम आज पूरे विश्वभर में जाना जाता है।

डेरा सच्चा सौदा के मानवता भलाई कार्य बने विश्व रिकॉर्ड:

पूज्य मौजूदा हजूर पिता संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां के पावन मार्ग-दर्शन व पवित्र रहनुमाई में जो 160 मानवता भलाई के कार्य चलाए जा रहे हैं, उनमें डेरा सच्चा सौदा के नाम 79 से ज्यादा विश्व रिकॉर्ड साबित हुए हैं, जोकि गिनीज बुक आॅफ वर्ल्ड रिकॉर्ड, लिमका बुक आॅफ रिकॉर्ड, एशिया बुक आॅफ रिकॉर्ड और इंडिया बुक आॅफ रिकार्ड में दर्ज हैं, बल्कि रक्तदान व पौधारोपण (पर्यावरण संरक्षण) के क्षेत्र में तो तीन-तीन विश्व रिकॉर्ड गिनीज बुक आॅफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में डेरा सच्चा सौदा के नाम दर्ज हैं।

रक्तदान में विश्व रिकॉर्ड:

और ये तीनों विश्व रिकॉर्ड गिनीज बुक आॅफ वर्ल्ड में डेरा सच्चा सौदा के नाम दर्ज हैं। इसके अतिरिक्त 12 अप्रैल 2014 को एक दिन में डेरा सच्चा सौदा के सेवादारों द्वारा एक ही दिन व एक ही समय में अलग-अलग स्थानों पर ंआयोजित 200 रक्तदान शिविरों में 75711 यूनिट रक्तदान किया गया जोकि डेरा सच्चा सौदा के नाम रक्तदान क्षेत्र में एक और विशाल रिकॉर्ड बना है। इस तरह डेरा सच्चा सौदा द्वारा लाखों यूनिट रक्तदान मानवता हित में दिया जा चुका है।

पौधारोपण में विश्व रिकॉर्ड:

  • 15 अगस्त 2009 को 1 घंटे में 9 लाख 38 हजार 7 पौधे और इसी दिन 8 घंटों यानि पूरे दिन में 68 लाख 73 हजार 451 पौधे लगाए गए। यानि एक ही दिन में 2 विश्व रिकॉर्ड।
  • 15 अगस्त 2011 को 1 घंटे में 19 लाख 45 हजार 435 पौधे लगाए गए।

और ये तीनों विश्व रिकॉर्ड डेरा सच्चा सौदा के नाम पर्यावरण संरक्षण क्षेत्र में गिनीज बुक आॅफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज हैं। इसी तरह 15 अगस्त 2012 को साध-संगत ने मात्र 1 घंटे में 20 लाख 39 हजार 747 पौधे रोपित किए, जोकि एक और बड़ा रिकॉर्ड बना।

इस तरह डेरा सच्चा सौदा व साध-संगत द्वारा अब तक पांच करोड़ से ज्यादा पौधे रोपित करके पर्यावरण संरक्षण में अपना अहम् योगदान दिया गया है और उनमें ज्यादातर यानि काफी प्रसेंट पौधे फलदार व छायादार पेड़ों के रूप में धरती को महका रहे हैं और यह क्रम आज भी ज्यों का त्यों जारी है। देश-विदेश में साध-संगत हर साल 15 अगस्त को पूज्य गुरु जी का पावन अवतार दिवस व स्वतंत्रता दिवस पौधारोपण करके (हजारों पौधे लगाकर) धरा को हरियाली की सौगात प्रदान करके मनाती है।

इसके अतिरिक्त जरूरतमंदों, बीमारों के लिए रक्तदान करना, गरीब जरूरतमंद परिवारों, विधवाओं को घर (मकान) बनाकर देना, अनाथ व बेसहारा बच्चों व बुजुर्गों को सहारा देना, उनकी संभाल करना, आर्थिक रूप से कमजोर, गरीब व जरूरतमंद परिवारों की बेटियों की शादी में सहयोग करना, मंदबुद्धियों की संभाल और उन बिछुड़ों को परिवार से मिलाना इत्यादि मानवता भलाई के 160 कार्य साध-संगत तन-मन-धन से आज भी ज्यों के त्यों कर रही है।

केवल यही नहीं, पूज्य गुरु जी ने जहां किन्नर समाज (सुखदुआ समाज) को देश की सर्वोच्च अदालत माननीय सुप्रीम कोर्ट से थर्ड जेंडर का नाम दिलाकर भारतीय संविधान में सत्कारित स्थान और देश की अन्य सभी सुविधाओं का हक दिलवाया है, वहीं किसी मजबूरीवश वेश्यावृति की गंदगी भरी जिंदगी में फंसी अनेकों युवतियों को उस बुराई की दलदल से निकाल कर उन्हें अपनी बेटी ‘शुभदेवी’ बनाकर उनकी अच्छे, सम्पन्न परिवारों में शादी-विवाह करवाकर उन्हें योग्य घर व वर प्रदान कराया। ये शुभ देवी बेटियां आज भी अपने पापा-गुरु (पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां) के प्रति अपना हार्दिक आभार प्रकट करते नहीं थकती।

आप जी ने देश में ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व में फैले घातक व जानलेवा नशों के विरुद्ध एक बहुत ही प्रभावशाली मुहिम चलाई हुई है। आप जी ने अपने रूहानी सत्संगों, भजनों, फिल्मों व गीतों के माध्यम से नशे रूपी दैत्य की कमर तोड़ने का जो प्रभावशाली संदेश दिया है, आज उसके व्यापक प्रभाव भी नजर आ रहे हैं। आप जी की प्रेरणा से आज करोड़ों लोग जिनमें 70 प्रतिशत से ज्यादा यूथ हैं, जो नशे व अन्य सब बुराइयां छोड़कर सुखमयी जीवन जी रहे हैं और केवल यही नहीं, आज भी ज्यादा से ज्यादा (लाखों की संख्या में) लोग डेरा सच्चा सौदा की इन पवित्र शिक्षाओं से जुड़ रहे हैं। पूज्य गुरु जी के ऐसे मानवता व समाज भलाई कार्य समूची मानवता के लिए एक बहुत बड़ी देन है।

105वें पावन एमएसजी अवतार दिवस 25 जनवरी की बहुत-बहुत बधाई हो जी।

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