Children's Story -sachi shiksha hindi

बेटी हो तो ऐसी हो -बाल कथा

नूतन अपनी कॉलोनी के बाल मित्रों के साथ खेलकर कुछ थक गई थी। उसने सोचा चलो घर चलकर कुछ खा पी लें और फिर खेलने आ जाएंगे। वह अपनी सहेली कुसुम से कह कर घर के लिए चल दी।

दोपहर का समय था। सूरज आसमान में तप रहा था। भयंकर गर्मी थी। कॉलोनी सुनसान पड़ी थी। ऐसी गर्मी में कौन घर के बाहर निकले। सब अपने कमरों में कूलर चलाए विश्राम कर रहे हैं। पिताजी तो प्रतिदिन की तरह कार्यालय गए होंगे और भईया अपने कालेज। माँ अकेली घर होगी। वह घर पहुंची। कॉल बेल बजाई।

मम्मी ने डांटते हुए दरवाजा खोला-ऐसी गर्मी में कहां खेलती फिरती है। जरा अपनी सूरत तो देखो। नूतन चुपचाप घर के अंदर गई और सीधे रसोईघर में घुस गई। तभी फिर घंटी बजी। नूतन ने सोचा माँ है तो सही, दरवाजा खोल कर देख लेगी। नूतन ने मटके से पानी निकाल कर पिया और भोजनालय की अलमारी में खाने की चीज खोजने लगी।

तभी उसे आवाज आई ‘चुपचाप अलमारी की चाबी बताओ कहां है?‘ उसे आभास हुआ कुछ गड़बड़ है। उसने दरवाजे के दराज से झांक कर देखा। तीन युवा मुंह पर काला कपड़ा बांधे हाथ में चाकू लिए मां को बांधकर खड़े हैं और अलमारी की चाबी मांग रहे हैं। वह भय से कांप गई। उसकी घिग्घी बंध गई। यदि उसने जरा भी आवाज की तो युवा उसे भी बांध लेंगे। उसने बिना आवाज किए रसोईघर का दरवाजा अंदर से बंद कर दिया और विचार मग्न हो गई।

नूतन को याद आया कि पिछवाड़े की गंदी गली में एक रास्ता खुलता है जिससे कभी-कभी सफाई वाली बाई शौचालय साफ करने आया करती है। उसे ध्यान आया यह गंदी गली उसके पिछवाड़े की सड़क से मिलती है। वह चुपचाप उस गंदी गली से निकली और सड़क पर आ गई। उसने सड़क के कोने से देखा कि एक कार बाहर खड़ी है और एक आदमी बाहर इंतजार कर रहा है।

नूतन सोच में पड़ गई कि क्या करे, कॉलोनी में तो सभी अंकल दफ्तर या दुकान गए हैं। वह किससे मदद मांगे? तभी उसे याद आया शिवनाथ दादा जी घर में होंगे। वे वृद्ध हैं। रिटायर्ड हो गए हैं। वे इस दोपहर में कहीं नहीं गए होंगे। वह उनके मकान पर गई। घंटी बजाई। शिवनाथ दादाजी ने दरवाजा खोला। उसने हांफते हुए उन्हें घटना की जानकारी दी। वे बोले-तुम घबराओ नहीं। हम अभी सब ठीक किए देते हैं। शिवनाथ जी ने पुलिस को टेलीफोन कर दिया।

नूतन अपनी सहेली कुसुम के पास आई। उसे सब बताया और दोनों उस कार के पीछे आ गए। नूतन कार के नीचे घुसी और उसने धीरे से कार की हवा निकालने के लिए वाल्व खोल दिया। वह निकल कर बाहर आई तो कार का ड्राइवर चिल्लाया-बच्चो, भागो यहां क्या कर रहे हो। दोनों भाग आई। वे सड़क के कोने वाले मकान से नजारा देख रही थी।

थोड़ी देर में पुलिस की गाड़ी सड़क पर आती दिखी। ड्राइवर ने आवाज लगाई-भागो, पुलिस आ रही है। अंदर वाले युवक घबराए। एक गठरी पीठ पर लादे बाहर आ गए। पुलिस की गाड़ी कार के सामने खड़ी हुई। ड्राइवर ने गाड़ी स्टॉर्ट की और कार पीछे करने लगा पर गाड़ी के पहिये में हवा ही नहीं थी।

युवक गठरी लिए दूसरी ओर भागे, किन्तु दूसरी ओर शिवनाथ दादाजी मोहल्ले के युवाओं के साथ डंडे लिए खड़े थे। चारों युवा पस्त हो कर गिर पड़े। पुलिस के जवान हथकड़ी डाल रहे थे। चारों गुंडे आश्चर्यचकित थे कि पुलिस कैसे आ गई। इन युवाओं को कौन बुला लाया और कार की हवा कैसे निकल गई। उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था।

नूतन उन्हें देख मुस्कराई और तुरंत दौड़ कर कुसुम के साथ घर गई। मां रस्सी से बंधी पड़ी थी। दोनों ने मिलकर रस्सी खोली और मां को सब सुनाया। मां ने दोनों को गले लगाया। बोली-बेटी हो तो ऐसी हो।
-सत्य नारायण भटनागर

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