merry christmas -sachi shiksha hindi

खुशियां मनाने का पर्व क्रिसमस

25 दिसम्बर का दिन मसीही समुदाय के लिए विशेष महत्त्व रखता है। इस दिन उनके आराध्य प्रभु ईसा मसीह का जन्म हुआ था। इस दिन को ‘ईसा मसीह जयंती’ के रूप में मनाया जाता है। इस जन्मोत्सव के दिन को मसीह समुदाय पूरी दुनिया भर में धूमधाम के साथ मनाता है। इसे बड़ा दिन एवं क्रिसमस-डे भी कहा जाता है।

सांता क्लाज की कहानी:

संत निकोलस की कहानी इस प्रकार प्रचलित है। निकोलस बचपन में ही अनाथ हो गए। बाद में अपने अच्छे कार्यों से तथा प्रभु यीशू के प्रति भक्ति भावना होने के कारण वे अपने शहर के मेयर बना दिये गये। बाद में रोमन सम्राट हायक्ले सियन के समय में उन्हें देश निकाला दे दिया गया क्योंकि वे सम्राट को नहीं मानते थे।

इससे निकोलस को कई वर्षों तक जगह-जगह भटकना पड़ा तथा भूखे-प्यासे दिन गुजारने पडेÞ। बाद में फांसटेटाइन के राज्य में उनके साथ अच्छा व्यवहार किया गया। वे सदा दीन-दुखियों की सहायता किया करते थे, बीमारों की सेवा करते थे तथा बच्चों को प्यार करते थे, अत: क्रि समस पर्व में उन्हें अवश्य याद किया जाता है।

आजकल सांता क्लाज के बिना क्रिसमस का त्यौहार पूरा नहीं होता। क्रि समस में नगर में किसी को सांता क्लाज बना दिया जाता है। उस दिन सामूहिक रूप से कुछ उपहार के पैकेटस बनाये जाते हैं और सांता क्लाज उसे सभी के बीच अथवा घर-घर जाकर वितरित कर देते हैं।

वास्तव में जब संत निकोलस अपने चरम बिन्दु पर थे, उस समय धर्म सुधार के नाम पर बहुत सी प्रथाएं बंद कर दी गयी जिसका निकोलस ने समर्थन किया था, अत: अब निकोलस का स्थान सांता क्लाज को मिला। फादर क्रि समस और संत निकोलस का संयुक्त रूप सांता क्लाज है। उसकी पोशाक एवं वेशभूषा भी निकोलस के समान ही होती है।

वस्तुत:

सांता क्लाज अमरीकी देन है। बड़े-बड़े स्टोरों में सांता क्लाज का आगमन बड़े धूम-धाम से होता है। स्टोर की ओर से कई दिन पहले से ही समाचार पत्रों में विज्ञापन छपने लगते हैं कि अमुक दिन फादर क्रिसमस बड़े साज-सामान के साथ स्टोर में आने वाले हैं अत: उनके स्वागत के लिये अधिक संख्या में उपस्थित हों। सांता क्लाज के आगमन के लिये प्राय: रविवार का दिन ही चुना जाता है ताकि स्कूल और आॅफिस बंद रहने के कारण लोग अधिक संख्या में उपस्थित हो सकें।

सांता के आगमन के बहुत पहले से ही बड़े, बूढ़ों की भीड़ स्टोर के बाहर उनकी प्रतीक्षा करती है और नियत समय पर सांता बर्फ पर रेंडियर द्वारा खींची जा रही गाड़ी में आते हैं। वैसे इस अवसर के लिये गाड़ी में फोम के टुकड़े इस तरह बिछा दिये जाते हैं कि दूर से देखने पर बर्फ का आभास हो। रेंडियर की शक्ल के प्लास्टिक के बने हुए विशाल जानवर गाड़ी के आगे जोत दिये जाते हैं। इससे चलती हुई गाड़ी ऐसी लगती है मानो रेंडियर खींच रहे हों। स्कूलों, आॅफिसों, क्लबों आदि में विशेष रूप से आयोजित पार्टियों में सांता क्लाज अपना लम्बा झोला लटकाये आते हैं और पार्टी के अंत में उपहार बांटकर चले जाते हैं।

भारतीय ईसाई परिवारों में भी सांता क्लाज बनकर उपहार बांटने की प्रथा है। क्रिसमस के दिन ईसाई परिवारों में अपने घरों में तारा के आकार में बल्ब जलाया जाता है। इससे सांता क्लाज तथा साथ में नवयुवक-नवयवुतियों का झुंड उनके घर जाकर क्रिसमस मनाने में सहयोग करता है।

तारा के आकार के बल्ब के बारे में ऐसा कहा-सुना जाता है कि युसुफ जब अपनी गर्भवती पत्नी को साथ लेकर दर-दर की ठोकरें खा रहे थे, उस समय एक दयालु सज्जन ने उन्हें अपने जानवर रखने के स्थान में रहने की सुविधा दे दी। वहां प्रभु यीशु का जन्म हुआ।

उनके जन्म के साथ ही कुछ पवित्र आत्माओं व पादरियों को आत्मज्ञान हुआ कि इस सृष्टि में नये सम्राट का जन्म हो चुका है। तुम लोग उनके दर्शन कर उनका संदेश जन-जन तक पहुंचाओ। पादरियों के दल ने सम्राट के घर जाकर नये उत्तराधिकारी के जन्म के बारे में अपने आत्मज्ञान की बात बताकर दर्शन करने की प्रार्थना की।

इससे सम्राट को भी भय मिश्रित आश्चर्य हुआ। उन्होंने पादरियों से कहा, आप लोग उन्हें खोजिये और जब वह मिल जायें तो मुझे भी सूचित करें। मैं भी दर्शन कर कृतार्थ हो जाऊंगा मगर मन में भय था कि मेरा राजपाट सब कुछ चला जायेगा, अत: क्यों न उस अंकुर को ही नष्ट कर दिया जाये।

भयभीत पादरियों का यह दल वहां से चला गया। उनके दर्शन करने की उत्कृट इच्छा ने उन्हें व्याकुल बना दिया। उन्हें हमेशा यहीं चिंता सताने लगी कि उनका दर्शन कैसे हो। एक रात उन्हें एक तारा दिखाई दिया जो चलता हुआ महसूस हुआ। पादरियों का दल उस तारे के साथ चलता गया। अंत में वह तारा उस जानवर की झोपड़ी के सामने रुक गया जहां प्रभु यीशु का जन्म हुआ था। वहां जाकर उन्होंने उनके दर्शन किये और फिर उनका संदेश जन-जन तक पहुंचाया। अत: क्रि समस के दिन घरों में तारा के आकार के बल्ब जरूर जलाये जाते हैं।

जो भी हो, क्रिसमस का त्यौहार उस पवित्रा आत्मा के जन्म से लेकर जन-जन तक पहुंचाने वाला संदेश का पर्व होता है।
-अश्विनी केशरवानी

कोई भी त्यौहार आता है, उसे नेकी भलाई के कार्य करके ही मनाना चाहिए। भले कर्म करो और भले कर्म करने का प्रण करो। यही त्यौहार सिखाते हैं। जो भी धर्म के लोग अपने त्यौहार को मनाते हैं उसमें यह अहम बात होती है कि उसका स्वरुप बदलना नहीं चाहिए। कोई भी धर्म बुरे कर्म करने नहीं सिखाता।

सभी धर्मों की नींव अच्छाई पर, नेकी पर, भले कामों पर टिकी हुई है। इसलिए त्यौहार तभी पूरी खुशियां देता है, जब इन्सान त्यौहार को त्यौहार की तरह मनाता है। त्यौहार पर उन पीर-पैगम्बारों को नमन करना चाहिए, सत्कार करना चाहिए, जिनकी वजह से ये खुशियों के दिन आते हैं। अगर आप भले कर्म करते हैं, तो यकीनन मालिक, दाता, रहबर खुश होते हैं और वो खुशियां आपकी कुलों तक पहुंच जाया करती हैं।
-पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां

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