Only parents can become role models -sachi shiksha hindi

पैरेंट्स ही बन सकते हैं रोल मॉडल

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार बच्चे पर पैरेंटस का प्रभाव सबसे अधिक पड़ता है क्योंकि वो अपना प्रारंभ का सारा समय अपने माता-पिता के साथ रहकर गुजारता है।

जब स्कूल जाता है, तब भी वो माता पिता के साथ अधिक समय गुजारता है। हां, जब किशोर होता है तब वो मित्रों के साथ भी काफी समय रहता है। बच्चे अपने माता-पिता के व्यवहार को ध्यान में रखते हैं कि वे किस तरीके से बातचीत करते हैं, अपने आस-पास के लोगों के साथ कैसे रिएक्ट करते हैं, ये सब बातें जाने अंजाने बच्चों में स्वयं आ जाती हैं।

वैसे तो आजकल के सजग माता पिता इस बात को अच्छी तरह समझते हैं और इच्छुक होते हैं कि उनके बच्चों में अच्छी आदतें हों और वे वातावरण के अनुसार स्वयं को ढाल सकें, इसलिए पैरेंटस को उनका रोल मॉडल बन उदाहरण पेश करना चाहिए ताकि उनके बच्चे जैसा वो चाहते हैं, बनें।

बच्चों को प्रारंभ से ही निडर बनायें। उन्हें डरने वाली कहानियां न सुनायें, क्योंकि मेट्रो सिटिज में पैरेंटस वर्किंग होते हैं और कई बार बच्चों को घर में अकेला रहना पड़ता है तो ऐसे में वो सुरक्षित महसूस करें। यदि शुरू से वे डरपोक होंगे तो वो स्वयं को अनसेफ महसूस करेंगे। बचपन से उन्हें यह गुण सिखाएं। इससे उनका विकास अच्छा होगा।

बच्चों को आप यदि प्यार दुलार सिखाना चाहते हैं तो उन्हें किस और हग करते रहें। कभी-कभी सिर और कंधे पर प्यार भरा हाथ रखें। गोदी में थोड़ी देर उनका सिर रख उन्हें अपना प्यार दिखाएं जिससे वे सुरक्षित महसूस करें। बच्चों की पढ़ाई व एक्टीविटिज में रूचि लें। उनके साथ बच्चे बन खेलें।

किशोर बच्चों के साथ दोस्ताना व्यवहार करें, टीवी प्रोग्राम इकट्ठे देखें, खाना इकटठे खाएं। इससे वे भी आपको प्यार देंगे आपकी बात मानेंगे, बड़ों को इज्जत देंगे और छोटों को प्यार देंगे। बड़े बच्चों को दोस्त के रूप में पैरेंटस मिल जायेंगे। वो फ्रीली आपसे सलाह लेंगे, कुछ छिपाएंगे भी नहीं।

पैरेंटस को अपनी भावनाएं भी प्रदर्शित करते रहना चाहिए। जैसे हंसते मुस्कुराते रहना स्वाभाविक है वेैसे ही गुस्सा भी स्वाभाविक भावना है। कभी-कभी किसी बात को समझाने पर भी बच्चे कहना न मानें तो गुस्सा आना स्वाभाविक है पर उसका इजहार एकदम न करते हुए उस बात पर दोबारा गौर फरमाते हुए अपनी भावनाएं जतलाएं।

कभी-कभी जल्दी गुस्सा आ जाए और बाद में लगे कि पैंरटस की गलती थी, समस्या इतनी गंभीर नहीं थी तो ऐसे में पैरेंटस को सारी बोलने में परहेज नहीं करना चाहिए। इससे बच्चे जो अपने पैरेंटस को गाइड मानते हैं, वे भी अप्रत्यक्ष रूप से सीख जाएंगे कि गुस्से पर कैसे काबू पाया जाए या गलती होने पर सॉरी महसूस कैसे किया जाए।

कुछ घर के मामले में जैसे मैन्यू तैयार करने में अनावश्यक सामान फेंकने में, इंटीरियर डेकोरेशन में बच्चों की सलाह लेनी चाहिए। इससे बच्चे भी कुछ बातों से दोस्तों से सलाह न लेकर आपसे लेना पसंद करेंगे पर पैरेंटस को उनकी समस्याओं को सुलझाने का तरीका आना चाहिए, नहीं तो बच्चे दोस्तों से अधकचरी नॉलेज ले कर काम बिगाड़ सकते हैं।

बच्चों को अपने बिहेवियर से यह जता देना चाहिए कि क्या उन्हें पसंद नहीं है तो बच्चे ऐसा कुछ भी करने से परहेज करेंगे।
यह तो सच है, पैरंटस जो भी करते हैं बच्चे उन्हें आसानी से फॉलो करते हैं। यदि बच्चे परिवार के साथ जुड़ें रहेंगे तो उनका एटिट्यूड हेल्दी बनेगा। इसके लिए अपना एटिट्यूड भी हेल्दी बनाएं ताकि आपके बच्चे जिंदगी को मस्त तरीके से, पॉजिटिव होकर, सुरक्षित जिंदगी जी सकें।
-नीतू गुप्ता

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