Experiences of satsangis

बेटा! बस के नीचे देख ले… -सत्संगियों के अनुभव
पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज की अपार कृपा

बहन दर्शना इन्सां पत्नी सचखंडवासी विजय कुमार जोशी इन्सां निवासी गांव सिंहपुर हाल आबाद कुराली, जिला मोहाली, पंजाब से पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज की अपने पर हुई रहमतों का वर्णन इस प्रकार करती हैं:

वर्ष 1980 की बात है। मेरे पति विजय कुमार कोटकपुरा धागा मिल में नौकरी करने लगे। हम फरीदकोट रोड कोटकपुरा में किराये के मकान में रहने लगे। उस मकान में तीन कमरे थे। उस कमरे में रहते हुए मुझे डेढ़ महीना ही हुआ था कि एक रात सुबह 4 बजे मुझे सपना आया। सपने में मुझे एक अजनबी बुजुर्ग बाबा जी दिखे, जिन्होंने सफेद वस्त्र पहने हुए थे। सिर पर लाल परना बंधा हुआ था।

उनका कद लम्बा था और हाथ में लंबी लाठी पकड़े हुए थे। सपने में मैंने अपने पति को उठा दिया। मैंने समझा कि ये बुजुर्ग मेरे ससुर हैं। मैंने उनके पैरों को छू लिया। मेरे पति उठकर अपनी आंखें मल रहे थे। उन बुजुर्ग बाबा जी ने मेरे पति को आशीर्वाद दिया और उनके सिर पर हाथ भी रख दिया। में सोच रही थी कि बुजुर्गों के पांवों को हाथ तो मैंने लगाए हैं, परंतु उन्होंने मुझे आशीर्वाद नहीं दिया! मेरे पति ने उनके पैर भी नहीं छुए, उनको फिर भी आशीर्वाद दे दिया! वास्तव में मैंने अपने ससुर को देखा भी नहीं था, क्योंकि वो मेरी शादी से कई साल पहले ही घर से चले गए थे, फिर लौटकर नहीं आए।

सपने वाले दिन मैंने अपने मकान मालिक के घर में पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज का बड़ा स्वरूप देखा, तो मैं हैरान रह गई कि सपने में आए बुजुर्ग तो यही हैं। मैंने उनके परिवार में पूछा कि ये बाबा जी कौन हैं? उन्होंने बताया कि बाबा जी हमारे गुरु जी हैं। ये डेरा सच्चा सौदा सरसा वाले संत हैं। मैंने उनको सपने वाली बात बताई तो उन्होंने कहा कि तू तो भाग्यशाली है जिसको गुरुमंत्र के बिना ही पूजनीय गुरु जी के दर्शन हो गए। उन्हीं दिनों में कोटकपुरा के आसपास गांवों में पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज के सत्संग थे। मैं भी मकान मालिक की माता-बहनों के साथ एक नजदीकी गांव में सत्संग पर चली गई। जब मैंने पूजनीय परमपिता जी के पावन दर्शन किए तो मैं हैरान रह गई कि ये तो वो ही हैं जिन्होंने मुझे सपने में दर्शन दिए थे। मैंने उसी सत्संग पर गुरुमंत्र, नाम-शब्द ले लिया।

उस समय मेरे पति बहुत शराब पीते थे। सत्संगियों के घर किराए के मकान में रहने से व उनकी प्रेरणा से मेरे पति ने भी नाम-शब्द ले लिया। हुआ यूं कि एक दिन मेरे पति किसी कार्य के लिए लुधियाना जा रहे थे। पड़ोसी सत्संगियों ने उन्हें सत्संग पर जाने व नाम-शब्द लेने के लिए कहा। मेरे पति ने कहा कि मेरा लुधियाना वाला काम हो जाए, तो मैं नाम ले लूंगा। जब वह लुधियाना पहुंचे, तो वहां दफ्तर वालों ने कहा कि जोशी साहब, तेरा काम तो हुआ पड़ा है। वह दोपहर तक वापिस कोटकपुरा आ गए और अपने वायदे के मुताबिक उन्होंने सत्संग सुना व नाम-शब्द ले लिया। हमें पूजनीय परमपिता जी पर इतना दृढ़ विश्वास हो गया कि हम दोनों डेरा सच्चा सौदा सरसा दरबार में सेवा करने लगे। हमारा घर नरक से स्वर्ग बन गया।

एक बार पूज्य हजूर पिता जी ने दातें (प्रेम-निशानियां) देने के लिए पंजाब के सेवादारों को डेरा सच्चा सौदा सरसा दरबार बुलाया हुआ था। हम दोनों पति-पत्नी बस से सुबह 8 बजे पटियाला पहुंच गए। मैंने हाथ में दो सोने की चूड़ियां पहनी हुई थी। मैं तो उन्हें घर में रखना चाहती थी, लेकिन मेरे पति कहने लगे कि चोरी तो घर में भी हो सकती है, क्योंकि हम घर को ताला लगाकर आए थे। पटियाला बस अड्डे पर एक औरत और एक लड़की आकर मेरे पास खड़ी हो गई। मैंने सोचा कि इन्होंने भी बस में जाना होगा। जब बस आई तो सभी यात्री बस पर चढ़ने लगे।

बस की पिछली खिड़की बंद कर रखी थी। मेरे पति पहले चढ़ गए और उन्होंने मेरी सीट रख ली। जब मैं चढ़ने लगी तो वही औरत मेरे आगे खिड़की में खड़ी हो गई। मेरे पीछे और भी यात्री थे जो बस में चढ़ना चाहते थे। उस औरत ने नीचे की ओर झुककर अपना शॉल मेरे आगे फैला दिया। मैं उसके पीछे खड़ी थी। वो न आगे हो रही थी और न ही पीछे हो रही थी। अचानक मुझे उस औरत के शॉल में कटी हुई चूड़ी दिखी। मैंने तुरंत उस चूड़ी को पहचान लिया कि यह तो मेरी चूड़ी है। मैंने जल्दी से उस चूड़ी को उठा लिया और कहा कि यह तो मेरी चूड़ी है।

उस औरत ने जवाब दिया कि मुझे क्या पता है तेरी चूड़ी का। वह उसी समय बस से नीचे उतर गई। मैंने अपनी बाजू देखी, तो उसमें तो कोई चूड़ी नहीं है। मेरे होश उड़ गए कि अब मैं क्या करूं। मुझे सतगुरु जी का ख्याल आया कि अब तो तेरा ही सहारा है। मैं बस से नीचे उतर गई। फिर मुझे पूजनीय परमपिता जी की आवाज आई, ‘बेटा, बस के नीचे देख ले।’ मैंने एकदम बस के नीचे देखा तो चूड़ी अगले टायर के नीचे पड़ी थी। मैंने फटाफट चूड़ी उठा ली और बस पर चढ़ गई। मुझे डर था कि कहीं बस न चल पड़े। मैंने अपने सतगुरु, मालिक, पिता जी का लाख-लाख धन्यवाद किया। इस तरह सतगुरु जी ने मुझे उस जेबकतरी के पंजे से बचाया। अगर सतगुरु का साथ और सिर पर हाथ न होता, तो वो जेबकतरी दोनों चूड़ियां ले जाती।

हमने पूजनीय सतगुरु जी का लाख-लाख शुक्राना किया। उन दिनों हमने डेरा सच्चा सौदा सरसा दरबार में 10 दिन रह कर तक सेवा की। जब हम वापिस घर लौटे, तो देखा कि ताले में चिब पड़े हुए थे और कुण्डा भी हिला हुआ था। कुछ देर बाद हमारे घर के सामने वाले घर से एक लड़का आ गया। वह कहने लगा कि अपनी गली में दो-तीन चोरियां हो गई हैं। एक रात को लगभग एक-डेढ़ बजे मेरी छोटी बेटी रोने लगी। मैंने लाइट जलाई, तो उस समय आपके दरवाजे के आगे एक आदमी खड़ा दिखा था।

मैंने सोचा कि अंकल-आंटी आ गए होंगे, परंतु सुबह पता चला कि अपनी गली में चोरियां हुई हैं। आपका घर बच गया। मैंने कहा कि ये सब पूज्य सतगुरु जी की रहमत है। पूजनीय पिता जी ने बचा दिया है। सतगुरु अपने शिष्यों की कैसे-कैसे और कहां-कहां संभाल करता है, यह सोचने-समझने से परे की बात है। जीव अपने सतगुरु के उपकारों का बदला चुका ही नहीं सकता। मैं अपने सतगुरु के स्वरूप पूज्य हजूर पिता संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां के चरणों में यही विनती करती हूं कि सेवा-सुमिरन करते हुए ओड़ निभा देना जी।

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