बेटा! तेरा मौत का कर्म कट गया -सत्संगियों के अनुभव

पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज की अपार कृपा

जीएसएम भाई राम सिंह उर्फ पाल इन्सां पुत्र सचखंडवासी हाकम सिंह गांव शाह सतनाम जी पुरा जिला सरसा से अपने पर हुई पूजनीय परमपिता शाह सतनाम जी महाराज की रहमत का वर्णन करता है:-

मैं परमपिता जी की रहमत से सन् 1969 से डेरा सच्चा सौदा दरबार का सेवादार हूं। लगभग 1978 की बात है। गर्मी का महीना था, गांव शाहपुर बेगू के एरिया में डेरे की चौदह एकड़ जमीन थी। इस जमीन में टयूबवेल लगा हुआ था। कुआं 70 फीट गहरा था। जब बिजली नहीं आती तो ट्रैक्टर से टयूबवैल चलता था। बहुत लम्बा पट्टा चलता था, जो ट्रैक्टर की पुली से पंखे को चलाता था। एक बार टयूबवैल खराब हो गया।

दोबारा बोर कर लिया था। मिस्त्री कैप्टी (शुरूआत में पानी के साथ मिट्टी आती है, जिसे कैप्टी कहा जाता है) बना रहा था। जब रेत ज्यादा आने लगी तो मिस्त्री ने मुझे कहा कि तूं कुएं में नीचे जाकर देख कि कहीं कुआं बैठ न जाए। जब मैं सीढ़ियों से उतरकर नीचे चला गया तो नीचे से दस फुट पर कुआं टूट चुका था। ऊपर वाला 60 फुट भाग उसी तरह खड़ा रहा, परंतु नीचे वाला दस फुट टेड़ा हो गया। दो-तीन फुट की दरार आ गई। मिट्टी गिरने लग गई। मैंने मिस्त्री को आवाज दी और बताया कि कुआं टूट गया है। नीचे वाला हिस्सा टेडा हो गया है। मिट्टी गिर रही है।

ट्रेक्टर बंद कर दो। कोई चानण (लाइट) कर ताकि मैं बाहर निकल आऊं। उस समय रात का अंधेरा हो गया था। मिस्त्री ने चलता हुआ ट्रैक्टर बंद कर दिया। उस समय बोर वाली पाईप टूट गई तथा दो-अढ़ाई फुट पानी कुएं में भर गया। मैंने मिस्त्री को आवाजें दी, परंतु उसने मुझे कोई जवाब न दिया। शायद वह इस बात से डर गया था कि कुआं बंद हो जाएगा तथा बंदा मर जाएगा। वह वहां से भाग गया।

अंदर पूरा अंधेरा था। मैं घबरा गया कि मेरा अंत समय आ गया है, क्योंकि मिट्टी लगातार गिर रही थी। मुझे कुछ भी सूझ नहीं रहा था। उस समय मैंने मालिक सतगुरु को याद किया तथा धन-धन सतगुरु तेरा ही आसरा का नारा लगाया कि मालिका! अब तू ही बचा सकता है। उसी समय बाहर से एक आवाज आई जो मिलखा सिंह जी.एस.एम. की आवाज की तरह थी। मुझे आवाज सुनकर हौंसला हो गया कि भाई आ गया है, अब मुझे मरने नहीं देगा।

उसने मुझे दो-बार समझाया कि मोटर पर पैर रखकर सीढ़ी को पकड़ ले, तेरा हाथ पहुंच जाएगा। वहां दिखता तो कुछ भी नहीं था, क्योंकि कुएं में घना अंधकार था। कुएं में लोहे के सरिये की सीढ़ी फिट की हुई थी। मैंने उसी तरह मोटर पर चढ़कर ऊपर हाथ किया तो मेरा हाथ सीढ़ी तक पहुंच गया, जो ऊंचाई पर थी। मैं सीढ़ी द्वारा बाहर आ गया। बाहर वहां कोई नहीं था। मैं वहां बने कमरे में चारपाई पर लेट गया। घबराहट और थकावट से मुझे बुखार हो गया। उस समय सारा सीन मेरी आंखों के सामने घूम रहा था कि आज तो मालिक ने बचाया है।

दूसरी ओर डेरा सच्चा सौदा सरसा के तेरा वास में मजलिस चल रही थी। परमपिता जी साध-संगत में विराजमान थे। परमपिता जी ने निर्मल सिंह तथा हरनेक सिंह (मानसा के मिस्त्रियों) को प्रसाद देकर मेरे पास भेजा कि पता करके आओ कि अपना ट्यूब्वैल ठीक चल रहा है और पाल को (जीएसएम पाल इन्सां) प्रसाद भी दे आओ। वह रात को मेरे पास पहुंच गए। उन्होंने मुझसे पूछा, क्या ट्यूब्वैल ठीक चल पड़ा, हमने जाकर परमपिता जी को बताना है? पिताजी हमारा इन्तजार कर रहे हैं। उन्होंने हमें कहा है कि तुम्हारे आने पर हम अंदर जाएंगे।

मैंने उन्हें बताया कि सब कुछ बढ़िया हो गया। पानी बढ़िया बन गया। मुझे बुखार की गोली दे जाओ। और मैंने कुछ नहीं बताया कि पिताजी ख्याल करेंगे। उन्होंने मुझे दो गोलियां दी। मैं गोली लेकर लेट गया। मुझे नींद आ गई। रात को अर्द्धनिंद्रा की अवस्था में परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज ने मुझे दर्शन दिए और फरमाया- लाइट आ गई है, तू उठकर कुआं देख। मैंने पिता जी को अर्ज की कि पिताजी! मुझे तो आज मिलखे ने बचा लिया।

उसने मुझे बता कर, समझा कर कुएं में से बाहर निकाला। परमपिता जी ने फरमाया- ‘ओह तां भई असीं सी, असीं आवाज मारी सी, मिलखा तां उत्थे है ही नहीं सी।’ जब मैंने उठकर देखा तो कुएं में लाइट जग रही थी। लाइट रात को दो बजे आती थी। मैंने देखा तो कुएं का नीचे वाला हिस्सा बंद हुआ पड़ा था। ऊपर से भी कुआं कुछ बैठ गया था। आस-पास से मिट्टी खिसक चुकी थी।

फिर सुबह उठकर मैं मजलिस सुनने के लिए सरसा दरबार आया। परमपिता जी ने मुझसे पूछा- बेटा! कैसे हुआ? फिर मैंने सब कुछ बता दिया। परमपिता जी ने फरमाया, ‘बेटा! तेरा मौत का कर्म कट गया।’ उसके बाद वह सारा कुआं बंद करवाकर कमरे के दूसरी ओर कुआं खुदवाया गया। परमपिता जी ने वहां अपने पवित्र कर कमलों से स्वयं टक लगाकर कुआं खुदवाया और वचन किए- ‘अब यह हिलता नहीं।’ वह कुआं बढ़िया चल रहा है। मैं पैंतीस वर्ष बाद उस कुएं को देखकर आया तो उस समय भी वह कुआं उसी तरह चल रहा था।

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