Udaipur house of nature -sachi shiksha hindi

udaipur प्रकृति का घर उदयपुर

झीलों की नगरी उदयपुर राजस्थान के हसीन शहरों में से एक है। अरावली पर्वत शृंखला की पहाड़ियों एवं दर्रों से, चारों ओर से घिरे उदयपुर को मेवाड़ का आभूषण, पूर्व का वेनिस तथा राजस्थान का कश्मीर भी कहा जाता है। मारबल और जिंक उत्पादन के लिये उदयपुर विश्वविख्यात है।

अकबर की सेना को चित्तौड़ से खदेड़ते हुए जब महाराणा उदयसिंह पहली बार इस स्थान पर पहुंचे तो उन्हें यह स्थान सुहाया। फिर तो बार-बार वे यहां शिकार खेलने के लिये आने लगे। राज्य की दृष्टि से भी उन्हें यह स्थान चारों ओर से सुरक्षित प्रतीत हुआ। फलस्वरूप 1519 में उन्होंने उदयपुर शहर की नींव रखी। उदयसिंह प्रथम बार जिस स्थान पर महल बनाना चाहते थे, उसे एक साधु द्वारा मना किये जाने के पश्चात् परित्याग कर, साधु द्वारा निर्दिष्ट स्थान पर ही उन्होंने महल बनाना आरंभ किया जहां धुणी थी। आज यह महल सिटी पैलेस के नाम से जाना जाता है।

उदयपुर नगर का विकास महाराणा अमर सिंह प्रथम के शासन काल में आरंभ हुआ था जो अनवरत जारी है। तब से उदयपुर शहर में महलों, मन्दिरों, बगीचों के नायाब निर्माण आरंभ हुए। यहां पहाड़ियों और झीलों के नैसर्गिक सौन्दर्य से अभिभूत हो देश-विदेशी पर्यटकों का जन सैलाब ंखिंचा चला जाता है।

उदयपुर शहर में कालान्तर में परकोटा तथा चौड़ी खाई भी बनी मगर स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् नगर की बढ़ती आबादी विस्तार तथा जन जागरूकता के अभाव एवं सौंदर्यीकरण के वशीभूत खाई का प्राय: नामोनिशां मिट गया तथा मजबूत परकोटे के 11 दरवाजे में से केवल पांच ही आज बतौर अवशेष बचे हुए हैं। पूर्व की ओर स्थित सूरजपोल शहर का मुख्य द्वार है।

उदयपुर के दर्शनीय स्थल

जगदीश मन्दिर:-

भगवान विष्णु को समर्पित जगदीश मन्दिर का निर्माण सन् 1628-52 ई. के मध्य महाराणा जगद सिंह प्रथम ने करवाया। यह उत्तर भारत के शिखर बन्द, सबसे बड़े विष्णु मन्दिरों में से एक है। यहां भगवान विष्णु की चतुर्भुजा श्याम मूर्ति बड़ी मनोहारी है। मन्दिर अधिक ऊंचाई पर होने के कारण सड़क से 32 सीढ़ियां ऊपर चढ़कर जाना पड़ता है। मन्दिर में तक्षक कला का काम उच्च कोटि का है। आषाढ़ शुक्ला द्वितीय को जगन्नाथपुरी के समान यहां रथ यात्रा उत्सव मनाया जाता है।

पिछोला झील:-

पिछोला झील चारों ओर से पर्वत श्रेणियों, नहाने के घाटों, महलों एवं मन्दिर से घिरी हुई है। कालान्तर में इस झील का विस्तार होता गया। आज यह लगभग पांच किलोमीटर लम्बी 1.6 किलोमीटर चौड़ी तथा 25 फीट गहरी है। वर्तमान में इस झील का विस्तार दुध तलाई, अमर कुंड, रंग सागर कुमारया एवं स्वरूप सागर तक है।

पिछोला झील में स्थित छोटे व बड़े टापुओं पर समय-समय पर अलग-अलग महाराणाओं द्वारा निर्माण कार्य करवाये जाते रहे। इनमें जग मन्दिर व जग निवास प्रमुख हैं। महाराणा कर्णसिंह ने 1622 में तीन मंजिला गुंबददार जगमंदिर जल महल का निर्माण करवाया जो बलुए पत्थर से निर्मित हैं। जग मन्दिर के फर्श पर काले व सफेद संगमरमर के टाइल्स लगे हुए हैं।
मुगल बादशाह जहांगीर के पुत्र खुर्रम ने 1622-24 ईस्वी में अपने पिता के विरूद्ध विद्रोह कर मेवाड़ में ही शरण ली थी, तब महाराणा कर्णसिंह ने ही जग मन्दिर में उसे ठहराया था।

ऐसे में खुर्रम ने महाराणा के साथ पगड़ी बन्द भाई का रिश्ता बनाया था। खुर्रम की वह पगड़ी आज भी राजकीय संग्रहालय राजमहल में देखी जा सकती है। जग निवास एक अन्य टापू पर स्थित है जिसका निर्माण 18वीं शताब्दी में महाराणा जगत सिंह ने करवाया था। यह संगमरमर व ग्रेनाइट पत्थर से निर्मित है तथा चार एकड़ में विस्तृत है। आज यह होटल लेक पैलेस के नाम से जाना जाता है।

गुलाब बाग:-

100 एकड़ से भी अधिक भूमि पर फैला गुलाब बाग, छोटी-छोटी कई बाड़ियों को एकीकृत करके बनाया हुआ है। यह सज्जन निवास बाग के नाम से भी प्रसिद्ध है। यहां गुलाब के फूलों की तीन सौ पचास के लगभग किस्में देखने को मिलती हैं। यहां के पुस्तकालय में पचास हजार से भी अधिक पुस्तकें संग्रहित हैं। साथ ही हजारों दुर्लभ ग्रन्थ सुरक्षित हैं।

सहेलियों की बाड़ी:-

यह अलंकृत बगीचा कभी शाही परिवार का विश्राम स्थल था। राजघराने की युवतियां अक्सर यहां सैर करने आती थी। यहां अनेक प्रकार के फव्वारे, तराशी हुई छतरियां तथा संगमरमर के हाथी हैं। महाराज संग्राम सिंह ने उन 48 सहायिकाओं के लिये इस बाग का निर्माण करवाया था जो तत्कालीन राजकुमारी के साथ आयी थी। बुगन बेलिया, मौसमी, सदाबहार फूलों से सुसज्जित इस बाग के छोटे-छोटे पोखरों में झरने बहते हैं। श्रावण कृष्ण अमावस्या को यहां मेला लगता है, जिसमें आस-पास के गावों के हजारों नर-नारी सम्मिलित होते हैं। ठीक इसके दूसरे दिन भी केवल यहां महिलाओं के लिये भी मेला लगता है।

फतेहसागर झील:-

उदयपुर नगर के उत्तर-पश्चिम में लगभग 5 किलोमीटर दूर फतेह सागर झील स्थित है। महाराणा जयसिंह ने 1687 में इसका निर्माण करवाया था उसके पश्चात् महाराणा फतेहसिंह ने इस झील को विस्तृत एवं सुदृढ़ बनवाया। इसी कारण से इसका नाम फतेह सागर झील पड़ा। पहाड़ियों से घिरी यह झील नयनाभिराम दृश्य उपस्थित करती है जिसकी उत्तर दिशा में कायस्थों की कुल देवी नीमच माताजी का मन्दिर है। फतेहसागर झील के मध्य टापू पर नेहरू उद्यान है। यह लगभग साढ़े चार एकड़ भूमि पर फैला है। यहां फव्वारे दर्शनीय हैं जो चैनल टाइप व पिरामिड जैसे हैं। शाम के समय फव्वारों के बीच में रंगीन रोशनी अद्भुत दृश्य उपस्थित करती है।

उक्त के अलावा पश्चिमी क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र एवं शिल्प ग्राम, सज्जनगढ़, महाराणा प्रताप स्मारक, सौर वैद्यशाला, सिटी पैलेस, भारतीय लोक कला मण्डप, राजमहल आदि स्थान भी दर्शनीय हैं। साथ ही हल्दी घाटी, नाथद्वारा,कांकरोली, चारभुजा निकटवर्ती दर्शनीय क्षेत्र है जो एक सौ किलोमीटर की अन्दर की दूरी के हैं जिनका पैकेज टूर द्वारा एक दिन में भ्रमण किया जा सकता है।

उदयपुर बस व रेल मार्ग द्वारा देश के प्रमुख नगरों से जुड़ा हुआ है। जहां हवाई यात्रा की सुविधा भी उपलब्ध है। रहने की उत्तम व्यवस्था के साथ-साथ उदयपुर में खाने-पीने की असुविधा नहीं है।
-पवन कुमार कल्ला

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