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चिंताजनक: प्रत्येक 9 में से 1 भारतीय को कैंसर का खतरा

राष्टÑीय कैंसर जागरूकता दिवस (7 नवम्बर) विशेष
कैंसर…एक ऐसी बीमारी जिसका नाम सुनते ही व्यक्ति के मन में जीवन से संबंधित तमाम तरह के सवाल पैदा हो जाते हैं। वह जीने की कम और जीवन खत्म होने की आशंकाओं से घिर जाता है।

उसे लगता है कैंसर मतलब मौत। जिसे कैंसर हो या किसी के परिवार में किसी सदस्य को कैंसर हो तो उस व्यक्ति और परिवार की हालत अत्यधिक खराब हो जाती है। शुरूआती चरण में पता लगने पर तो कैंसर को काफी हद तक ठीक किया जाता सकता है, लेकिन जैसे-जैसे इसकी स्टेज बढ़ती है तो कैंसर लाइलाज बीमारी का रूप भी ले लेता है। नेशनल कैंसर रजिस्ट्री प्रोग्राम-2020 के अनुसार भारत देश के लिए यह चिंताजनक बात है कि यहां प्रत्येक 9 में से 1 व्यक्ति को कैंसर का खतरा है।

  • साल 2020 में एक करोड़ मौतों के साथ कैंसर मौत के सबसे बड़े कारणों में से एक
  • पुुरुषों में लंग कैंसर तो महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर का खतरा सबसे अधिक
  • माइक्रोबायोटा टेस्ट से लगाया जा सकता है शरीर में सूक्ष्म जीवों का पता

संजय कुमार मेहरा

शोधों की बढ़ती संख्या से यह संकेत मिलता है कि कई तरह के कैंसर विकसित होने और गट माइक्रोबोम (हमारे पाचन-तंत्र में स्वाभाविक रूप से पाए जाने वाले सूक्ष्मजीवी) के बीच नजदीकी संबंध हैं। ये सूक्ष्मजीवी केवल कैंसर का ही कारण नहीं बनते, बल्कि इनसे कैंसर की दवाइयों का असर भी कम हो सकता है।

साधारण व यूजर फ्रेंडली है माइक्रोबायोटा टेस्ट:

दक्षिण एशिया की पहली बाइक्रोबायोम कंपनी ल्युसिन रिच बायो प्राइवेट लिमिटेड के को-फाउंडेशन एवं डायरेक्टर डा. देबोज्योति धार बताते हैं कि माइक्रोबायोटा टेस्ट एक नई तरह का टेस्ट है, जिससे शरीर के भीतर पनप रहे सूक्ष्मजीवियों की जनसंख्या के बारे में पता लगाया जाता है। इस जांच से अच्छे और बुरे दोनों तरह के सूक्ष्मजीवियों की पहचान हो जाती है। गट माइक्रोबायोटा टेस्ट से आंत में किसी भी असंतुलन या डिसबायोसिस का संकेत मिल सकता है। ये जांच बहुत साधारण और यूजर फ्रेंडली हैं। घर बैठे स्टूल सेंपल के माध्यम से इसे कराया जा सकता है।

सेंपल लेने के बाद इसे अगली पीढ़ी की सिक्वेंसिंग से गुजारा जाता है, जिससे आंत में मौजूद खरबों सूक्ष्मजीवियों का पता चल जाता है। साथ ही इन सूक्ष्मजीवियों के जीन्स के बारे में भी पता किया जा सकता है, जिससे इनके विभिन्न कार्यों की जानकारी हासिल होती है। इन सूक्ष्मजीवियों के जीन्स की उपस्थिति से उस तरीके पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है, जिसके माध्यम से हमारा शरीर जीवन के लिए घातक बीमारियों जैसे कैंसर या इसके इलाज के प्रति काम करते हैं।

पारम्परिक कल्चर टेस्ट से बेहतर है माइक्रोबायोम टेस्ट:

इस प्रकार के माइक्रोबायोम टेस्ट्स, पारंपरिक कल्चर टेस्ट्स से बेहतर इसलिए हैं, क्योंकि इनमें आधुनिक तकनीक का प्रयोग किया जाता है। कल्चरिंग की प्रक्रिया को छोड़ दिया जाता है। इसके माध्यम से केवल बैक्टीरिया ही नहीं, बल्कि वायरस, फंगस और अन्य सूक्ष्मजीवियों के प्रोफाइल का भी पता चलता है। यह जानना भी जरूरी है कि गट माइक्रोबायोटा का निर्माण करने वाले सूक्ष्मजीवियों में कैंसर को बढ़ावा देने और ट्यूमर कम करने दोनों प्रकार के गुण हो सकते हैं।

इनमें से पहला आमतौर पर डीएनए को नुकसान पहुंचाता है। दूसरा डीएनए को नुकसान के प्रति शरीर की प्रतिक्रिया में दखल देता है। तीसरा सिग्नल प्रणाली का सामान्य रूप से काम नहीं करना और चौथा इम्युनिटी कम करता है। इसके विपरीत ट्यूमर कम करने में गट माइक्रोबायोटा की भूमिका या तो ट्यूमर कोशिकाओं को सीधे खत्म करने, कैंसर कोशिकाओं का पोषण रोकने और दम घोंटने, या फिर सकारात्मक इम्युनोरेगुलेट्री प्रभाव छोड़ने के रूप में सामने आती है।

कैंसर के इलाज में कीमोथेरेपी सबसे प्रमुख:

सभी मरीजों के शरीर में सकारात्मक प्रतिक्रिया दिखाई नहीं देती। हर मरीज में इस अंतर के पीछे कई कारण हो सकते हैं। गट माइक्रोबायोटा भी इनमें से एक है। उदाहरण के लिए जेमसिटाबाइन, पैंक्रियाटिक डक्टल एडेनोकारसिनोमा (एक प्रकार का पैनक्रियाटिक कैंसर) के लिए अत्यधिक प्रयोग किया जाने वाला कीमोथेरेपी एजेंट है।

गामा प्रोटियोबैक्टीरिया नाम का गट बैक्टीरिया जेमसिटाबाइन को मेटाबोलाइज करता है। इसे निष्क्रिय अवस्था में बदल देता है, जिससे इलाज बेकार हो जाता है। यदि इलाज कर रहे आॅन्कोलॉजिस्ट को इसकी जानकारी मिल जाती है तो उसके अनुसार इलाज का तरीका तय करने में मदद मिल सकती है। इसके अलावा सफलता की ज्यादा संभावना वाले इलाज के तरीकों को अपनाने से समय और इलाज की लागत दोनों की बचत होती है।

फेकल माइक्रोबायोटा ट्रांसप्लांटेशन:

आंत के सूक्ष्मजीवियों का प्रयोग करने वाला एक तरीका कैंसर और इसका इलाज महत्वपूर्ण रूप से गट माइक्रोबायोटा में परिवर्तन करता है, जो आंत में डिसबायोसिस का कारण है। वैसे इस प्रकार की असंतुलित आंत फेकल माइक्रोबायोटा ट्रांसप्लांटेशन (एफएमटी) नाम की तकनीक से फिर से सुधारी जा सकती है। शोधकर्ता एफएमटी का परीक्षण कई प्रकार के कैंसर में कर रहे हैं। कुछ सकारात्मक परिणाम भी सामने आए हैं। अभी तक इन्हें इलाज के लिए मान्य नहीं किया गया है।

जीवन की गुणवत्ता में सुधार:

कैंसर और इससे संबंधित इलाज के तरीके आंत में डिसबायोसिस का कारण बन सकते हैं। इससे बार-बार सूजन सहित अन्य परेशानियां हो सकती हैं और कई साइड इफेक्ट्स दिखाई दे सकते हैं। इन कारणों से मरीज के जीवन की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। गट माक्रोबायोम टेस्ट्स न्युट्रिशनल प्रोफाइलिंग पर आधारित होते हैं, जिनसे डिसबायोटिक कंडीशन सुधर सकती है। ऐसा होने पर संबंधित मरीज के जीवन की गुणवत्ता बेहतर होती है।

फ्लोर (यूएस), वियोम (यूएस), बगस्पीक्स (भारत) जैसे परीक्षणों से गट माइक्रोबायोटा पर आधारित व्यक्तिगत पोषक सिफारिशें उपलब्ध होती हैं।

डा. देबोज्योति धार के अनुसार आंत के सूक्ष्मजीवियों की संरचना, विविधता की कैंसर के इलाज की सफलता और प्रभावित मरीजों के जीवन की गुणवत्ता निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसलिए गट माइक्रोबायोम टेस्ट्स को इस बीमारी से लड़ने में डॉक्टर्स के अतिरिक्त साधन के रूप में देखा जा सकता है।

साल 2020 में कैंसर से पूरी दुनिया में करीब एक करोड़ मौतें हुर्इं। इस आंकड़े के साथ यह बीमारी मौत के सबसे बड़ा कारणों में से एक है। कैंसर किस जगह हो सकता है, यह पुरुषों और महिलाओं में अलग-अलग होता है। पुरुषों में लंग कैंसर और महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर का खतरा सबसे ज्यादा होता है।

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