Organic Farming

Organic Farming गौ-आधारित जैविक खेती की ओर लौट रहे किसान

पिछले कुछ दशकों में खेती में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का उपयोग तेजी से बढ़ा है। शुरूआत में इससे उत्पादन में वृद्धि अवश्य हुई, लेकिन लंबे समय तक इनके अंधाधुंध प्रयोग ने खेतों की प्राकृतिक शक्ति को कमजोर कर दिया।

मिट्टी की संरचना बिगड़ने लगी, उपयोगी सूक्ष्म जीव और मित्र कीट नष्ट हुए तथा मिट्टी का पीएच संतुलन भी गड़बड़ा गया। इसका सीधा असर फसल की गुणवत्ता, पैदावार और किसानों की आय पर पड़ा।

इन्हीं समस्याओं से जूझते हुए अब किसान फिर से गौ-आधारित जैविक खेती की ओर लौट रहे हैं, जिसे मिट्टी, पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य—तीनों के लिए सुरक्षित माना जाता है। देसी गाय के गोबर और गोमूत्र से बनी जैविक खाद खेतों में नई जान डाल सकती है।

यह न केवल रासायनिक उर्वरकों का किफायती विकल्प है, बल्कि मिट्टी को पुन: जीवंत करने में भी सहायक है। जैविक खाद से मिट्टी में सूक्ष्म जीव सक्रिय होते हैं, पोषक तत्वों का अवशोषण बढ़ता है और फसलों की जड़ें मजबूत होती हैं। नतीजतन फसल की सेहत सुधरती है और उत्पादन स्थिर व बेहतर होता है।

घन जीवामृत क्या है?

घन जीवामृत एक ठोस जैविक खाद है, जिसे देसी गाय के गोबर और गोमूत्र से तैयार किया जाता है। यह रासायनिक खादों की तुलना में सस्ती, सुरक्षित और टिकाऊ मानी जाती है।

घन जीवामृत मिट्टी के प्राकृतिक गुणों को लौटाने में मदद करता है और लंबे समय तक खेत की उर्वरता बनाए रखता है। नियमित उपयोग से खेती की लागत घटती है और अच्छी पैदावार प्राप्त होती है।

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घन जीवामृत बनाने की सरल विधि:

  • साफ जगह पर गोबर फैलाएं।
  • उसमें गुड़, बेसन और पेड़ के नीचे की मिट्टी अच्छी तरह मिलाएं।
  • अब गोमूत्र डालकर मिश्रण को आटे की तरह गूंथ लें।
  • मिश्रण से छोटे-छोटे उपले बनाएं।
  • उपलों को छायादार स्थान पर सुखाएं, ताकि लाभकारी जीवाणु सुरक्षित रहें।
  • पूरी तरह सूखने पर घन जीवामृत तैयार हो जाता है, जिसे लगभग छह महीने तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

पशु की दुग्ध क्षमता और गर्भावस्था दोनों ही अहम

पशुपालन में समय पर गर्भाधान कराना पशु की उत्पादकता और स्वास्थ्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। आमतौर पर प्रसव के 30 से 60 दिनों बाद पशु में गर्मी के लक्षण दिखाई देने लगते हैं। ऐसे में 60 से 80 दिनों के भीतर गर्भाधान कराना सबसे उपयुक्त माना जाता है।

यदि इस अवधि में ध्यान दिया जाए तो पशु की दुग्ध क्षमता और अगली गर्भावस्था दोनों ही बेहतर रहती हैं। गर्मी के लक्षणों की सही पहचान करना भी उतना ही जरूरी है। बार-बार रंभाना, बेचैनी, दूध उत्पादन में हल्की कमी और पूंछ को बार-बार उठाना ऐसे संकेत हैं जिनसे पता चलता है कि पशु हीट में है।

इन लक्षणों के लगभग 12 घंटे बाद कृत्रिम गर्भाधान कराना सबसे प्रभावी परिणाम देता है। सर्दियों में प्रसव के बाद पशु का वजन घटने की समस्या आम है। यदि बॉडी कंडीशन स्कोर (बीसीएस) 3 से घटकर 2.5 तक आ जाए, तब भी उचित पोषण और प्रबंधन के साथ गर्भाधान संभव है।

यदि गर्भकाल में पर्याप्त आहार नहीं दिया जाए तो प्रसव के बाद हीट आने में देरी होती है। इसलिए पूरे गर्भकाल में ऊर्जा, प्रोटीन और खनिजों से भरपूर आहार देना आवश्यक है।

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