सत्संग भी करेंगे, नाम भी देंगे, दूसरा दरवाजा खोलने पर…-सत्संगियों के अनुभव -पूजनीय बेपरवाह सार्इं शाह मस्ताना जी महाराज का रहमोकरम
प्रेमी घुक्कर सिंह नम्बरदार गाँव झुम्बा भाई का, जिला भटिंडा (पंजाब)। नम्बरदार घुक्कर सिंह जी अपने सतगुरु-दाता बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज के एक अनोखे करिश्मे का वर्णन इस प्रकार करता है :-
अक्तूबर 1957 की बात है। डेरा सच्चा सौदा मौजपुर धाम बुधरवाली (राज०) में शहनशाहों के शहनशाह मस्ताना जी महाराज का सत्संग था। प्रेमी बिशनदास भावड़ा गाँव श्री जलालआणा साहिब मुझे (प्रेमी घुक्कर सिंह) प्रेरणा देकर सत्संग पर ले जा रहा था। प्रेमी तुल्ला सिंह चौकीदार और पंडित श्री चन्द कवीशर जो मेरे ही गाँव के थे, वह दोनों भी मेरे साथ थे। रास्ते में मंडी डबवाली से हमें पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज और जलालआणा साहिब के कई और सत्संगी भाई भी मिल गए। वर्णनीय है कि पूजनीय परमपिता जी तब डेरा सच्चा सौदा गुरगद्दी पर विराजमान नहीं हुए थे।
हम सभी इकट्ठे बुधरवाली दरबार में पहँुच गए। उस दिन देर रात्रि तक सत्संग चला। हम सभी ने साध-संगत में बैठकर पूजनीय शहनशाह जी का सत्संग सुना। बेपरवाह मस्ताना जी महाराज ने उसी रात सत्संग पर अपनी मौज-खुशी में आकर कोट, कम्बल, गर्म कपड़े तथा जर्सियाँ आदि बहुत सारा सामान साध-संगत में बांटा। सत्संग सुनकर मैं नाम शब्द लेने के लिए तैयार हो गया। अगले दिन मैंने दयालु सतगुरु मस्ताना जी महाराज के चरणों में नाम शब्द लेने के लिए अर्ज़ कर दी।
बेपरवाह मस्ताना जी महाराज ने फरमाया, ‘पुट्टर! नाम तो बहुत महंगा है, ऐसे नहीं मिलता।’ मैंने कहा कि सार्इं जी! महंगा-सस्ता जैसा भी हो नाम तो मुझे जरूर दो जी। सच्चे पातशाह जी ने फरमाया, ‘अभी और खा पी ले। तेरी उम्र छोटी है। फिर ले लेना।’ मैंने फिर विनती कर दी कि सार्इं जी, मैंने नाम लेना ही लेना है। बिशन दास भावड़ा ने भी मेरे को नाम दिलवाने के लिए बेपरवाह जी के चरणों में अर्ज़ की। इस पर दयालु दातार जी ने फिर वचन किए, ‘अच्छा! रात को नाम शब्द दे देंगे।’ शहनशाह जी ने बिशन दास भावड़ा की जामनी लेकर उसी रात मेरे को नाम शब्द की अनमोल दात बख्श दी। उसके बाद हमारे सारे परिवार ने भी नाम-शब्द ले लिया। मैं अकसर ही बेपरवाह मस्ताना जी महाराज के सत्संग सुनने के लिए चला आया करता था। इस तरह मुझे बेपरवाह जी के वचनों पर दृढ़ विश्वास हो गया।
सन् 1959 की बात है। मैं अपने गाँव की साध-संगत के साथ डेरा सच्चा सौदा सरसा में सत्संग सुनने के लिए आया हुआ था। सोहणे सतगुरु जी के दर्शन करके मुझे असीम खुशी मिली। हमारे गाँव की साध संगत चाहती थी कि हमारे गाँव में सत्संग हो, तो मैं और प्रेमी ईशर सिंह ने बेपरवाह मस्ताना जी महाराज के चरणों में सत्संग के लिए अर्ज़ कर दी कि सार्इं जी, हमारे गाँव को भी सत्संग की बख्शीश करो जी।
परम दयालु दातार जी ने फरमाया, ‘तुम्हारा कौन-सा गाँव है, घुदा-झुम्बा?’ हमने कहा कि हाँ जी! वही झुम्बा। खण्डों-ब्रह्मण्डों के जानने वाले सतगुरु जी ने फरमाया, ‘भाई ! जब दूसरा दरवाजा खुलेगा, तब वहां पर सत्संग करेंगे।’ हमने विनती की कि सार्इं जी! वहाँ के और भी बहुत से लोगों ने नाम लेना है जी। शहनशाह जी ने फिर अपने वचन को दोहराते हुए फरमाया, ‘भाई, वहाँ पर सत्संग भी करेंगे और नाम भी देंगे, दूसरा दरवाजा खोलने पर।’
उस समय हम बेपरवाह जी के वचनों को समझ नहीं सके थे, क्योंकि उन दिनों में शाह मस्ताना जी धाम वाला अब वाला दरवाजा (मौजूदा मेन गेट) नया बनकर तैयार हो गया था। लेकिन इस दरवाजे के बीच में कांटेदार झाड़ियाँ डालकर बंद किया हुआ था। दूसरा दरवाजा जो दरबार की पूर्व दिशा में पहले का बना हुआ था, तब तक वही चल रहा था। उस दरवाजे के आगे से ही आम रास्ता था और लोग उसी रास्ते से ही सरसा शहर से बेगू, चौपटा आदि आते-जाते थे। हमने सोचा कि यह दरवाजा (मौजूदा मेन गेट) जो कांटेदार झाड़ियों से बंद किया हुआ है इसे खोलेंगे, तभी हमें सत्संग देंगे।
कुछ दिनों बाद ही यानि 28 फरवरी 1960 को पूजनीय बेपरवाह मस्ताना जी महाराज ने पूजनीय परम पिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज को गुरगद्दी व डेरा सच्चा सौदा की तमाम जिम्मेदारी सौंप दी और वचन फरमाए, ‘हमने आज सरदार सतनाम सिंह जी को आत्मा से परमात्मा कर दिया है। ये वो ही सतनाम हैं जिसके सहारे ये सब खण्ड-ब्रह्मण्ड खड़े हैं। वो ही सतनाम जिसे दुनिया जपती है। असीं अपने दाता-रहबर सावण शाह सार्इं के हुक्म से अर्शों से लाकर तुम्हारे सामने बिठा दिया है। जो इनके पीठ पीछे से भी दर्शन कर लेगा, उसका उद्धार भी ये करेंगे।’ पूजनीय बेपरवाह जी पूजनीय परमपिता जी को बतौर दूसरे पातशाह डेरा सच्चा सौदा में गद्दीनशीन कर स्वयं 18 अप्रैल 1960 को अपनी नूरी बॉडी बदलकर ज्योति जोत समा गए।
सच्चे रूहानी फकीरों के वचन हमेशा सच्चे व युगों-युग अटल रहते हैं। परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज ने अपने पहली बॉडी वाले वचनानुसार हमारे गाँव झुम्बा में सत्संग भी फरमाया और नामभिलाषी अनेकों जीवों को नाम-शब्द भी प्रदान किया। उस समय हमें बेपरवाह मस्ताना जी के दूसरे दरवाजे के खुलने वाले वचनों की समझ आई कि सत्संग भी करेंगे और नाम भी देंगे, दूसरा दरवाजा खोलने पर। इस प्रकार शहनशाह मस्ताना जी महाराज के वचन अपनी दूसरी बॉडी में पूरे हुए व हो रहे हैं और पूज्य डॉ. एमएसजी के रूप में सब काम स्वयं हो रहे हैं। प्रेमी घुक्कर सिंह जी सतगुरु के चरणों में ओड़ निभा चुके हैं और उनका पूरा परिवार दरबार से जुड़ा है और पूज्य गुरु जी के प्रति नतमस्तक है।


































































