कोई लेने वाला हो, अंगुली पकड़कर ले जाए’-सत्संगियों के अनुभव -पूज्य हजूर पिता संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां की अपार रहमत
बहन अमरजीत इन्सां पत्नी प्रेमी मोना राम इन्सां पुत्र प्रेमी सौदागर राम लाट साहब निवासी रानियां जिला सरसा से पूज्य हजूर पिता संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां की अपने पर हुई रहमत के बारे में कुछ इस तरह से वर्णन करती हैं:-
सन् 1992 के शुरुआत की बात है। मेरे तीन बेटियाँ ही थी, बेटा नहीं था। उस दिन शाम के समय सारा परिवार घर में ही बैठा हुआ था। मेरे मन में ख्याल आया तो मैंने मेरे बापू जी (ससुर जी) से कहा कि अपने और तो कहीं जाते नहीं, न ही जाएं, अपने कल पूज्य पिता जी (पूज्य हजूर पिता संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां) के पास डेरा सच्चा सौदा सरसा दरबार चलें। पहले भी पूज्य शहनशाह मस्ताना जी महाराज ने आपको बेटा दिया है, अब पौत्रा भी वो ही देंगे।
बापूजी ने कहा कि यह तो दुनिया की दात है। पहले भी मैंने नहीं मांगा, अब भी नहीं मांगना। वे स्वयं ही देंगे। उनको सब कुछ पता है। अर्थात् पहले मैंने पूज्य सार्इं मस्ताना जी से भी नहीं मांगा, उन्होंने स्वयं ही वचन करके मुझे बेटा मोना राम दिया, अब पूज्य हजूर पिता जी जो मस्ताना जी आप ही हैं, उनका ही स्वरूप हैं, तो भी अब पूज्य हजूर पिता जी से नहीं मांगना, वो स्वयं ही दात देंगे। यह बातें हमारे घर पर (रानियां में) ही हुई।
अगले दिन सुबह हमारा सारा परिवार पूज्य हजूर पिता जी के दर्शन करने व रूहानी मजलिस सुनने के लिए सरसा दरबार में पहुँच गया। हम मजलिस सुनने के लिए सत्संग पंडाल में बैठे हुए थे। इस दौरान पूज्य हजूर पिता जी ने एक जीएसएम सेवादार के द्वारा हमें संदेशा भेजा कि आप लोगों ने हजूर पिता जी से मिलना है। हुक्मानुसार हम सभी पूज्य हजूर पिता जी की पावन हजूरी में तेरावास में अंदर जाकर बैठ गए। पूज्य गुरु जी ने बापूजी (मेरे ससुर जी) से मुखातिब होते हुए पूछा कि लाट साहब, तुम्हारे कितने पोते-पोतियाँ हैं? पूज्य गुरु जी ने उनसे तीन बार पूछा कि लाट साहब, बोलो।
तो लाट साहब बोले कि आपजी को पता ही है सब, पिता जी कि कितने हैं? फिर मेरे पति मोना राम बोले कि पिता जी, हमारे तीन बेटियाँ ही हैं। सर्व-सामर्थ सतगुरु जी ने फरमाया ‘कोई लेने वाला हो, हमें तो लेने वाला कोई नहीं दिखता, उंगल पकड़कर ले जाए।’ इस प्रकार वचन फरमाते हुए पूज्य पिता जी ने हमें बिन मांगे ही अपनी अपार खुशियां बख्श दी।
गर्भ में बच्चा जब तीन महीने का हुआ तो मैंने अपने परिवार से कहा कि मुझे अपने गुरु पर पूर्ण विश्वास है। मेरे बापू जी कहने लगे कि लेकिन बेटा आपां जच्चा-बच्चा की स्वास्थ्य जाँच तो करवा ही लेते हैं। तो हमने सरसा शहर के एक अस्पताल से जच्चा-बच्चा की स्वास्थ्य जाँच करवाई। पूज्य पिता जी की रहमत से रिपोर्ट के अनुसार जच्चा-बच्चा दोनों ही बिल्कुल स्वस्थ थे।
नवंबर 1992 में हमारे घर लड़के ने जन्म लिया। इससे भी बड़ी खुशी कि बच्चा तब दस दिन का था, उसी दिन पूज्य हजूर पिता जी सतगुरु धाम रानियां दरबार में पधारे हुए थे। वहाँ दरबार में पूज्य गुरु जी ने रूहानी मजलिस लगाई। मजलिस के बाद पूज्य पिता जी ने हमारे परिवार को अपने पास बुलाया। सारा परिवार नवजन्मे बच्चे को लेकर पूज्य गुरु जी की पावन हजूरी में था। मेरे बापूजी ने अर्ज़ की कि पिता जी, काकू का नाम रख दो जी। पूज्य गुरु जी ने पूछा कि ‘इसके पापा का क्या नाम है?’ बापू जी ने बताया कि पिता जी, उसका नाम पूज्य सार्इं मस्ताना जी महाराज ने मोना राम रखा है।
इस पर पूज्य पिता जी ने फरमाया कि बच्चे का नाम हम केसा राम रखते हैं। तो इस दौरान परिवार से पूज्य पिता जी ने तीन बार पूछा कि भाई! तुम्हें अच्छा लगता है? हमने कहा कि हाँ जी, पिता जी, बहुत बढ़िया है जो आपजी ने रख दिया। फिर बापू जी से पूछने लगे कि लाट साहब, जब लड़का होता है तो तुम क्या बनाते हो, क्या बांटते हो? बापू जी कहने लगे कि हमारे शरीके-कबीले में हम चूरी (चूरमा) बना कर बांटते हैं। तो पूज्य पिता जी ने फरमाया कि हम भी तो तुम्हारे हैं भाई। हम भी चूरी खाएंगे। कल को बना कर ले आना। इस दौरान मैं खड़ी हो गई और अर्ज़ करने लगी कि पिता जी, आपजी के वचनों की काट तो नहीं करनी चाहिए, परंतु यह काम बहुत बड़ा है, तुरंत होना मुश्किल है
और हमें एक दिन की मोहलत दे दो जी। पूज्य हजूर पिता जी ने कहा कि यह कोई वचन काट नहीं बेटा। कल नहीं होता तो कोई बात नहीं, परसों ले आना। फिर हम चूरी बनाकर सरसा दरबार में पहुँच गए। हमारी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। हमें पुत्र की अनमोल दात बख्शी और फिर उसका नाम भी रखा तथा उसके जन्म की खुशियों को बड़ा करते हुए चूरी भी बनवाई।
इस प्रकार प्यारे हजूर पिता जी ने हमें बेशुमार खुशियाँ और अपना प्यार बख्शा। पूज्य पिता जी के पवित्र चरणों में दृढ़ विश्वास सहित यूँ ही सेवा-सुमिरन करते हुए ओड़ निभ जाए, हमारे पूरे परिवार की अपने सतगुरु-दाता से यही अरदास है जी।


































































