Experiences of Satsangis

बेटा, नाम का सुमिरन करना, दिन-रात नशा नहीं उतरेगा’ -सत्संगियों के अनुभव – पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज की दया-मेहर

प्रेमी सोहन लाल पुत्र श्री बृजलाल गाँव पक्खों कलां जिला बरनाला (पंजाब)। प्रेमी जी अपने मुर्शिद-प्यारे पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज की अपने पर हुई रहमतों का वर्णन करते हुए बताते हैं:

सन् 1972 की बात है। मैं शाम के समय अपने खेत में चक्कर लगा कर घर की ओर आ रहा था। रास्ते में कुछ आदमी आपस में लड़-झगड़ रहे थे। मैं उनके पास रूक गया। मैंने तब शराब पी रखी थी, तो मैं भी उनके आपसी लड़ाई-झगड़े में शामिल हो गया। इसी दौरान हमारी पत्ती अर्थात् पड़ोस का एक प्रेमी भाई मग्घर सिंह मेरे पीछे आकर खड़ा हो गया। उसने हमदर्दी के लिए मेरी बाजू पकड़ ली कि मैं उस लड़ाई में शामिल न होऊं, लेकिन मैं शराब के नशे में धुत था।

मैंने कहा, प्रेमिया! या तो आज के बाद मेरे पीछे आकर कभी खड़े न होना या फिर तुम्हारे सरसे वाले संतों से मेरी शराब छुड़वा दे। वह प्रेमी भाई भी शायद यही चाहता था। उस दिन शनिवार था। अगले दिन ही डेरा सच्चा सौदा दरबार में रविवार का माहवारी सत्संग था। वह भाई कहने लगा कि कल को ही सरसा चलते हैं। मैंने घर आकर खूब शराब पी और घरवालों को कहा कि आज ही पीनी है। पहले तो मैं बहुत लेट सुबह उठता था, परंतु उस दिन सुबह चार बजे उठ गया, क्योंकि किसी अनजान व्यक्ति ने मुझे बाजू से पकड़ कर उठा दिया था।

मैं सुबह जल्दी उस प्रेमी भाई मग्घर सिंह के घर चला गया। हम दोनों पक्खों कलां से बस द्वारा सरसा की तरफ चल पड़े। रास्ते में कई रुकावटें आई। प्रेमी भाई कहने लगा कि सोहन लाल वापिस चलें, फिर आ जाएंगे। परंतु मेरे मन में था कि आज ही सरसा दरबार में पहुँचना है और संतों के दर्शन करने हैं। जैसे-तैसे हम डेरा सच्चा सौदा सरसा दरबार में पहुँच गए। उस समय सत्संग की कार्यवाही चल रही थी। पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज शाही स्टेज पर विराजमान थे। हम परमपिता जी को सजदा करके संगत में बैठ गए। उस समय जो शब्द बोला जा रहा था उसकी टेक है:-

‘‘प्रेम दा नशा अनोखा, जाणे जिस चक्खेया प्यारे।
चढ़ जे ना लैहंदा मुड़के, संत पुकारन सारे।’’

मुझे मेरे अंदर से ऐसा महसूस हो रहा था कि जैसे संत (पूजनीय परमपिता जी) मुझे ही कह रहे हैं। मेरे मन में था कि कौन सा समय हो जब मुझे नाम शब्द मिल जाए। सत्संग की समाप्ति के बाद मैं नाम शब्द लेने वालों में जाकर बैठ गया। जब परमपिता जी नाम देने के लिए आए तो मैं खड़ा हो गया। मैंने अर्ज़ की कि पिता जी, मैं बहुत शराब पीता हूँ। परमपिता जी ने पूछा कि कितनी पी जाते हो? मैंने बताया कि हर रोज पाँच बोतलें पी लेता हूं।

परमपिता जी ने फरमाया ‘बेटा, नाम का सुमिरन करना, दिन-रात नशा नहीं उतरेगा।’ मैंने नाम-शब्द ले लिया और शराब की तरफ देखा तक नहीं। मुझ पर सतगुरु के प्यार का ऐसा नशा चढ़ा कि मैं पाँच-पाँच घंटे बैठकर सुमिरन का अभ्यास करता रहता। कुछ ही दिनों में मेरे घर-परिवार के हालात भी बदल गए और सब कुछ नॉर्मल यानि बिल्कुल ठीक हो गया। उसके बाद पूजनीय सतगुरु जी की रहमत से मैंने अपने-आपको मानवता की सेवा में अर्पित कर दिया। अकेला मैं ही नहीं, बल्कि मेरा सारा परिवार भी मेरे साथ मानवता की सेवा में लग गया।

उस समय भरपूर फसल हुई:-

अक्तूबर 1980 की बात है, मैं सरसा दरबार से पूज्य परमपिता जी के साथ ही डेरा सच्चा सौदा बरनावा (उत्तर प्रदेश) चला गया। वहाँ पर उन दिनों साध-संगत की सुविधा व आराम करने के लिए कमरों की उसारी का जोर-शोर से सेवा-कार्य चल रहा था। मेरे घर में फसल संभालने वाला कोई नहीं था, क्योंकि बच्चे छोटे थे। नरमे की फसल भी पूरी तरह से खिल चुकी थी और चुगाई का समय निकल रहा था। पूज्य परमपिता जी ने इसी दरमियान अचानक से ही सरसा दरबार वापिस लौटने का कार्यक्रम बना लिया। घट-घट के जानणहार सतगुरु दातार जी ने मुझे तथा मेरे गाँव के सेवादार तुलसा सिंह को अपने पास बुलाया। पूजनीय पिता जी ने तुलसा सिंह को वचन फरमाया कि भाई! तू अपने गाँव पक्खों कलां चला जा।

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यहाँ पर तो सेवा चल रही है और सोहन लाल तो यहीं पर ही रहेगा। तू अपने घर का काम संभाल लेना, साथ में सोहन लाल के खेतों में नरमे की चुगाई भी करवा देना, क्योंकि इसके बच्चे छोटे हैं। तुलसा सिंह हुक्मानुसार पक्खों कलां पहुँच गया। अगले ही दिन मजदूर लेकर उसने मेरे खेत में नरमे की चुगाई करवाई और नरमा हमारे घर पहुँचा दिया और साथ में परमपिता जी द्वारा भेजा गया प्रशाद भी हमारे घर में दे दिया। वहाँ दरबार में करीब डेढ़-दो महीने तक सेवा चलती रही और अपने मुर्शिद-प्यार के हुक्मानुसार मैं वहीं बरनावा दरबार में रहा।

पूजनीय परमपिता जी के आदेशानुसार जब मैं डेढ़-दो महीने के बाद अपने गाँव पहुंचा तो मेरे बच्चों ने यह बात मुझे बताई कि मेरे घर से जाने के बाद एक दिन जब नरमा पूरी तरह से खिला हुआ था तो आसमान में काली घटाएं छा गई थी। ऐसे लगता था कि आंधी-तूफान के साथ तेज बारिश भी आएगी और खिला हुआ सारा नरमा झड़कर पूरी फसल खराब हो जाएगी और हमारे देखते ही देखते दक्षिण दिशा की तरफ बारिश शुरु भी हो गई। उस समय दस एकड़ में नरमे की फसल पूरी तरह से खिली हुई थी। बारिश का यह दौर हमारे खेत से करीब 15 एकड़ ही दूर था।

बारिश नजदीक पहुँचते-पहुँचे हमारे पड़ोसियों के खेत तक आ पहुंची। लेकिन हमारे खेत की मेड़ (डौल) तक आकर एकदम से रूक गई। हमारे खेत में बारिश का एक बूंद भी पानी नहीं बरसा। हवा भी बंद हो गई। हमारे वे पड़ोसी जो पहले यह कह रहे थे कि तुम्हारा बाप तो सरसा डेरे में ही फिरता है, तुम्हारे नरमे का क्या बनेगा? सतगुरु-दाता का ऐसा अनोखा करिश्मा देखकर वही पड़ोसी कहने लगे कि तुम्हारे सरसे वाले बाबा जी ने तो तुम्हारे नरमे पर छायावान लगा दिया है। तुम्हारे खेत में तो एक बूँद भी नहीं गिरी और हमारा तो सारा नरमा भीग गया है। उस वर्ष हमारे खेत में नरमे की इतनी ज्यादा फसल हुई कि सभी रिकार्ड टूट गए। जबकि अधिकतर घरों का नरमा तेज बारिश के कारण खराब हो गया था, अथवा बहुत ही कम फसल उनके घरों में आई। सतगुरु जी ने हमें नकदो-नकद सेवा का मेवा बख्श दिया।

बेटे का नुकसान होना था, वह कर्म बैल पर कट गया

सन् 1985 की बात है। मैं डेरा सच्चा सौदा सरसा में सेवा पर आया हुआ था। तब मेरी दरबार की सेवा समिति में ड्यूटी थी। इस दौरान कभी-कभी पावन हजूरी में स्टेज के पास प्रेमी सेवक की ड्यूटी भी निभाया करता था। उन दिनों पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज ने जीवोद्धार यात्रा पर पंजाब के डेरा सच्चा सौदा सांझा धाम मलोट जाना था। मुझे भी अपनी सेवा के अनुसार परमपिता जी के साथ जाना था। परंतु घट-घट के जानणहार दयालु दातार सतगुरु जी ने मुझे आदेश दिया कि सोहन लाल, तू अपने गाँव जाकर वहाँ से ही मलोट दरबार में आ जाना। पूज्य परमपिता जी के हुक्मानुसार मैं अपने गाँव पक्खों कलां चला गया। घर पहुँचने पर पता चला कि अचानक एक बैल की मौत हो गई है।

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सन् 1979 में पूज्य परमपिता जी ने मुझे दो बैल दात के रूप में दिए थे और यह भी वचन फरमाया था कि घर में हल-गड्डे के काम में लेना। उन दिनों गेहूँ की फसल पकी हुई थी और खेतों में गेहूं निकालने का काम जोरों पर था। मेरे लड़के मेघराज ने बताया कि वह जब गेहूँ निकालने वाला थ्रैशर चला रहे थे तो भाई भोला सिंह जो मशीन में अपने हाथों से गेहूँ डाल रहा था, तो उसे ऐसा महसूस हुआ, जैसे मशीन उसके हाथ को अंदर की ओर खींच रही है। मेघराज ने भोला सिंह से कहा कि तुझे वैसे ही भ्रम हो रहा है, तू नीचे उतर, मैं गेहूँ डालता हूँ। यह कहकर वह उस कार्य में लग गया। मेघराज ने बताया कि पाँच मिनट के बाद मुझे भी ऐसा ही महसूस हुआ कि मशीन हाथ को अंदर खींच रही है।

उसने अपने भाई को आवाज देकर मशीन बंद करवा दी। उनका छोटा भाई भूपेंद्र सिंह भी वहीं था। वह कहने लगा कि काम सही चलाओ, इस तरह तो काम पूरा नहीं होगा और ऊपर से मौसम भी खराब है, गेहूँ भीग गई तो कुछ नहीं हो पाएगा। इतनी देर में माता जी उनके लिए चाय लेकर आ गई, क्योंकि खेत में वहाँ तब हमारा घर था। तो सभी चाय पीने लगे। तभी देखते ही देखते एक बैल खड़ा-खड़ा अचानक जमीन पर गिर पड़ा। हम सभी भागकर गए और देखा तो दो मिनट में ही उसके प्राण निकल गए। यह देखकर हम सभी रोने लगे। तब पूजनीय परमपिता जी ने हम बच्चों को अंदर से हौंसला देकर हमारी संभाल की। जब अपने लड़के से यह सुना तो उनसे कहा कि कोई फिक्र न करो, सतगुरु जी ने दात दी थी, शायद उसको ऐसा ही मंजूर है। मैं परिवार को सांत्वना देकर मलोट दरबार पहुँच गया।

पूजनीय परमपिता जी को तो सब पता ही था। फिर भी उन्होंने आने-बहाने मुझसे पूछ ही लिया कि बेटा सोहन लाल, सब ठीक है? मैंने अर्ज़ की कि पिता जी, आपजी की दया-मेहर है जी। फिर मुझसे रहा नहीं गया। मैंने सारी घटना परमपिता जी से कह सुनाई। जब मैंने उपरोक्त सारी बात बताई तो पूजनीय परमपिता जी कहने लगे कि बेटा, तेरे लड़कों में से एक लड़के का मशीन से नुकसान होना था, जो बेपरवाह जी ने बैल पर काट दिया। बेटा फिक्र नहीं करना।’ सतगुरु जी अपनी रूहों, अपने जीवों की हर पल फिक्र करते हैं। उनकी हर पल संभाल भी करते हैं। वो अपने शिष्यों की सूली को सूल बनाकर काट देते हैं। प्रेमी जी लिखते हैं कि हमारा पूरा परिवार सतगुरु का ऋण कभी चुका नहीं सकता।
बता दें कि प्रेमी सोहन लाल जी इन्सां सतगुरु के चरणों में ओड़ निभा गए हैं जी।