Chennai

सांस्कृतिक नगरी चेन्नई का सौंदर्य Chennai

आधुनिक भारत के निर्माण में हर स्तर पर अपनी विशिष्ट भूमिका का निर्वाह करते हुए दक्षिण भारत की राजधानी के रूप में प्रशस्ति प्राप्त मद्रास का इतिहास साढे तीन सौ वर्ष पुराना है। 22 जुलाई, 1669 ई. को मद्रास के इस भूखंड को दामेर्ल वेंकटप्प नायक ने अपने भाई चेन्नप्पनायक के नाम पर ब्रिटिश अधिकारी फ्रंसिस डे को सौंप दिया था। अत: चेन्नप्प के नाम इस बस्ती का नामकरण ‘चेन्नप णम’ हुआ। एक दंतकथा के अनुसार एक मुतरासु वंशी ने यह प्रदेश ईस्ट इण्डिया कंपनी को बेच दिया था। अत: कालांतर में मुतरासु शब्द मदरासु नाम से लोकप्रिय हुआ। 1996 में पुन: इसका ‘चैन्नै’ कर दिया गया।

इसके पूर्व इस भूभाग पर थोड़े समय के लिए पुर्तगालियों ने भी अपना अड्डा जमा लिया था। अब जहाँ फोर्ट सेंट जार्ज किला है, उस स्थान को कालहस्ती के राजा ने ईस्ट इंडिया कंपनी को प्रदान किया था। कंपनी ने इस किले का निर्माण शासन संबंधी कार्यकलापों के निमित्त किया था। उसे वे लोग ‘व्हाइट हाउस’ के नाम से पुकारते थे और स्थानीय जनता के निवास स्थल को ब्लैक टाउन के नाम से। कंपनी ने कालांतर में आंध्र, तमिलनाडु, कर्नाटक तथा केरल के अधिकांश भूभाग पर कब्जा कर उस भूभाग का ‘मद्रास पे्रसिडेंसी’ कर दिया।

Chennai tबंगाल की खाड़ी के तट पर स्थित चेन्नई अपने अनुपम वैभव के लिए विख्यात है तो यह नगर सभी धर्मावलंबियों का केंद्र-स्थल भी रहा हैं। पार्थसारथी मंदिर, अगस्त्य मंदिर, सुब्रह्मण्य स्वामी या मुरूगन मंदिर, अष्टलक्ष्मी मंदिर, कोदण्ड रामस्वामी मंदिर, शिव-विष्णु मंदिर, मांगाडु भगवती मंदिर इत्यादि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। वैसे 1680 ई. में ईस्ट इंडिया कंपनी ने सेंट मेरीस के नाम से प्रथम चर्च का निर्माण किया। सेंट थामस यहाँ की एक पहाड़ी पर रहे जो ‘सेंट थामस माउंट’ के नाम से प्रसिद्ध है। 1795 में वालाजा मस्जिद निर्मित हुई तो नगर की सबसे बड़ी मस्जिद सहस्त्र दीप (थाउजेंड लाइट) क्षेत्र में स्थित है। मद्रास महानगर में जैन धर्मावलंबियों की संख्या भी कम नहीं है। त्यागराय नगर में निर्मित शांतिनाथ जैन मंदिर धार्मिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि स्थापत्य एवं कलात्मक दृष्टि से भी अनुपम बन पड़ा है। पास ही गुरूद्वारा है।

मूर्तिकला की दृष्टि से देखा जाए तो पाश्चात्य एवं प्राच्य शैलियों की उत्कृष्ट मूर्तियां-यत्र-तत्र निर्मित है। केवल मंदिर ही नहीं लगभग हर चौराहे पर मूर्तियों की भरमार देखकर कहा जा सकता है कि चेन्नई मूर्तियों का नगर है। चित्रकला की दृष्टि से भी विशिष्ट पहचान रखने वाले इस नगरी में मंदिरों की भित्तियों पर ही नहीं बल्कि संग्रहालयों में तथा कतिपय भवनों, सभागारों में भी चित्रकला के अद्भुत नमूने देखे जा सकते हैं।

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अन्य महानगरों से भिन्न यहाँ के निवासी व्यस्त जीवन में से समय निकालकर अपनी सांस्कृतिक विरासत को अक्षुण्ण बनाये रखने का प्रयास करते नजर आते हैं। इसकी झलक हमें सूर्याेदय के साथ प्रत्येक परिवार के घर व आंगन में कलात्कता का परिचय देने वाली रंगोली, तुलसीकोट की परिक्रमा, स्नान, संध्या वंदन, सूर्य नमस्कार, पूजा-अर्चना में मिलती है। उत्सवों में जनवरी माह में आने वाला पंच-दिवसीय पोंगल प्रमुख है। इसके अलावा सभी मुख्य त्यौहार जैसे दीपावली, ईद, क्रिसमस आदि भी हर्षाेल्लास से मनाये जाते हैं। शहर में विभिन्न स्थानों पर अल्पाहार के रूप में पोंगल, दोसा, इडली, वड़ा, आदि मिलते हैं जिसको गर्मा-गर्म या ठंडी कॉफी के साथ परोसा जाता है।

चेन्नई को सुपर प्रसारित नगर कहते हैं, यहाँ अनेक दर्शनीय स्थल हैं जिनमें मद्रास विश्वविद्यालय, चेपक महल, कपिलेश्वर और पार्थसारथी का मंदिर, अजायबघर और चिड़ियाघर आदि प्रमुख हैं। चेन्नई का एक अन्य महत्त्वपूर्ण आकर्षण है सेंट जार्ज फोर्ट। 1640 में फ्रांसिस डे द्वारा बनवाया यह किला ईस्ट इंडिया कंपनी का व्यापारिक केंद्र था। चेन्नई का मरीना बीच पर्यटकों का प्रमुख आकर्षण है। यह विश्व का दूसरा सबसे लंबा समुद्र तट है। इसके दो सौ से तीन सौ गज चौड़े रेतीले तट पर शाम को इतनी अधिक भीड़ होती है कि लगता है मानो सारा शहर वहीं आ गया है।

सारे दिन की थकान को चेन्नई वासी शाम को मरीना बीच की अथाह जल राशि में बहा देना चाहते हों। यहाँ समुद्र की गहराई और लहरों के तेज प्रवाह के साथ शार्क मछलियां भी हैं। मरीना तट का उत्तरी भाग समाधि-स्थल के रूप में विकसित किया गया है जिसका प्रवेश द्वार दो विशाल हाथी दाँत के रूप में बनाया गया है। यहाँ एक मशाल हमेशा प्रज्ज्वलित रहती है। वैसे चेन्नई में अनेक बीच हैं लेकिन तीन ही सर्वाधिक लोकप्रिय एवं प्रमुख है- मैरिन बीच, केविलोंग बीच और एलियटस बीच। केविलोंग बीच शहर से 40 किमी की दूरी पर है तो मेरिन बीच रेलवे स्टेशन के बिल्कुल पास है। शाम 5 बजे हम अष्टलक्ष्मी मंदिर देखने के बाद बसंद नगर स्थित एलियटस बीच पहुंचे।

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वहाँ हमने कुछ देर समुद्र की लहरों के उतार-चढ़ाव को अवलोकन किया, केले के पकोड़े खाये और चाय पी। प्रथम बार खाए केले के पकौड़ों का स्वाद आज भी ताजा है। चेन्नई का स्नेक पार्क भी पर्यटकों को प्रभावित करता है। यह अपनी तरह का एक अलग ही पार्क है जिसका निर्माण रोमुलस व्हिटेकर नामक अमेरिकी ने किया था। यह पाँच सौ से भी ज्यादा खतरनाक भारतीय साँपों का जीवित संग्रहालय कहा जा सकता है। रेंगते हुए ये विषधर भय मिश्रित रोमांच पैदा करते हैं। यहाँ पर साँपों के अलावा सरीसृप वर्ग के अन्य जीव जैसे मगरमच्छ, घड़ियाल इत्यादि भी रखे गए हैं।

चेन्नई महानगर की कलात्मक संस्कृति के दर्शन पैंथियान रोड स्थित नेशनल आर्ट गैलरी में सहज ही किए जा सकते हैं। एक समय में संकुचित शहर कहलाने वाले चेन्नई में आज सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) कम्पनियां और डिस्कोथेक की भरमार है। गरमा-गरम काफी, कुरकुरा डोसा, नरम इडली, यह वे चीजें हैं जो कभी नहीं बदली हैं, लेकिन पिछले दो दशकों में मद्रास या कहें चेन्नई में काफी बदलाव आ गए हैं।

धार्मिक दृष्टिकोण से संपूर्ण दक्षिण भारत एक तीर्थ है जहाँ वास्तुकला और मूर्तिकला के अद्वितीय उदाहरण हैं। इन मंदिरों में भव्यता और कलाशिल्प देखने योग्य है। उत्तर भारत से एकदम अलग शैली के मंदिर होने के बावजूद श्रद्धा और भक्ति में ये समस्त भारतीय आस्तिकों को आकर्षित करते हैं। तिरुषैलिफेनी स्थित पार्थ सारथी मंदिर के लिए उल्लेख है कि इसका निर्माण आठवीं शताब्दी में राजा पल्लव ने करवाया था। इस देवस्थान की दीवारों पर सुंदर कलाकृतियाँ अंकित हैं।

दूसरा आकर्षक मंदिर है द्रविड़ शिल्पकला में निर्मित मिलापोर स्थित कालीश्वर मंदिर। यहाँ माता पार्वती की उपासना की गाथा अंकित है। समुद्र की रेत से तपता यह क्षेत्र अत्यंत गरम जलवायु लिए हुए है जो केले, नारियल और पाम के पेड़ों से खूबसूरत लगता है। दोपहर भूख लगी तो हमने लाल केले खाये और नारियल पानी के बाद उसकी कच्ची गरी का आनंद लिया। उत्तर से दक्षिण को जोड़ने वाले इस यादगार सफर में हमें जहाँ भारत की विविधता को करीब से देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, वहीं राष्ट्रीय एकता से भी साक्षात्कार हुआ। समुद्र की लहरों के उतार चढाव को देख जीवन के विभिन्न सोपानों को समझने का अवसर मिला। -विनोद बब्बर