Experiences of Satsangis

पुट्टर! अब काल चार साल तक तेरे पास नहीं आएगा।’ -सत्संगियों के अनुभव

पूजनीय बेपरवाह सार्इं शाह मस्ताना जी महाराज का रहमो-करम

प्रेमी कबीर, गाँव मोहमदपुर रोही जिला फतेहाबाद (हरियाणा) अपने सतगुरु-मौला पूजनीय बेपरवाह सार्इं शाह मस्ताना जी महाराज के एक अलौकिक करिश्मे का वर्णन करते हुए बताते हैं कि गाँव मोहमदपुर रोही में जूते गांठने वाला एक मोची भाई रहता था, जिसका नाम पतराम था। गाँव वाले उसे ‘पतिआ-मोची’ कहा करते थे। उसने सच्चे पातशाह सार्इं मस्ताना जी महाराज से नाम-शब्द प्राप्त किया हुआ था।

सन 1954 की बात है कि एक दिन सुबह पतराम को मामूली सा बुखार हुआ तथा उसी दिन के बारह बजे उसकी मृत्यु हो गई। घर में रोना-धोना शुरु हो गया। पतराम की अचानक मृत्यु की खबर सारे गाँव में जंगल की आग की तरह फैल गई। गाँव के लोग उसके घर में इकट्ठे होने शुरु हो गए। एक आदमी को फतेहाबाद से कफन लेने के लिए भेजा गया। वह आदमी जब वापिस अपने गाँव मोहमदपुर रोही में पहुँचा तब तक अंधेरा हो चुका था, क्योंकि उन दिनों आने-जाने का आम कोई साधन नहीं था। इसलिए वह आदमी पैदल ही फतेहाबाद गया और पैदल ही वापिस आया। अंधेरा होने की वजह से उस दिन पतराम का अंतिम संस्कार न हो सका, क्योंकि ये पुरानी रीत चली आ रही है कि मुर्दे को रात्रि को जलाया नहीं करते। इसलिए पतराम की मृतक देह को रातभर घर पर ही रखना पड़ा।

रात के समय सौ के करीब आदमी पतराम के घर में उस शोक में शामिल थे जिसमें से कुछ सो रहे थे और कुछ बातें कर रहे थे। इनमें से कुछ तो गाँव वाले ही थे और कुछ पतराम के रिश्तेदार व सगे-संबंधी थे। अचानक रात के साढ़े बारह बजे पतराम उठकर बैठ गया। वहाँ पर उपस्थित लोग पतराम को ऐसे बैठा देखकर घबरा गए और हैरान भी थे कि हैं! ये क्या हो गया! कई तो डर से भागने लगे थे। इतने में पतराम हाथ उठा कर कहने लगा कि तुम डरो मत! बैठे रहो सभी। मैं आपको सारी कहानी बताऊँगा। फिर उसने चाय मांगी। घर वालों ने उसे चाय का कप बना कर दिया।

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चाय पीकर उसने उस दरमियान खुद के साथ बीती सारी कहानी (सच्चाई) बताई। उसने बताया कि चार यमदूत जो बड़े-बड़े भयानक आकार के थे, उसे धर्मराज के पास ले गए। धर्मराज की कचहरी लगी हुई थी। धर्मराज बहुत न्यायकारी व सच्चा अफसर माना जाता है। वह बारह घंटे तक अपने दफ्तर की किताबें देखता रहा। आखिर में धर्मराज ने कहा कि इसमें इसका कहीं भी नाम नहीं है। वह किसी ‘परम संत’ का चिताया हुआ (नाम-लेवा) जीव है।

जब धर्मराज उपरोक्त बातें कह रहा था तो उसी क्षण पूर्ण सतगुरु बेपरवाह सार्इं शाह मस्ताना जी महाराज वहाँ पर अपने नूरी स्वरूप में प्रकट हुए। कुल मालिक सतगुरु जी ने धर्मराज को डांटते हुए कहा, ‘यह हमारा नाम-लेवा जीव है। आप इसे यहाँ पर क्यों लेकर आए हो?’ धर्मराज ने शहनशाह जी से माफी मांगते हुए अर्ज़ की कि हे दीन दयाल जी, वह इसे गलती से ले आए हैं। सतगुरु बख्शणहार दातार जी ने धर्मराज को हुक्म दिया, ‘इसको अभी ही वापिस इसके चोले में छोड़ कर आओ। ’ फिर अंतर्यामी दातार जी ने पतराम को वचन फरमाए, ‘पुट्टर! तू चार वर्ष तक और जिंदा रहेगा। अब चार साल तक काल तेरे पास नहीं आएगा। जो जीव पूर्ण सतगुरु से नाम-दान ले लेते हैं, उनका नाम धर्मराज की किताब में से कट जाता है।’ इतना कहते ही बेपरवाह मस्ताना जी अलोप हो गए और मैं वापिस अपने शरीर में आ गया।

उन दिनों में शहनशाह मस्ताना जी महाराज डेरा सच्चा सौदा अमरपुर धाम (मोहमदपुर रोही) में पधारे हुए थे। इसलिए सुबह गाँव के करीब दो सौ आदमी पतराम को साथ लेकर दरबार अमरपुर धाम में पहुंचे। पतराम ने दोनों हाथ जोड़कर पूजनीय बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज के पवित्र चरणों में रात वाली सारी कहानी सुनाई। इस पर बेपरवाह जी ने वचन फरमाए, ‘जब असीं जीव को नाम दे देते हैं तो सतगुरु काल से छुड़ाकर जीव की डोर अपने हाथ में ले लेते हैं। आज इस घोर कलियुग में लोग नाम कम जपते हैं। नाम में तो इतनी शक्ति है कि काल-महाकाल भी उस जीव के नजदीक नहीं आ सकता। काल का सभी कर्जा नाम मुका देता है। इसीलिए तो नाम लेना जरूरी है।’

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बेपरवाह मस्ताना जी महाराज के वचनानुसार प्रेमी पतराम उपरोक्त घटना से ठीक चार साल बाद अपना शरीर छोड़कर अपने सतगुरु के साथ अपने वतन सतलोक में चला गया। जैसा कि बेपरवाह जी ने फरमाया था। इस घटना से स्पष्ट है कि जो जीव पूर्ण सतगुरु से नाम ले लेते हैं, वे काल के दायरे से बाहर हो जाते हैं। काल नाम वाले जीवों का कुछ नहीं बिगाड़ सकता। नाम वाले जीव सतगुरु के हो जाते हैं। सतगुरु स्वयं अपने जीवों की पल-पल संभाल करता है और अंत समय अपने उन जीवों का स्वयं उनके अंतर-मुख प्रकट होकर अपने साथ निजधाम ले जाता है। इस प्रकार पूर्ण सतगुरु की शरण लेने वाले जीव हमेशा के लिए मोक्ष पद को प्राप्त कर लेते हैं। सभी धर्मों के अनुसार मनुष्य जन्म का मूल उद्देश्य भी यही है।