आई मिलन की बेला सुहानी -सम्पादकीय Editorial
शुभ स्वागत! शुभ स्वागत! प्यारी जनवरी तेरा शुभ स्वागत! हमारे लिए तुम खुशियों भरा संदेश लेकर आई हो। हवाओं में, फिजाओं में मस्ती भरा दौर है। बाग-बहारें छा गई हैं। आलम मस्त-कलंदर हो गए हैं। बख्शिशों की रुत आ गई है। बरकतों भरे भंडारे सज गए हैं। खुशियों के मजमे लग गए हैं। कण-कण अभिवादन में मदमस्त हो गए हैं। दो जहां में ये चर्चा हो गई है। ‘धरा पे मिलन आसमां का करने खुदा चलके है आ गया’ वो वाली दो जहां है, वो साथी दो जहां है।
प्यारी जनवरी का यह शुभ संदेश रूहानी नज़ारों का खज़ाना है। ऐसे नज़ारे जो कहने-सुनने से परे हैं, जिनकी किसी से तुलना भी नहीं की जा सकती। वो नज़ारो अपने आप में नायाब हैं। जिसको भी मिल गए वो नूर-ओ-नूर हो गया। ऐसे नूर-नूरानी, रूहानी नज़ारे लेकर आए अनामी के वासी परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज। उनके मुबारक आगमन का पाक-पैगाम प्यारी जनवरी लेकर आई। उनके दीदार-ए-पाक के चश्म खिल गए। रूहें इस आनन्द विहार में मग्न हो गई हैं।
परमपिता शाह सतनाम जी महाराज कुल मालिक का इस पवित्र जनवरी महीने में शुभ आगमन पूरी कायनात को अपने रूहानी नजारों से लबरेज कर देने वाला है। वो कुल मालिक है, दोनों जहानों के रचनहार हैं। उनका मनुष्य की देह में आना सम्पूर्ण प्राणी जगत के लिए आलौकिक चमत्कार है। बंदे का चोला धार के धरत पे आने का मकसद रूहों का कल्याण करना ही है। रूहों को अपने प्यार से सराबोर करना। अपनी नज़र-मेहर से नवाजना और उनको मोक्ष-मुक्ति का सीधा व सरल मार्ग दिखाना है।
संत-सतगुरु रूहों के सौदागर होते हैं। वो रूहों का वणज-व्यापार करते हैं। वो रूहानी प्यार के अथाह समंदर होते हैं। सब को सच्चा प्यार बांटते हैं और सच्चे प्यार के बारे समझाते हैं। निजधाम-निजघर की बातें करते हैं। वो रूहों को याद करवाते हैं कि तुम अपने मालिक से बिछुड़ी हुई हो। काल देश के माया जाल में फंस कर अपने मालिक व अपने देश को भूल चुकी हो। जन्मों-जन्मों से तुम यहाँ भटक रही हो। चौरासी लाख जूनियों की मार तुम पर पड़ रही है। इस आवागमन से बचने का मौका है। तुम्हें मनुष्य जन्म मिल चुका है। यह दुर्लभ जन्म है। अब चूक गए तो फिर दोबारा नहीं मिलेगा। ये कोई बातें नहीं, बल्कि संत-सतगुरु के वचन होते हैं और जो उन पर विश्वास कर लेते हैं वो निजधाम भी पहुंच जाते हैं।
सतगुरु ऐसी भागों वाली रूहों को अपने साथ लेकर जाते हैं। यही नहीं, जो उनसे प्यार-मोहब्बत करते हैं, उन्हें इस मातलोक में भी कोई कसर-कमी नहीं छोड़ते। लेकिन आम जीवों को कई बार यह सब माजरा समझ ही नहीं आता। वो संत-सतगुरु के बंदे के चोले को तवज्जो नहीं देते। वो आम बंदे की तरह ही उन्हें समझने लगते हैं। यही उनकी सबसे बड़ी भूल होती है। संत-सतगुरु की बंदे से तुलना नहीं हो सकती। उनके जन्म लेने में ही जमीन-आसमान का फर्क होता है, क्योंकि मनुष्य पिछले कई जन्मों के संचित कर्मों का बोझ लेकर पैदा होता है, जबकि संत-सतगुरु अपने साथ रूहानी शक्तियों का असीम खज़ाना लेकर आते हैं।
वो दिखने में जरुर हमारी तरह होते हैं, लेकिन वो रूहानी ताकतों के भंडार होते हैं और हम मनुष्यों के संचित कर्मों को खत्म करने आते हैं। ताकि रूहें मनुष्य जन्म के कर्मों से मुक्त हो जाएं और पाक-पवित्र होकर अपनी उच्च हस्ती को पा जाएं। उनका आना भी किसी सिलसिले का हिस्सा नहीं होता। उनकी अपनी मौज होती है। मुख्यत: जब रूहें तड़प उठती हैं, तभी संत-सतगुरु का शुभ आगमन होता है।
इसी प्रकार रूहों पर अपनी रहमतों को बरसाने परमपिता जी ने जनवरी के इस शुभ माह में अवतार लिया। इस शुभ आगमन पर रुहों ने मंगल गीत गाए। नाच-गाकर अपनी खुशियों का इज़हार किया। ऐसी खुशियाँ जो धुरधाम ले जाने वाली हैं। सबको मस्तो-मस्त बना देने वाली हैं। इन्हीं खुशियों से सजी शुभ सवेर की, शुभ घड़ी की सबको मुबारकबाद! सबको बधाई-बधाई!

































































