Experiences of Satsangis

बेटा, एक नहीं, तुझे दो वीरे देंगे’ -सत्संगियों के अनुभव

पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज की दया-मेहर

प्रेमी जगदीश चंद फोरमेन (बिजली विभाग) पुत्र श्री मिलखीराम जी गाँव भंगाला जिला होशियारपुर (पंजाब) हाल आबाद कल्याण नगर सरसा। प्रेमी जी पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज की अपने पर हुई रहमतों का वर्णन इस प्रकार करते हैं:-

सन् 1971 की बात है। मैं बिजली बोर्ड हरियाणा में बतौर लाईनमैन गाँव खैरेकां जिला सरसा में नियुक्त था और वहीं पर किराए के मकान में परिवार समेत रहता था। उस समय मेरे तीन बेटियाँ ही थी, बेटा एक भी नहीं था। उस दिन मैं शुक्रवार को सरसा दरबार में सत्संग पर आया। मेरी पत्नी सुमित्रा लंगर घर में सेवा किया करती थी। उस समय मेरी बेटी कैलाशी (कैलाश) चार वर्ष की थी। किसी सत्संगी माता ने उसे सिखा दिया कि तूने परमपिता जी से ऐसे कहना है कि मुझे वीरा दे दो, तो परमपिता जी तुझे वीरा अर्थात् भाई दे देंगे।

वह बच्ची इस बात पर पक्की हो गई। वह अपनी माँ से जिद्द करने लगी कि मुझे पिता जी से एक वीरा लेकर दो। वह तीन दिन लगातार यही जिद्द करती रही कि मैंने वीरा लेना है। मैं तीन दिन तक दरबार में बिजली समिति में सेवा करता रहा। सत्संग से अगले दिन यानि सोमवार को मैं पूज्य परमपिता जी से वापिस घर जाने की आज्ञा लेने गया। उस समय तीनों बेटियाँ मेरे साथ थी। तो मेरी बेटी कैलाशी मेरी कमीज पकड़ कर मुझे कहने लगी कि पापा, मैंने वीरा लेना है।

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पूज्य परमपिता जी ने मुझसे पूछा कि बेटा जगदीश, बेटी क्या मांग रही है? मैंने शर्म-सी महसूस करते हुए कहा कि जी, कुछ नहीं कहती। वैसे ही कर रही है जी। पूज्य परमपिता जी ने फरमाया, ‘नहीं बेटा जगदीश, कोई बात तो है!’ इतने में मेरी बेटी कैलाशी बोली कि पिता जी, मैंने एक वीरा लेना है आपसे। सर्व-सामर्थ दातार जी ने फरमाया, ‘बेटा! एक नहीं, दो वीरे देंगे तेरे को।’ उसके बाद परमपिता जी ने एक जिम्मेवार सेवादार को तेरावास में भेजकर दो सेब मंगवाए और मुझे देते हुए फरमाया, ‘ये लो बेटा जगदीश, दो बेटे होंगे तेरे घर।’ वह प्रशाद हम दोनों पति-पत्नी ने खाया।

इसके एक साल बाद मेरे घर एक बेटे ने जन्म लिया और उसके दो वर्ष बाद दूसरे बेटे ने जन्म लिया। पूज्य परमपिता जी ने पहले बेटे का नाम सुरेन्द्र कुमार व दूसरे का नाम देवेंद्र सिंह रखा। कुल मालिक वाली दो जहान सतगुरु-दाता जी के परोपकारों का बदला हम कई जन्म पाकर भी नहीं चुका सकते। हम अपने सतगुरु को शत्-शत् नमन ही करते हैं।
बता दें कि सेवादार जगदीश चंद जी फोरमैन अपनी ओड़ निभाकर सचखण्ड जा विराजे हैं।