बेटा, हम आपके साथ हैं! -सत्संगियों के अनुभव -पूज्य हजूर पिता संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां की अपार रहमत
प्रेमी अमीर चंद इन्सां पुत्र श्री ज्ञान चंद गाँव जंडवाला, भीमेशाह जिला फाज़िल्का (पंजाब) और वर्तमान में वे प्रीत नगर सरसा में रहते हैं। प्रेमी जी पूज्य हजूर पिता संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां की अपने पर हुई रहमत का वर्णन इस प्रकार करते हैं:-
सन् 1993 की बात है, हमारे गाँव जंडवाला भीमेशाह में हमारी पैतृक जमीन के पास लगती साढ़े तीन एकड़ भूमि बिकाऊ थी, लेकिन हमारे पास इतना पैसा नहीं था कि हम उसे खरीद सकें। जबकि हम वह जमीन खरीदना चाहते थे। उन्हीं दिनों ही मैं और मेरी पत्नी ऊषा इन्सां डेरा सच्चा सौदा सरसा दरबार में पूज्य हजूर पिता जी के दर्शन करने के लिए आए हुए थे। रूहानी मजलिस की समाप्ति के बाद जब पूज्य हजूर पिता जी संगत से बातचीत कर रहे थे, तो हमने भी पूज्य गुरु जी के पवित्र चरण-कमलों में अर्ज़ की कि पिता जी, हमने जमीन खरीदनी है।
हमारे द्वारा पैसों की बात करने से पहले ही सर्व सामर्थ सतगुरु जी ने वचन फरमाए, ‘आशीर्वाद बेटा! हम आपके साथ हैंं।’ पूज्य हजूर पिता जी से बात करने के बाद जब हम वापिस अपने गाँव जंडवाला पहुंचे तो खुद-ब-खुद ही पैसोंं का इंतजाम होता चला गया। हमारी नरमा-कपास की फसल जो बिक नहीं रही थी, शहनशाही वचनों के बाद काफी अच्छे दाम पर बिक गई। हमारे एक रिश्तेदार भाई ने भी हमें उधार के रूप में एक लाख रूपए की सहायता दे दी। हैरानीजनक बात तो यह हुई कि हमारा एक जानकार व्यक्ति भी बिना बुलाए हमारे घर आया और कहने लगा कि जो बाकी एक लाख पच्चीस हजार रुपए की आपको जरूरत है, वो आप मुझसे ले लो और आप जमीन की रजिस्ट्री करवा लो।
जब तक पैसों का इंतजाम न हो, तब तक जमीन के कागज मेरे पास गिरवी रख देना और जब इन्तज़ाम हो गया तो कागज वापिस ले जाना और तब तक जमीन में बिजाई आदि भी आप ही करते रहना। हम यह सुनकर हैरान थे कि ऐसा तो हो ही नहीं सकता कि कोई खुद आकर पैसे दे और यह भी कहे कि पैदावार भी आप खुद ले लेना। यह सब पूज्य हजूर पिता संत डॉ. एमएसजी की रहमत का ही करिश्मा था। हमने पूज्य पिता जी की रहमत से जमीन की रजिस्ट्री करवा ली। उस वर्ष अच्छी फसल होने के कारण हमने जल्दी ही उधार लिया सारा पैसा वापिस कर दिया। जमीन के कागज हमें मिल गए थे।
कुछ ऐसी ही रहमत सन् 2001 में भी हुई। उस समय हम पति-पत्नी दरबार में सेवा करते थे और बेटा पढ़ता था। उन दिनों हमारे गाँव व आस-पास के एरिया के खेतों में कहीं-कहीं मिट्टी के छोटे-मोटे टिब्बे (टीले) थे। हमने अपने खेत में से मिट्टी निकालनी थी ताकि जमीन समतल हो जाए और अच्छी फसल हो। उन दिनों यहीं दरबार में जोर-शोर से सेवा चल रही थी, इसलिए हम गाँव में नहीं जा सके। पूज्य शहनशाह पिता जी की रहमत से मेरे पास हमारे गाँव के एक आदमी का फोन आया कि गाँव मेें बाहर के कुछ लोग आए हैं, उन्हें मिट्टी की जरूरत है, क्या वे आपके खेत में से मिट्टी ले जा सकते हैं? मैंने उन्हें हां कर दी। उन लोगों ने हमारे खेत से मिट्टी उठा ली।
हमारा खेत समतल हो गया और उन्होंने हमें मिट्टी उठवाने के 70 हजार रूपये भी दिए। बाद में हमारे आस-पास वाले किसानों ने उन लोगों की बहुत मिन्नतें की कि उनके खेतों से भी मिट्टी उठा लें, बेशक मिट्टी उठवाने के पैसे भी मत देना। लेकिन उन लोगों ने कहा कि अब हमें मिट्टी की जरूरत नहीं है। यहाँ पर वो बात सच हो गई कि जब सतगुरु देता है तो छप्पर फाड़ कर देता है। हमें सेवा का मेवा हाथों-हाथ ही सतगुरु जी ने बख्शा।
ऐसे ही और भी परोपकार प्यारे सतगुरु जी के हम पर हैं। हम अपने सतगुरु के परोपकारों का ऋण कभी भी नहीं चुका सकते। हमारे परिवार में परिवार शाह सतनाम जी ग्रीन एस वैल्फेयर कमेटी के सदस्य भी हैं। ब्लॉकों में जहाँ कहीं सेवा की ड्यूटी लगाई जाती है, तन-मन-धन से हम सभी लोग सेवा करते हैं। हमारी पूज्य सतगुरु जी से यही अरदास है कि हमें इतना बल बख्शना कि हम तन-मन-धन से ज्यादा से ज्यादा मानवता की सेवा करें और हमारा अपने सतगुरु जी के प्रति दृढ़ विश्वास इसी तरह ही बना रहे जी।

































































