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भागों भरी आई जनवरी, आए सोहणे दातार जी

सतगुरु का अपनी रूहों से गहरा संबंध होता है। दुनिया में माता का अपने बच्चे से रिश्ता एक मिसाल के रूप में जाना जाता है, लेकिन सतगुरु का अपनी रूह से रिश्ता उससे भी कई दर्जे बढ़कर होता है, जिसे वही जान सकता है जो उसकी शरण को पा लेता है अथवा जिसके भाग जाग जाते हैं। वो खुशनसीब रूहें अपने सतगुरु के लासानी प्यार में खोई रहती हैं। पल-पल उस प्रीतम प्यारे के दर्श-दीदार का रसपान करती हैं। ऐसी लज्जतें, ऐसे नज़ारे कि एक पल भी उनसे दूर होना असहनीय हो जाता है।

किसी कालचक्र में पड़कर जब ऐसी हालत रूहों की बनती है तो वो अपने प्यारे के लिए तड़प जाती हैं। ठीक उसी प्रकार जैसे एक बच्चा अपनी माँ से बिछुड़ कर व्याकुल हो जाता और माता भी उसको मिलने के लिए बेचैन हो जाती है। उसी प्रकार जब रूहें अपने सतगुरु को पुकारती हैं, तो वो अपनी रूहों की पुकार सुनकर बिना देर किए चला आता है। अपने सतगुरु, प्रीतम प्यार के आने का संदेशा जब उन व्याकुल रूहों को मिलता है तो उनकी जान में जान आ जाती है। उनका रोम-रोम रूहानी प्यार से महक उठता है। वो गद्गद् हो जाती हैं। खुशियों भरा यह शुभ समाचार शुभ जनवरी के महीने में जब रूहों को मिला, तो उनके वारे-न्यारे हो गए।

पाक-दीदार करके रूहें खिलखिला उठी। अपनी ऐसी प्यारी, संस्कारी रूहों के लिए कुल मालिक मानव के रूप में अवतार धारकर आ गए। पूरी कायनात कुल मालिक के आगमन से चहक-महक गई। क्या धरा, क्या अम्बर पूरा आलम ही झूम उठा। पत्ता-पत्ता मस्ती भरे तराने गा उठा। सज़दे में हर शीश नत्-मस्तक हो गया। स्वागत में रूहों ने गीत गाए, जश्न मनाए। अर्शों से देव-फरिश्तों ने इस पावन वेला पर फूल बरसाकर अपनी खुशी का इज़हार किया। सृष्टि का ज़र्रा-ज़र्रा रूहानी प्यार से चमक उठा। ऐसे महान सतगुरु दाता का धरा पर आना और उसके दर्श-दीदार हासिल होना बड़े नसीबों की बात है।

नूर-ए-नज़र:

सतगुरु ने जब प्रकट होना होता है वो दिन, वो घड़ी, वो जगह अर्थात् सब कुछ अपने आप तय होता है। जिस पावन कोख़ से उन्होंने जन्म लेना होता है, वो भी उनके रहमो-करम से पहले से ही तैयार होता है। वो बड़ी सुलखनी, भागों वाली कोख़ होती है। वो सब कुछ अपने-आप सम्पूर्ण करके एक निश्चित समय पर प्रकट हो जाता है। यह उसकी अपरम्पार लीला है, जिसे कोई नहीं जान सकता। पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज ने 25 जनवरी 1919 को गाँव श्री जलालआणा साहिब में अवतार धारण किया, जोकि जिला सरसा (हरियाणा) में है।

आपजी ने पूजनीय पिता सरदार वरियाम सिंह जी व पूजनीय माता आसकौर जी की पावन कोख़ से जन्म लेकर उनके वारे-न्यारे कर दिए। उनकी खुशियों का कोई ठिकाना नहीं था। हो भी कैसे, क्योंकि 18 साल इस इंतज़ार में गुज़र गए। इतने सालों के बाद जिस माँ-बाप को संतान सुख प्राप्त हो और वो भी पुत्र रत्न के रूप में, उनकी खुशियाँ संभालें नहीं संभलती।

नूरानी बाल स्वरूप:

इस घड़ी के लिए पूजनीय माता-पिता जी ने 18 सालों के लम्बे अरसे तक उम्मीद का दामन थामे रखा। इस दौरान उन्होंने अपने मन-मंदिर में अलख़ जगाए रखी। भजन-बंदगी में लगे रहे। दीन-दुखियों व जरूरतमंदों की सहायता करते रहे। कोई भी साधु-संत मिलता या घर आता, उसकी बढ़-चढ़कर सेवा-पानी करते। एक बार ऐसे ही गाँव में एक फकीर का आना हुआ। पूजनीय माता जी ने उसकी खूब सेवा की। पूजनीय माता जी को उसकी सेवा से असीम शांति, सच्चे सुख की अनुभूति होती। वह साधु कई दिनों तक गाँव में रहा और जब तक रहा, पूजनीय माता जी के घर से भोजन-पानी लेता रहा।

जिस दिन उन्होंने जाना था, वह पूजनीय माता जी से बोले कि भाई भगतो, आपकी सेवा भावना से मैं बहुत खुश हूँ। आपका नेक-पाक हृदय, सच्ची भक्ति-भाव मालिक की दरगाह में मंजूर है। पूजनीय माता-पिता जी को जब भी कोई ऐसा साधु-फकीर मिलता, उससे संतान प्राप्ति की चर्चा जरूर करते, क्योंकि घर में किसी चीज़ की कोई कमी नहीं थी। बहुत बड़ा घराना था। पिता सरदार वरियाम सिंह जैलदार थे, जिनका आस-पास पूरे क्षेत्र में अच्छा रूतबा था। इस साधन-सम्पन्न घर में इतना कुछ होने के बावजूद औलाद की कमी जरूर उन्हें खलती थी। अपनी इसी कमी को पूरा करने के लिए वो भगवान के चरणों में सच्ची श्रद्धा से अरदास करते रहते।

उनकी यही अरदास घर आए उस साधु के जरीए सुनी गई। उसने खुश होकर आशीर्वाद दिया कि आपकी मनोकामना जरूर पूरी होगी। आपके घर एक महापुरुष जन्म लेगा। पूजनीय माता-पिता जी की सेवा-भावना व सच्ची श्रद्धा परमपिता के चरणों में परवान हुई और उनके घर एक सोहणे लाडले पुत्र ने जन्म लिया। पूरे गाँव व आस-पास के गाँवों तक यह शुभ समाचार फैल गया कि श्री जलालआणा साहिब के जैलदार के घर पुत्र हुआ है। खुशियों की इस वेला पर पूरे गाँव में जमकर खुशियाँ मनाई गई। पूजनीय माता-पिता जी ने उस समय की रिवायत के अनुसार पूरे गाँव व सगे-संबंधियों में घी-शक्कर के थाल भर-भरकर बांटे।

घर में बधाई देने वालों का तांता लग गया। इस पावन घड़ी पर पूरे गाँव में जश्न मनाया गया। एक-दूजे को बधाइयाँ देते मुँह मीठा करवाया गया। खुशियों भरा यह पैगाम दूर-दूर तक फैल गया। उस मस्त फकीर को भी यह बात पता चली कि जैलदार वरियाम सिंह के घर लाल ने जन्म ले लिया है। इन खुशियों में शरीक होने वह भी आ गए। उन्होंने पूजनीय माता-पिता जी को बधाई दी और कहा कि भाई-भगतो! यह रब्बी नूर है! यह कोई ऐसा-वैसा बच्चा नहीं है। इसे अपार स्नेह के साथ रखना। ये ज्यादा समय तक आपके पास नहीं रहेंगे। ये चालीस वर्ष के बाद जीवों के कल्याण के लिए आपके घर से चले जाएंगे। अपने इसी मकसद के लिए इन्होंने जन्म लिया है। आपका बहुत ऊँचा नसीब है कि इन्होंने आपको अपने आदरणीय माता-पिता का सम्मान दिया है।

नूरानी बचपन:

पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज सिधू वंश से संबंध रखते हैं। आपजी जब मात्र 5 वर्ष के थे, आपजी के पूज्य पिता जी सचखंड जा समाए। आपजी का पालन-पोषण पूजनीय माता आसकौर जी की छत्रछाया में हुआ। आपजी के पूज्य मामा सरदार वीर सिंह जी ने भी अपना भरपूर प्यार व सहयोग दिया। पूजनीय माता जी के साथ मिलकर आपजी का हर प्रकार से लालन-पालन किया। पूजनीय माता जी उच्च संस्कारों की धनी थीं। वो निरोल धार्मिक प्रवृति व दीनता-नम्रता की पुंज थीं। पूजनीय माता जी ने अपने वही गुण-संस्कार अपने लाडले को प्रदान किए और इसी की बदौलत आपजी बचपन से ही संस्कारवान, स्नेही व मिलनसार थे। आपजी का बचपन कर्मठ जीवनशैली व दयालुता का प्रतीक रहा है। अपने साथियों के साथ मिलजुल कर रहते और उनकी हर समय उचित मदद भी करते।

आपजी का विद्यार्थी जीवन उच्च श्रेणी का रहा है। आपजी ने प्रारम्भिक शिक्षा अपने गाँव के स्कूल से ही ग्रहण की। माता जी का आपजी से अत्याधिक स्नेह होने के कारण उच्च शिक्षा के लिए कहीं दूर नहीं जा सके और उनकी आज्ञा से अपने विशाल कारोबार को संभालने में लग गए। आपजी ने अपने कारोबार को बड़ी कुशलता से संभाला और इसके साथ ही गाँव के सार्वजनिक कार्यों में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते रहे। आपजी की अथक मेहनत से खेत-खलिहान भरपूर उपज देते, जिसकी पूरी चर्चा होती। आपजी की परोपकारी भावना भी उच्चे कोटि की रही है। आपजी को यह गुण विरासत से मिला है। हर किसी से प्रेम-प्यार व उसकी मदद को तत्पर रहना आपजी की दिनचर्या में शामिल था। यहाँ तक कि कोई पशु-परिन्दा या जानवर भी किसी परेशानी मे दिखा तो आपजी उसकी भी हर संभव देख-रेख करते व उसे आराम पहुँचाते।

यही नहीं अगर आपजी के सामने खेत में कोई बेजुबान चर रहा होता, तो उसे भी आपजी यह कह कर चरने देते कि कोई बात नहीं, अपने हिस्से का खा रहा है। एक बार इसी प्रकार एक झोटा आपजी के खेत में चरने आया करता था। वह रोज़ाना आपजी के सामने आता और चरने लग जाता। आपजी को माता जी ने खेत की रखवाली के लिए भेजा था, क्योंकि फसल बड़ी अच्छी थी और माता जी को था कि पशु-परिन्दे कहीं खेत को खराब न कर दें। लेकिन आपजी की परोपकारी भावना का क्या कहना कि उसी खेत में वो झोटा फसल खा रहा है और आपजी चुपचाप उसे खाने दे रहे हैं। कहते हैं कि यह नज़ारा कई दिनों तक चलता रहा।

आखिर किसी ने एक दिन जब यह सब देखा तो वह माता जी के पास शिकायत करने पहुंच गया। उसने माता जी को बताया कि आपका बेटा खेत से पशुओं को नहीं रोकता। एक झोटा रोज़ाना आ रहा है और हम देखते हैं कि वह इनके सामने बड़े मजे से चरता रहता है और ये उसे कुछ नहीं कहते। ऐसे तो आपके खेत से चने की सारी फसल खत्म हो जाएगी, एक भी दाना नहीं बचेगा। जब आपजी घर आए, तो माता ने यह सारी बात आपजी से कह दी। उन्होंने आप को खेत की सही रखवाली करने की ताक़ीद दी।

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अगले दिन आपजी जब खेत में गए तो रूटीन के अनुसार वह झोटा भी आ गया। आपजी उसके पास गए और उसकी पीठ पर हाथ रखकर थपथपाया। फिर आपजी ने उसे बड़े प्यार व उदारता के साथ बोला कि भाई भगता! हुण अपनी शिकायत हो गई है। तू चल-फिर कर चर लिया कर। बस, आपजी के इतना कहने की देर थी कि वह चला गया। उसके बाद वह जब तक जिंदा रहा, उसने कहीं भी एक खेत में खड़े होकर नहीं चरा, बल्कि थोड़ा-थोड़ा सबके बराबर चल-फिर कर चरता रहा।

परमार्थी कार्यों में सहयोग:

आपजी गाँव के सर्व-सांझे कार्यों में बढ़-चढ़कर सहयोग करते रहे हैं। गाँव का कोई भी कार्य होता, मौजिज़ व्यक्ति आपजी से राय-मशविरा करते और आपजी के कहने पर ही उसे किया जाता। पूरा गाँव व आस-पास दूर-दराज के गाँवों तक भी आपजी का रूतबा महान था। लोग आपजी से अपने कई प्रकार के मामलों के समाधान के लिए आते और आपजी की सलाह को सर्वोपरि मानते। आपजी कोई भलाई का कार्य होता, उसमें अग्रणी रहते। कोई निर्माण, किसी गरीब की आर्थिक सहायता या कन्या की शादी वगैरह कोई भी नेकी-भलाई का कार्य होता, आपजी उसे पूरा करने में देर न करते।

आपजी की कोशिश से गाँव का श्री गुरुद्वारा साहिब स्थापित हुआ है। इसकी सेवा में आपजी ने पूरा सहयोग दिया और अग्रणी भूमिका निभाते हुए इसका निर्माण कार्य पूरा करवाया। गाँव के लिए यह एक बहुत बड़ा तोहफा था, क्योंकि ज्यादा निवासी सिख धर्म की मान्यताओं वाले थे और पूरे गाँव को इसकी बड़ी जरूरत थी। आपजी ने इस धार्मिक कार्य के लिए अपना भरपूर सहयोग देते हुए लोगों की इस जरूरत को पूरा किया। पूरे गाँव ने इस पर बड़ी खुशी मनाई। इसी प्रकार गाँव में किसी के घर उनकी लड़की की शादी थी। वो परिवार पूजनीय माता जी के पास आया और कुछ पैसों की माँग करने लगे। आपजी वहीं पर मौजूद थे।

फिर आपजी ने अपने दयालुता भरे स्वभाव का परिचय देते हुए माता जी से कहा कि इनको मना मत करना। इनको पैसे दे दो। भले ही ये वापिस भी न करके जाएं। अगर मेरी कोई बहन होती, तो फिर भी हमें उसकी शादी में खर्च करना पड़ता। आपजी के बालमुख से ये बात सुनकर माता जी को आपजी पर बड़ा मान महसूस हुआ और उन्होंने बड़े प्यार के साथ आपजी का माथा चूमा व उनको पैसे देकर उनकी पूरी मदद की।

मुर्शिद से मिलाप:

आपजी धर्म-कर्म के प्रति छोटी आयु से ही ओत-प्रोत थे। सिख धर्म से संबंधित होने के कारण आपजी पर गुरु साहिबानों की पवित्र बाणी का बड़ा प्रभाव था। छोटी आयु से ही आपजी सिक्ख मान-मर्यादाओं का पालन करने में गर्व महसूस करते थे। घर में शब्द-कीर्तन करना, गुरुओं के वचनों को सुनना और पाठ करना आपजी के रोज़ाना के अभ्यास में शामिल था। समय-समय पर आपजी तीर्थ-स्थलों के दर्शन करने भी चले जाया करते। कुछ बड़े होकर आपजी ने सिख धर्म के अनुसार गुरुद्वारा श्री तलवण्डी साबो में अमृत पान भी किया और निरन्तर शब्द-कीर्तन करने में जुट गए।

आपजी पर धर्म की शिक्षा का इतना असर हुआ कि आपजी बिल्कुल इसी में रम गए। पवित्र गुरबाणी के शब्द ‘धुर की वाणी आई। जिनि सगली चिंत मिटाई’ आपजी के दिल में इस प्रकार बस गए कि आपजी इस धुर की वाणी की खोज में लग गए। यह क्या है? कैसे है? इसे कैसे हासिल करना है? ये विचार मन में उठने लगे और अपनी इस जिज्ञासा का कई साधु-महात्माओं से जिक्र भी किया, लेकिन संतुष्टिप्रद उत्तर कहीं से न मिला। आपजी इसके लिए सच्चे सतगुरु की तलाश करने लगे। कई जगहों पर भी गए, लेकिन मन को तसल्ली न हुई। पवित्र गुरुबाणी में गुरु की महिमा का भरपूर वर्णन है, तो आपजी ऐसे गुरु की खोज में लग गए, जो सच्चा हो, मुक्ति का दाता हो।

इसी खोज के दौरान आपजी को पूजनीय बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज के बारे पता चला। आपजी ने सुना कि डेरा सच्चा सौदा सरसा में एक मस्त फकीर है, जो ‘धन धन सतगुरु तेरा ही आसरा’ का नारा बोलता है और सच्चा नाम-शब्द बताता है। बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज की महिमा सुनकर आपजी सरसा आए और बेपरवाह जी का सत्संग सुना। बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज के दर्शन करके व उनके पवित्र मुख से वचन सुनकर आपजी उनके मुरीद हो गए। आपजी को पूरी तसल्ली हो गई कि बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज वक्त के पूर्ण सतगुरु हैं।

आपजी की खोज का मकसद पूरा हो गया। आपजी के लिए और कोई शंका बाकी न रही। बेपरवाह जी की निराली मस्ती का रंग आपजी पर पूरी तरह चढ़ गया था। रूहानी मस्ती का ऐसा रंग चढ़ा कि आपजी अपने घरेलू कारोबार व दुनियावी काम-धंधों से अपने-आपको सीमित करके रूहानियत की ओर बढ़ने लगे। आपजी का ज्यादा समय बेपरवाह जी की सत्संगों व उनके दर्शनों में व्यतीत होने लगा। आपजी भी लगभग तीन साल लगातार सत्संग सुनने में गुज़र चुके थे। इस दौरान आपजी ने नाम-शब्द लेने की की कोशिश की। एक बार आपजी नाम-शब्द लेने वालों में बैठ गए, लेकिन बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज ने यह कहकर उठा दिया कि अभी आपको नाम लेने का हुक्म नहीं हुआ है। जब समय आएगा, आपको घर से बुलवाकर, आवाज़ लगाकर नाम देंगे।

आपजी वचनानुसार लगातार सत्संग सुनते रहे व सेवा करते रहे। आखिर वो दिन भी आ गया, जब आप को नाम-शब्द हासिल होना था। बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज ने 14 मार्च 1954 को सरसा के नजदीक गाँव डेरा सच्चा सौदा घूकांवाली में अपना रूहानी सत्संग फरमाया। सत्संग रात को फरमाया गया। परमपिता जी सत्संग सुनकर उसी समय अपने घर चले गए। आपजी अभी घर पहुंचे ही थे कि शाह मस्ताना जी महाराज ने एक सेवादार को भेजकर आपजी को घर से वापिस बुला लिया। जब आप भी घूकांवाली पहुँचे तो शाह मस्ताना जी महाराज उसी सत्संग वाले चबूतरे पर खड़े थे। जहाँ बैठकर सत्संग फरमाया था। आपजी को आवाज़ देकर हुक्म किया कि ‘सरदार हरबंस सिंह जी! आज दरगाह से आपको नाम लेने का हुक्म हो गया है।

आप अंदर जाकर मूढेÞ के पास बैठो, हम अभी आते हैं।’ जब आपजी अंदर गए तो मूढ़े के पास जगह न होने के कारण आपजी पीछे ही बैठ गए। शाह मस्ताना जी महाराज नाम-शब्द देने आए तो आपजी को बुलाकर आगे अपने मूढेÞ के पास बैठाया और वचन फरमाए कि ‘भाई, आपको इसलिए अपने पास बिठाकर नाम देते हैं कि आपसे कोई काम लेना है। आपको जिंदाराम का लीडर बनाएंगे, जो दुनिया को नाम जपाएगा।’ शहनशाह मस्ताना जी महाराज ने नाम देते ही दुनिया को परमपिता जी के बारे ज़ाहिर कर दिया। एक प्रकार से शहनशाह मस्ताना जी महाराज ने परमपिता जी को अपना रूप चुन लिया था। यहीं नहीं, इसके बाद भी कई बार परमपिता जी के बारे अपने साथ वालों को इशारों में समझाते रहे कि परमपिता जी बहुत बड़ी हस्ती के मालिक हें। जैसे एक बार शहनशाह मस्ताना जी महाराज अपने कुछ सेवादारों के साथ कहीं घूमने जा रहे थे। रास्ते में पदचिह्न दिखाई दिए,

तो शहनशाह जी फकीरी मस्त अंदाज में बोले कि ‘देखो वरी! ये रब की पैड़ है।’ लेकिन किसी को यकीन नहीं हुआ। सेवादार कहने लगे कि सार्इं जी, ये तो जलालआणा के जैलदार हरबंस सिंह के पदचिह्न हैं। वो ही यहाँ से गए हैं। इस पर फिर शहनशाह जी ने फरमाया कि ‘नहीं वरी! तुम कुछ भी बोलो, ये पैड़ रब्ब की है। वो बहुत बड़ी हस्ती हैं। तुम मानो या ना मानो, ये रब्ब की पैड़ है।’ शहनशाह जी का ऐसा कहने का मकसद साफ था कि परमपिता जी डेरा सच्चा सौदा के अगले गद्दीनशीन होने वाले हैं। लेकिन आम जीव की क्या हस्ती है कि वो पूर्ण संत-महात्माओं की रमज़ को पकड़ सके।

रब्बी स्वरूप में दर्शन:

शहनशाह मस्ताना जी महाराज परमपिता जी को अपना वारिस तो नाम देते वक्त ही चुन चुके थे, लेकिन दुनिया के सामने इस रब्बी रूप को ज़ाहिर करने का एक निश्चित वक्त निर्धारित कर लिया था। अपना वारिस घोषित करने से पहले वैसे इशारों से कई बार लोगों को समझा चुके थे, लेकिन वो खेल हर किसी के समझ से परे थे। कई बार परमपिता जी की बड़े खुले दिल से प्रशंसा कर देते और सबसे समझदार व ज्ञानवान होने के वचन फरमाते। परमपिता जी नित-नेम सुबह-शाम पाठ किया करते थे और उन्हें पवित्र गुरुबाणी का भी पूरा ज्ञान था। लोग भी अक्सर यही सोच लेते कि इन्हें इसीलिए बेपरवाह जी बड़ी उपाधि बख्श देते हैं।

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लेकिन बेपरवाही रूहानी खेल के बारे जब लोगों को पता चलता, तो वो हैरान रह जाते। शहनशाह मस्ताना जी महाराज ने अपना वारिस दुनिया पर ज़ाहिर करने से पहले परमपिता जी का एक सख्त इम्तिहान भी लिया। इसके लिए लगभग अठारह दिन स्वयं गाँव श्री जलालआणा साहिब में रहे और परमपिता जी को अपने मार्ग-दर्शन में परिपक्व करते रहे। अपने पावन सानिध्य में परमपिता जी की खूब परीक्षा ली। कई दिनों तक डेरों को बनवाने-तुड़वाने का काम चलता रहा। परमपिता जी पूरी लग्न व श्रद्धा से अपने सतगुरु के हर वचन को सिर माथे मानकर वचनों पर फूल चढ़ाते रहे। कभी किसी डेरे को तोड़ा जाना और कभी किसी डेरे का मलबा कहीं और ले जाने का हुक्म होना।

ऊपर से सर्दी का प्रकोप और कई बार आधी रात को ही मलबा इधर-उधर ले जाने का हुक्म हो जाता। जैसे भी जो बेपरवाही हुक्म होता, आपजी सत्यवचन कहकर उसी प्रकार खुशी-खुशी चल पड़ते। सबके मन में जरूर आता कि ये सब क्या हो रहा है। शहनशाह जी ऐसे खेल किसलिए कर रहे हैं। मगर इतना तो सबको पता था कि शहनशाह जी बिना किसी कारण कुछ नहीं करते। लेकिन किसी को भी पता नहीं था कि शहनशाह जी कितना बड़ा खेल खेल रहे हैं। वो दुनिया के सामने जिस हस्ती को प्रकट करने जा रहे थे, उसी प्रक्रिया का ये खेल पूरा हो रहा था। बेपरवाह जी अठारह दिन लगातार इसी प्रकार सेवाकार्य करवाते रहे और आखिर में तो इससे भी बड़ा खेल हो गया, जिसने सबको अचंभे में डाल दिया।

बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज ने परमपिता जी को अपना घर-बार तोड़कर घर व हवेली का सारा सामान डेरे में लाने का ईलाही हुक्म दिया। ये एक बहुत सख्त परीक्षा थी। मगर आपजी तो बस हुक्म की पालना करना ही, अपने जीवन का मकसद समझते थे। ऐसा हुक्म मिलते ही आपजी ने वही किया, जो शहनशाह मस्ताना जी महाराज चाहते थे। घर का सारा मलबा डेरा सच्चा सौदा पहुंचा दिया। फिर एक दिन शहनशाह मस्ताना जी महाराज के हुक्मानुसार स्वयं ही सारा सामान सत्संग पर आई संगत में बांट दिया गया। आपजी अपना तन-मन-धन आदि सब कुछ रूहानी प्यार की भेंट चढ़ा चुके थे। अब कुछ बाकी न था। ये शहनशाही चोज़ थे और उनका जो मकसद था वो अब पूरा हो चुका था।

इतना सबकुछ भेंट चढ़ जाने के बाद आपजी अपने मुर्शिद के वचनों पर निहाल हो रहे थे। न कोई फिक्र था, न कोई चिंता। सब कुछ अपने सतगुरु को अर्पण था। शहनशाह मस्ताना जी महाराज आपजी के इस बलिदान को देख अत्यंत प्रसन्न हुए। वास्तव में उनका अपना जो ईलाही मिशन था, वह पूरा हो गया था। सतगुरु-दाता के रूहानी खेल हर किसी ने देख ही लिए थे और जो हो रहा था, देख भी रहे थे। तो ये सब इसलिए था कि दुनिया को पता चले कि एक मुरीद क्या होता है और कल को अपना वारिस घोषित करने पर किसी को कोई एतराज़ न हो। किसी के दिल में कोई मलाल भी न आए।

शहनशाह मस्ताना जी महाराज ने दिनांक 28 फरवरी 1960 का दिन भी चुन लिया था, जब दुनिया के सामने आपजी को अपना उत्तराधिकारी घोषित करना था। उस दिन आपजी को नए नोटों के लम्बे-लम्बे हार पहनाकर पूरे सरसा शहर में एक बहुत बड़ा जुलूस निकाला गया। पूरा दिन सरसा शहर में यह जुलूस घूमता रहा और दुनिया को डंके की चोट पर बताया कि बेपरवाह मस्ताना जी महाराज ने श्री जलालआणा साहिब के जैलदार को अपना वारिस बना दिया है। किसी के मन में किसी प्रकार की कोई शंका न रहे, इसलिए शहनशाह मस्ताना जी महाराज ने सरसा शहर में विशाल जुलूस निकाला।

सायंकाल को जब जुलूस वापिस डेरा सच्चा सौदा पहुंचा तो शहनशाह मस्ताना जी महाराज ने आपजी को अपने साथ स्टेज पर बैठाया व वचन फरमाए, ‘असीं अपने दाता प्यारे सावण शाह सार्इं जी के हुक्म से आज सरदार हरबंस सिंह जी को आत्मा से परमात्मा कर दिया है। आज से ये हरबंस से ‘सतनाम सिंह जी’ बन गए हैं। ये वो ही सतनाम हैं, जो खण्डों-ब्रह्मण्डों का मालिक है और जिसे पूरी दुनिया ही जपती है। दुनिया के सामने वो ही ‘सतनाम’ आज प्रकट हो गया है। ये दो जहानों के वाली हैं। जो इनके पीछे से भी दर्शन कर लेगा, वो भी नर्कों में नहीं जाएगा।’ इस प्रकार शहनशाह मस्ताना जी महाराज ने पूजनीय परमपिता जी को अपना जानशीन बनाया और दुनिया को बताया कि डेरा सच्चा सौदा के उत्तराधिकारी शाह सतनाम सिंह जी महाराज हैं।

आपजी ने डेरा सच्चा सौदा के दूसरे गद्दीनशीन बनकर साध-संगत की सेवा संभाल में दिन-रात एक कर दिया। आपजी ने डेरा सच्चा सौदा के प्रचार-प्रसार में अथक प्रयास किए। देश के सुदूर भागों में राम-नाम का प्रचार करके लोगों को रूहानियत के मार्ग पर चलना सिखाया। हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में अपनी रूहानी यात्राएँ की और लाखों लोगों को नशा इत्यादि बुराइयों से दूर किया। गाँव-गाँव, शहर-शहर जाकर सत्संगें लगाई। रूहानियत के महान् ग्रंथों की रचना की और हज़ारों शब्दों, भजनों का लेखन भी किया।

आपजी का मकसद लोगों को प्रभु की बंदगी से जोड़ने का था। इसलिए जो भी करना पड़ा आपजी ने पूरी तनदेही से किया। आपजी की पावन शिक्षाओं पर चलकर लाखों घर स्वर्ग का नज़ारा बन गए। जहाँ, जिन घरों में पहले नशों व बुराइयों का डेरा था, वहाँ से ये सब बुराइयाँ जड़ से उखाड़ फेंक दी गई। आपजी की ही बदौलत इन्सानियत, अच्छाई व ईमानदारी को अपनाकर लोगों का जीवन सफल हो गया। आपजी ने लोगों को राम-नाम का ऐसा बल प्रदान किया कि उनकी पीढ़ियों तक का उद्धार हो गया। आज भी ऐसी सैकड़ों नहीं बल्कि लाखों की तादाद में साध-संगत हैं, जो आपजी की बदौलत डेरा सच्चा सौदा के प्रति ज्यों की त्यों नतमस्तक हैं और उनकी अगली पीढ़ी भी राम-नाम से जुड़कर अपना जीवन सफल बना रही हैं। आपजी की अथक मेहनत व भरपूर प्रयासों की बदौलत डेरा सच्चा सौदा का नाम देश के कोने-कोने में गूंज रहा है।

डेरा सच्चा सौदा व साध-संगत के प्रति आपजी का प्रबल प्यार बेमिसाल था। इसी कारण आपजी संगत के बारे काफी ख्याल जाते। आपजी को यही रहता कि कोई दु:खी न रहे। किसी को परेशानी न हो। साध-संगत बढ़-चढ़कर दरबार में आए और उन्हें भरपूर प्यार मिलता रहे और उनकी संभाल पहले से भी ज्यादा हो। इसी मकसद से आपजी ने अपने उत्तराधिकारी की खोज भी शुरु कर दी। इसके लिए अपने कुछ खास सेवादारों के साथ करीब सवा साल तक मीटिंग्स भी की और अपने इस शुभ ख्याल को सांझा किया। आपजी ने अपने भावी वारिस को चुनने की प्रक्रिया अपनाई। मगर सतगुरु जो करता है, वो आम जीव के समझ में नहीं आ सकता। आम लोग सतगुरु की रमज़ नहीं पकड़ सकते।

इसी प्रकार सन् 1989 में जब ऐसी मीटिंग्स चलती रही, तो सेवादारों ने हाथ जोड़कर कहा कि हे सतगुरु जी, हम तो अंधे हैं और अंधा किसी सुजाखे को कैसे ढूंढ सकता है। सतगुरु ही अपने स्वरूप को जान सकता है। इसलिए आपजी जो भी हुक्म करोगे, अर्थात् जिसे भी चुनोगे, हम सभी को सर्वमान्य है जी। आपजी का ईलाही हुक्म हमारे सिर-माथे है। अपना ये इलाही कार्य तो आपजी पहले ही पूर्ण कर चुके थे। सेवादारों से तो बस यही कहलवाना बाकी था, क्योंकि आपजी ने मौजूदा पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां को 23 सितम्बर 1990 को अपना जानशीन घोषित किया।

जबकि गद्दीनशीनी का सारा कार्य लगभग तीन महीने पहले ही कर लिया था। आपजी ने मौजूदा गुरु संत डॉ. एमएसजी को अपना वारिस बनाकर डेरा सच्चा सौदा के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय जोड़ दिया। डेरा सच्चा सौदा की समस्त साध-संगत के लिए आपजी का यह एक महान कार्य है, जिसकी छाप अमिट है। आपजी का महान परोपकार है, जिसके लिए साध-संगत आपजी की सदा ऋणी रहेगी। आपजी ने ऐसा महान सतगुरु साध-संगत को दिया, जिसकी महिमा का बखान जितना किया जाए, कम है। पूजनीय परमपिता जी ने यह वचन करके साध-संगत को निश्चिंत कर दिया कि ‘हम थे, हम हैं और हम ही रहेंगे।’ साध-संगत आपजी की तहेदिल से आभारी है। समस्त साध-संगत को पावन अवतार दिवस की कोटि-कोटि बधाई हो जी।