The burden of words

शब्दों का बोझ, अंतर मन की हलचल

कॉलेज से घर आते हुए दिल में आज एक अजीब-सा सुकून था, मानो मैंने कोई जंग जीत ली हो या खुद को साबित कर दिया हो। भीतर विचारों का तूफान था, लेकिन चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान ऐसे टिकी थी जैसे किसी ने मन पर मरहम लगा दिया हो। स्कूटी का स्टैंड लगाकर जैसे ही मैं घर में दाखिल हुई, तो देखा कि मामा जी की पूरी फैमिली आई हुई है। उनसे मिलने-मिलाने के बाद मैं मम्मी के साथ किचन में हाथ बंटाने लगी। मेरे हाथ तो काम कर रहे थे, लेकिन मन अपनी ही धुन में घूम रहा था। भले ही उसकी तीव्रता कुछ कम हो गई थी, पर एक बेचैनी, एक खटक, एक अनकहा-सा अपराध-बोध भीतर बार-बार सवाल करते हुए चुभ रहा था, ‘क्यों कहा मैंने? क्या जरूरत थी इतना सब बोलने की?’

सतगुरु की मेहर और मम्मी की प्रेरणा से मैंने नाम-शब्द ले लिया और हर महीने सत्संग में जाना भी हो जाता था। उस दिन आदतन, जैसे ही मम्मी ने किचन में काम करते हुए सत्संग चलाया, तो अचानक पूज्य हजूर पिता जी की आवाज गूँजी, ‘क्यूँ करते हो चुगली? क्यूँ करते हो निंदा? क्या मिलता है इससे? क्या हासिल हो जाता है दूसरों को गलत साबित करके?’ ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरे सीने पर रखी हुई अदृश्य पत्थर की सिल को एक झटके से उठा दिया हो। उन शब्दों ने मुझे भीतर तक हिला दिया। जैसे हजूर पिता जी ने सीधे मेरे मन पर अंगुली रख दी हो और कहा हो, ‘ये बेचैनी, ये अपराध-बोध सब उसी चुगली की वजह से है।’

Meaning of wordsहममें से ज्यादातर को उस समय चुगली बिल्कुल सही लगती है जब कोई व्यक्ति ईर्ष्या में आपको नीचा दिखाने की कोशिश करता है या जब किसी की कही बात दिल पर चोट कर जाती है। गुस्से के उस तूफानी उबाल को सामने वाले के सामने व्यक्त करने की हिम्मत नहीं होती, तो मन किसी तीसरे के सामने चुगली या बुराई के रूप में अपनी भड़ास निकाल देता है। उस क्षण ऐसा लगता है जैसे सिर से कोई बोझ हल्का हो गया हो। हम खुद को सही साबित करते हुए तर्कों की एक लड़ी बाँधते जाते हैं और सामने वाले के अवगुणों का पिटारा खोल देते हैं। ऐसी बातें बोलने से भी परहेज नहीं करते जो उसकी इमेज को न सिर्फ खराब करती हैं, बल्कि शक के दायरे में ले आती हैं। ये चाहे वह मेरी तरह किसी ग्रुप में बैठकर किया हो या किसी के कान में फुसफुसाकर।

Also Read:  रातों-रात दौलतमंद बनने की चाह में ज़िंदगी बन रही तनावग्रस्त

रूहनियत की गहराई तो मापी नहीं जा सकती, पर हर इन्सान का अपना-अपना अहसास होता है और मैंने यह महसूस किया है कि सच्चा सतगुरु अपने मुरीद की कमियों को दूर करने के लिए अंदर से बार-बार एक तार हिलाता रहता है। दिल में बार-बार यह ख्याल उठ रहा था कि इन्सान का सुमरिन और सेवा इतना होना चाहिए कि किसी की गलत बात या कटाक्ष का दिल-दिमाग पर कोई असर ही न पड़े। लेकिन मन यह भी चाहता था कि कुछ आसान तरीके भी हों।

इंटरनेट खोलकर मैंने तलाश शुरू की और मुझे तीन तरह के रिसर्च मिले—

Bushman Research:

जिसमें पाया गया कि गुस्सा बाहर निकालने (Venting) से राहत तो मिलती है, पर व्यवहार में आक्रामकता बढ़ती है।

Catharsis studies :

जिनमें दिखा कि चुगली या भड़ास निकालना केवल थोड़ी देर के लिए मन हल्का करता है, लेकिन लंबे समय में तनाव बढ़ाता है।

Behavioral therapy findings :

जिनमें साफ कहा गया कि बार-बार शिकायतें बोलने से दिमाग उसी पैटर्न को सीख लेता है और मन नकारात्मकता में फँसा रहता है। इसलिए कभी गहरी साँसें लेकर खुद को शांत करो, कभी अकेले में चिल्लाकर मन की भाप निकाल लो, कभी मन की कड़वाहट कागज पर लिखकर उसे फाड़ दो और कभी टहलते हुए खुद से यह पूछ लो, ‘क्या यह बात सच में इतनी बड़ी थी?’

तीसरे रिसर्च तक आते-आते एक बात स्पष्ट थी कि ये सब तरीके अस्थाई राहत देते हैं, लेकिन मन को स्थाई रूप से संतुलित करने का असली उपाय कोई और ही है। वैज्ञानिक अध्ययनों में यह बात बार-बार सामने आई कि ध्यान (Meditation) का प्रभाव किसी भी भावनात्मक नियंत्रण तकनीक से कहीं अधिक गहरा और स्थाई होता है।

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की माइंडफुलनेस-बेस्ड स्ट्रेस रिडक्शन रिसर्च में पाया गया कि नियमित ध्यान करने से एमिग्डाला (दिमाग में जहाँ गुस्सा पैदा होता है) की सक्रियता कम होती है और निर्णय लेने वाला प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स मजबूत होता है, जिससे प्रतिक्रिया देने की आदत घटती है।

स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के कम्पैशन एंड अल्ट्रुइज्म रिसर्च सेंटर की रिपोर्ट में बताया गया कि ध्यान करने वाले लोग दूसरों के व्यवहार को कम व्यक्तिगत रूप से लेते हैं, जिससे चुगली, गुस्सा, तुलना और मानसिक द्वंद्व स्वत: कम होने लगते हैं।

Also Read:  तीन-चार साल पहले प्लानिंग जरूरी, राह होगी आसान | विदेश में पढ़ाई

यूनिवर्सिटी आॅफ विस्कॉन्सिन की न्यूरोसाइंस रिपोर्ट में यह भी पाया गया कि ध्यान के कुछ हफ्तों बाद ही दिमाग में वह ‘भावनात्मक स्थिरता नेटवर्क’ मजबूत हो जाता है, जिससे मन छोटी-छोटी बातों की पकड़ से बाहर आने लगता है।
इन शोधों ने यह स्पष्ट कर दिया कि शरीर की साँसें ही मन का सबसे बड़ा दरवाजा हैं और ध्यान उस दरवाजे की वह चाबी है, जो भीतर की उथल-पुथल को स्थाई रूप से शांत कर देती है।

इन्हीं सवालों-जवाबों को समेटे जब मैं सत्संग सुनने पहुँची, तो पिता जी ने समझाया कि यदि किसी पर गुस्सा आ रहा है, तो किसी और के पास जाकर गाने से बेहतर है कि आप बाथरूम में जाएँ, नल चलाएँ और जोर-जोर से वह सब कह दें जो मन में भरा है। प्राणायाम के साथ सुमिरन करें। जैसे-जैसे स्वास रोकने की शक्ति बढ़ती जाएगी, वैसे-वैसे ही आपकी सहनशीलता भी बढ़ती जाएगी और किसी की कही हुई गलत बात का आप पर असर होना बंद हो जाएगा।

जब हम बार-बार दूसरों की कमियों को देखते हैं, तो धीरे-धीरे उनका असर हमारे भीतर उतरने लगता है। शिकायतें, ईर्ष्या, तुलना ये सब मन की मिट्टी को जहरीला करने लगती हैं। बार-बार किसी की बुराई गाने से वही आदतें कहीं न कहीं हमारे अंदर आकार लेने लगती हैं। हर धर्म निंदा-चुगली के खिलाफ है। गुरबाणी में तो इसके लिए कई पृष्ठ भरे पड़े हैं। सच तो यह है कि निंदा-चुगली का सबसे बड़ा नुकसान सामने वाले का नहीं, बल्कि हमारा अपना होता है। आधुनिकता के नाम पर तर्कों के आधार पर काँट-छाँट करने वाला मेरा मन भी अब मान रहा था कि रूहानियत ही सार्इंस का आधार है।

मैंने ठंडी साँस लेते हुए यह सब अपने अंदर समयाने की कोशिश की। धीरे-धीरे महसूस हुआ कि मन तब हल्का होता है जब वह दूसरों की कमियों से हटकर अपने सुधार की ओर मुड़ता है। एक अजीब-सी शांति भीतर उमड़ आती है। ऐसी शांति, जिसमें न अपराध-बोध बचता है और न ही कोई बोझ। बस एक साफ रास्ता, वह रास्ता जो हमें खुद तक ले जाता है और रूहानियत में आगे बढ़ने से रोकने वाली छोटी-छोटी कमियाँ पीछे छूटने लगती हैं।

बस, जरूरत है दृढ़ता से अपनी इस बुराई को छोड़ने का प्रण करने की। देरी इन्सान की तरफ से कुछ कदम बढ़ाने की होती है। सतगुरु तो इंतज़ार कर रहा होता है कि मुरीद कब अपनी अंगुली पकड़ाए और वह उसे सही राह पर ले जाए, ताकि मुरीद वो हर खुशी पाने के काबिल बन सके, जो सतगुरु उसे देना चाहता है।
-रेखा खन्ना