डीजल मैकेनिक से बना मशरूम उत्पादन में प्रगतिशील किसान Mushroom Farmers
दिसंबर 2003 को वो महीना जिसने गांव खारियां, जिला सरसा के रहने वाले विजय सिंह के मन को झकझोर दिया, उसे कुछ नया करने को मजबूर कर दिया। डीजल मैकेनिक विजय सिंह बेशक बचपन से ही खेती का शौंक रखता था, लेकिन परिवार के पास सीमित खेती ने उसकी इस महत्वकांक्षा को रोके रखा। लेकिन जब उसने वर्ष 2003 में गाँव के ही सुरेंद्र पेंसिया का मशरूम फार्म देखा तो उसे भी मशरूम की खेती का शौक जाग उठा।
यहीं से उसने इस व्यवसाय में उतरने की मन में ठान ली। सितंबर 2004 में विजय सिंह ने करीब 150 स्कवेयर फीट के मकान में 10 क्विंटल तूड़ी की मदद से मशरूम की खेती शुरु कर दी। पहली बार में उसने इसे साइड बिजनेस के तौर पर चलाया और कर्म खर्च में 10 हजार रूपए की बचत हुई। जुनून और कुछ कर गुजरने की जिद्द ने विजय ही नहीं, उसके पूरे परिवार को मशरूम की खेती रास आती दिखाई देने लगी।
जिसके चलते सितंबर 2013 में विजय सिंह ने एचएआईसी एग्रो रिसर्च एंड डेवल्पमेंट सेंटर मुरथल पानीपत से 5 दिवसीय ट्रैनिंग कैंप में भाग लेकर इस खेती की बारिकी सीखी और मैकेनिक का कार्य छोड़कर पूरी तरह से इस ओर अग्रसर हो गया। करीब 8 साल की मेहनत के बाद विजय ने अपने फार्म का साइज बढ़ाकर 4 हजार स्केवयर फीट कर दिया। वर्तमान समय में विजय सिंह का पूरा परिवार मशरूम की खेती के कार्य में जुटा हुआ जिससे उन्हें सालाना करीब साढ़े 5 लाख की आमदनी हो रही है। यही नहीं, विजय सिंह आज क्षेत्र में प्रगतिशील किसानों में शुमार हो चुका है।
48 वर्षीय विजय सिंह के पास खेती योग्य मात्र एक एकड़ भूमि है, जिसमें से करीब दो कनाल जगह मशरूम फार्म के लिए रखी गई है और बाकी 6 कनाल में गेहूँ इत्यादि की खेती करते हैं। उसने बताया कि वह दो बैच में बटन मशरूम की खेती करता है। जिसमें प्रथम चरण की प्रक्रिया सितंबर में शुरू हो जाती है, जबकि दूसरा चरण नवंबर में शुरू होता है। पहला चरण अब फरवरी के दूसरे सप्ताह तक पूरा होगा, जबकि दूसरा चरण मार्च के अंत तक चलेगा।
मौजूदा समय में 40 गुणा 50 फीट के दो भाग में चार-चार लाइनों में 16-16 बेड लगाकर मशरूम तैयार की जा रही है। दोनों बैच में करीब 50 क्विंटल मशरूम की पैदावार होती है, जो औसतन 110 रुपए प्रति किलोग्राम के अनुसार बिक्री में आती है। हालांकि उसे इस फार्म से करीब साढ़े 5 लाख की आमदनी देती है। जिसमें लगभग डेढ़ लाख की लागत शामिल है।
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बरसात से ढह गया था सबकुछ, पर हिम्मत नहीं हारी
सितंबर 2021 में अत्यधिक बरसात के कारण विजय सिंह का एक हजार स्क्वेयर फीट फार्म पूरी तरह से ढह गया था। उसे करीब ढाई लाख रुपए का नुकसान हुआ था। उस समय घर में दो बेटियों की शादी तय हो चुकी थी, इस प्राकृतिक आपदा ने उसे अंदर तक तोड़ दिया था। लेकिन इस विकट घड़ी में उसकी पत्नी शारदा ने हौंसला बढ़ाया और जैसे-तैसे 4000 स्क्वेयर फीट का बड़ा फार्म फिर से खड़ा कर दिया।
ये रहती है प्रक्रिया
मशरूम की खेती के लिए सितंबर में लॉग मेथड के तहत गेहूँ की साफ तूड़ी को गलाना शुरू किया जाता है, जिसमें गोबर या बिंठ खाद, डीएपी, यूरिया, पोटाश, जिप्सम, व गेहूँ का चोकर मिलाकर पूरा मिश्रण तैयार किया जाता है। जिसके बाद 15 अक्टूबर से बिजाई का कार्य किया जाता है। करीब 45 दिन के बाद मिश्रण से मशरूम निकलनी शुरू होती है। मशरूम की बिजाई के दौरान फार्म का तापमान करीब 25 डिग्री और उत्पादन के दौरान फार्म का तापमान करीब 18 डिग्री सेल्सियस रहना चाहिए। मशरूम को प्रतिदिन दोपहर बाद कटाई और शाम को पैकिंग तथा अल सुबह मंडी में बेचने की प्रक्रिया जारी रहती है।
हर कार्य में हाथ बंटाता है परिवार
विजय सिंह ने बताया कि मशरूम की खेती कार्य में उसकी दो बेटियों व पत्नी शारदा का पूरा सहयोग रहता है। मशरूम को तोड़ने से लेकर 200 ग्राम, 500 ग्राम व आॅर्डर अनुसार बड़ी पैकिंग बनाने का पूरा कार्य परिवार के सभी सदस्य साथ मिलकर करते हैं। जिसके बाद वह पैकिंग को प्रतिदिन अल सुबह डबवाली, ऐलनाबाद व पंजाब के मलोट शहर की मंडियों में बेचा जाता है। बटन मशरूम का औसत भाव 110 रुपए प्रति किलोग्राम रहता है।
विशेषज्ञों का मार्गदर्शन अवश्य लें
विजय सिंह समय-समय पर मुरथल ट्रैंनिग सेंटर से मशरूम विशेषज्ञ डॉक्टर अजय यादव, दिल्ली से डॉक्टर अशोक कुमार, सरसा से डॉक्टर वनीता राजपूत के अलावा हिमाचल से मशरूम विशेषज्ञों से भी संपर्क बनाए रखता है और मशरूम की खेती से जुड़ी नई तकनीक, प्रक्रिया, वैरायटी, तापमान, रोग व पैदावार बढ़ाने की जानकारी लेता रहता है।
मौजूदा समय में विजय सिंह बटन मशरूम के साथ डिंगरी (ओस्टर) मशरूम का ट्रायल कर रहा है। ताकि आगे के समय में बाजार की मांग को देखते हुए बटन मशरूम के साथ ओस्टर मशरूम की खेती को भी शुरू किया जा सके। विजय सिंह का कहना है कि आज का युवा खेती से दूर भाग रहा है लेकिन तकनीकी, नवाचार व सकारात्मक सोच के साथ बहुत कम खर्च व मेहनत में खेती से बहुत अच्छी पैदावार ली जा सकती है।































































