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Editorial: कर सेवा, खा मेवा सेवा का फल नगदो-नगद -सम्पादकीय

आम कहावत है कि ‘कर सेवा खा मेवा।’ इसमें कोई संशय हो भी नहीं सकता, क्योंकि सेवा का फल मिलता ही मिलता है। यह नहीं कि केवल दिखाने की सेवा बल्कि नि:स्वार्थ व सच्ची भावना से की गई सेवा ही सफल होती है, वह दुनिया के किसी क्षेत्र में भी हो सकती है और परमपिता परमात्मा ऐसी सेवा का फल भी तुरंत देते ही देते हैं।
घर-परिवार, अपने बाल-बच्चों, बुजुर्गों, माता-पिता की सेवा करना, सभी धर्मों के अनुसार कहें, तो यह इन्सान का फर्ज़ है। डेरा सच्चा सौदा के पूजनीय गुरु जी धर्मों के बारे अक्सर फरमाते ही हैं कि सेवा की शुरुआत अपने घर से ही होनी चाहिए। इन्सान सच्चे व हमदर्दी भरे दिल से अपने इस इन्सानी फर्ज़ को अपने परिवार से ही शुरु करे, परिवार के प्रति निभाए। बाल-बच्चों, परिवार का भरण-पोषण, हक-हलाल मेहनत की करके उनका पेट भरना, बच्चों को अच्छे संस्कार देना तथा उनकी सभी सामाजिक जरूरतों को पूरा करना यह इन्सान का पारिवारिक फर्ज़ है।

यहाँ पर जिस सेवा का उद्देश्य बताना चाह रहे हैं कि सभी धर्मों व संत-महापुरुषों के अनुसार कि सेवा का असल अर्थ (अपनों को छोड़कर) नि:स्वार्थ भाव से अन्य जररूतमंदों, पशु-पक्षियों, कीड़े-मकौड़ों, इन्सान आदि प्रभु की तमाम सृष्टि की सेवा करना ही मालिक परमपिता परमेश्वर की सेवा कहलाती है।
अगर इन्सान अपने पारिवारिक धर्म को निभाते हुए अपनी मेहनत की कमाई, यानि तन-मन-धन से दूसरे जरूरतमंदों, बीमार, दीन-दुखियों, लाचारों की यथा संभव सहायता करना, भूखे को खाना, नि:वस्त्र जरूरतमंद लोगों को मौसम के अनुसार कपड़े पहनाना, बीमार दीन-हीन जो लाचार हैं उन्हें यथा-संभव चिकित्सा उपचार मुहैया करवाना आदि ऐसी तमाम सेवाएं सच्ची सेवा में शामिल हैं। नर सेवा नारायण सेवा यानि प्रभु की सृष्टि की सेवा प्रभु की ही सेवा है और यही सच्ची इन्सानियत भी है। ऐसी सेवा ही परमपिता परमात्मा की पावन हजूरी में अवश्य परवान होती हैं तथा मालिक की उस दरगाह से ऐसे नि:स्वार्थ सेवा करने वालों के लिए निरंतर खुशियाँ आती रहती हैं। कोई कमी उन्हें नहीं रहती।

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डेरा सच्चा सौदा में लगभग हर समय ही सेवा का महाकुंभ चलता रहता है और डेरा सच्चा सौदा के लाखों सेवादार, शाह सतनाम जी ग्रीन एस वैल्फेयर कमेटी के जांबाज सेवादार तन-मन-धन से (नि:स्वार्थ भाव से) सेवा से जुड़े हैं। डेरा सच्चा सौदा के पूजनीय गुरु जी तीनों पवित्र बॉडियों यानि डॉ. एमएसजी के रूप में साध-संगत, सेवादारों को यही आह्वान करते हैं कि आज के इस भयानक युग में लोग अपने धुरधाम, परमपिता परमात्मा से बेमुख होकर नशे व ऐसी ही अन्य अनेकों भयानक बुराइयों की दलदल में फंसे हैं अर्थात् ऐसे भयानक नशों के जाल में फंस चुके हैं कि चाहते हुए भी वे उन्हें छोड़ नहीं पाते। हम रोज़ाना सुनते व देखते भी हैं कि अनेकों नौजवान, माँ-बाप की इकलौती संतान भी परिवार की जमीन-जायदाद आदि सब-कुछ नशों में बर्बाद कर रहे हैं, बल्कि वह अपने बूढ़े माँ-बाप को दर-दर की ठोकरें खाने के लिए अकेला छोड़कर अपने आपको इस दलदल में गरक कर लेते हैं, यानि मर जाते हैं। पूज्य गुरु जी फरमाते हैं कि माँ-बाप का दु:ख तो है ही, लेकिन हमें तो इतना ज्यादा दु:ख होता है कि कुछ कहा नहीं जा सकता कि वह मालिक की औलाद यानि हमारी औलाद अपनी जवानी को क्यों ऐसे बर्बाद कर रही है।

पूज्य गुरु जी ने यह आह्वान किया कि हमारी सभी साध-संगत से अपील है, हम यह आह्वान करते हैं कि आप लोग ऐसे बेबस लोगों, नशेड़ियों को यहाँ डेरा सच्चा सौदा के द्वारा समझा-बुझा के राम-नाम से जोड़कर उन्हें नशों की इस भयानक दलदल से निकाल दें, तो कलियुग में यह सबसे बड़ी सेवा है कि परमपिता परमेश्वर से बिछुड़े किसी इन्सान को उससे जोड़ दिया, किसी बिछुड़े बच्चे को उसके अपने माँ-बाप, बहन-भाई आदि से मिला दिया है, उस माँ-बाप की खुशियों का कोई अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता और वह सेवादार परमात्मा की बेअंत खुशियों का हकदार हो जाता है। पूज्य गुरु जी फरमाते हैं कि आज के समय में यह सबसे बड़ी सेवा है। यही सभी रूहानी संतों का फरमान है कि ऐसी नि:स्वार्थ सेवा हमेशा परमेश्वर की दरगाह में परवान अवश्य होती है और इसका फल भी नगदो-नगद ही मिलता है। परिवार में सुख-समृद्धि और खुशहाल जिंदगी ऐसे सेवादार हासिल करते ही करते हैं। तभी तो महापुरुषों ने कहा कि ‘कर सेवा खा मेवा’ और नि:स्वार्थ सेवा का फल नगदो-नगद यहाँ पर मिलता है। तो आप सभी से भी अपील है कि जुड़ें ऐसी नि:स्वार्थ सेवा से और अपनी हर जायज मांग को बिन मांगे तथा सेवा का नगदो-नगद फल भी हासिल करेें जी।

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