न बनें Night OWL
आध्यात्मिक दृष्टि से भी रात का भोजन तामसिक ऊर्ज़ा बढ़ाता है, जैसे- आलस, बेचैनी, दु:ख और नकारात्मकता। जबकि सूर्यास्त से पहले का भोजन सात्विक होता है और शांति, हल्कापन, प्रसन्नता और आध्यात्मिक उन्नति लाता है।
आज के नौजवान खुद को ‘नाइट आउल’ समझते हैं। दिनभर की थकान के बाद रात को काम, ओटीटी, रील्स और चटपटे स्नैक्स के साथ ज़िंदगी बढ़िया लगती है। सुबह देर से उठना उनकी शान हो चुकी है। सुबह का नाश्ता लेट, दोपहर का खाना लेट, फिर रात का खाना देर रात। रात को देर रात तक काम करने से लेट नाइट स्नैक लेना एक फैशन-सा बन गया है, लेकिन एक ऐसी बात है, जिसे हम नज़रअंदाज़ कर देते हैं कि हमारा शरीर आज भी सूरज की जैविक घड़ी (Circadian Rhythm) पर चलता है, न कि मोबाइल के डिजिटल समय पर।
हजारों वर्ष पहले आयुर्वेद ने स्पष्ट निर्देश दिया था, ‘ना अति सायं अन्नं अश्नीयात’, अर्थात् शाम का खाना बहुत देर रात को नहीं लेना चाहिए। उस समय न कोई कैलोरी गिनी जाती थी, न मेटाबॉलिज्म की बातें होती थी, फिर भी यह नियम आज के विज्ञान के लिए किसी सुवर्ण सूत्र से कम नहीं।

कई लोग कहते हैं कि रात को ही तो भूख लगती है, क्या करें? असल में भूख नहीं लगती, बल्कि आदत लग जाती है। नींद का प्राकृतिक हार्मोन Melatonin रात में बढ़ना शुरू होता है, जिससे शरीर आराम चाहता है और डीएनए पूरे शरीर की मुरम्मत करने लग जाता है। लेकिन तभी हम पेट में एक और डोज भेज देते हैं जैसे पिज्जा का एक स्लाइस, मैगी या चिप्स का पैकेट। फिर पाचन क्रिया काम पर लग जाती है और शरीर की रात वाला ‘डिटॉक्स मोड’ टूट जाता है। यही वजह है कि देर रात खाने वालों को सुबह अक्सर भारीपन, आलस, चिड़चिड़ापन और चेहरे पर बेजानपन महसूस होता है।
दिमाग भी इससे अछूता नहीं। जब पेट पाचन में व्यस्त होता है मस्तिष्क को रक्त प्रवाह कम मिलता है। इसलिए देर रात फुल पेट खाने वालों में एकाग्रता की कमी, तनाव और मानसिक भ्रम ज्यादा देखने को मिलता है। योग और आयुर्वेद सदियों से कहते आए हैं
‘मनसि प्रसन्ने कुशलं शरीरम्’।
पाचन हल्का हो तो मन स्थिर रहता है, शरीर स्वस्थ रहता है, ध्यान और सोचने की क्षमता बढ़ती है। साइको-न्यूट्रिशन रिसर्च बताती है कि भोजन के समय और वातावरण का सीधा असर न्यूरोट्रांसमीटर जैसे सेरोटोनिन व डोपामीन पर होता है।
आध्यात्मिक दृष्टि से भी रात का भोजन तामसिक ऊर्ज़ा बढ़ाता है, जैसे- आलस, बेचैनी, दु:ख और नकारात्मकता। जबकि सूर्यास्त से पहले का भोजन सात्विक होता है और शांति, हल्कापन, प्रसन्नता और आध्यात्मिक उन्नति लाता है। यही कारण है कि ऋषि-मुनियों ने हमेशा समय पर और हल्का भोजन करने की सलाह दी, ताकि मन ध्यान और साधना में सहज रहे।
रात का समय शरीर की शुद्धि का है, पाचन का नहीं। लीवर और किडनी इसी दौरान डिटॉक्सीफिकेशन करते हैं।
यदि पेट में अपचित भोजन पड़ा हो, तो यह प्रक्रिया रुक जाती है और बीमारियाँ जन्म लेती हैं। इससे डायबिटिज़, मोटापा, फैटी लीवर, दिल की बीमारियाँ आदि का खतरा बढ़ता है। जल्दी खाना खाने से न सिर्फ ब्लड शुगर नियंत्रित रहता है, बल्कि नींद गहरी आती है और सुबह शरीर ऊर्जावान, तरोताजा व मन संतुलित महसूस करता है।
आयुर्वेद एक और बड़ी सीख देता है – इंद्रिय संयम की शुरूआत पेट से होती है। भोजन के प्रति संयम ब्रह्मचर्य (Celibacy) का आधार है। जो व्यक्ति पेट और स्वाद पर नियंत्रण रखता है, वह मन और विचारों को भी आसानी से नियंत्रित कर सकता है।
विज्ञान भी बताता है कि Intermittent Fasting और समय पर भोजन करने से Growth Hormones और Testosterone संतुलित होते हैं, जिससे Self control और mental Stabillity बढ़ती है। लेकिन ध्यान रखें ‘जल्दी खाना’ का अर्थ समय पर खाना है, तेजी से खाना निगलना नहीं। भोजन को धीरे-धीरे, ध्यानपूर्वक चबाकर खाने से पाचन एंजाइम सही बनते हैं और शरीर को पूरा पोषण मिलता है।
उम्र का कोई भी पड़ाव है, आप जवान हैं, अधेड़ हैं या बुजुर्ग अवस्था में प्रवेश कर रहे हैं। चाहे कोई भी पड़ाव है, खाना खाकर कभी लेटना या बैठना नहीं चाहिए। खाना खाने के बाद चलना चाहिए, यह पक्का असूल बना लो। रात का खाना खाके सो गए तो फैट और बहुत सारी अन्य परेशानियाँ हो सकती हैं।
रात का खाना खाकर दो किलोमीटर, डेढ़ किलोमीटर जितना भी चल-फिर लिए उतना हाज़मा बढ़िया रहता है और बॉडी में पावर ज्यादा आती है तथा तंदुरूस्ती बनी रहती है। सुबह का खाना राजा की तरह, दोपहर का खाना रानी की तरह और रात का खाना रंक की तरह खाओ। मतलब सुबह पेट भर खाना चाहिए, दोपहर में हल्का खाना खाना चाहिए और रात को बहुत ही कम खाना चाहिए। -पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां

































































