चिराग से चिराग जलाएं, दूसरों के भी काम आएं -सम्पादकीय
अपने स्वार्थ के लिए तो हर कोई जीता है। पशु-पक्षी, जानवर, कीड़े-मकौड़े भी अपने स्वार्थ के लिए जीते हैं और अपनी इच्छाओं को पूरा करने में ही सारी ज़िंदगी लगे रहते हैं और आखिर उन्हीं में खोए हुए वे मर जाते हैं लेकिन इच्छाएं ज्यों की त्यों रहती हैं, पूरी नहीं होती। क्या इन्सान की अवस्था भी उन्हीं के समान नहीं हैं? क्या इन्सान को आज अपने स्वार्थ के बगैर कुछ और सूझता है? स्वार्थ के लिए तो इन्सान, हो सकता है गधे को भी बाप कह दे, लेकिन बिना गर्ज़ के अपने बाप को भी बाप मानने से इन्कार कर सकता है।
ऐसा स्वार्थी युग है यह कलियुग। आज किसी भी स्वार्थी व्यक्ति का कुछ भरोसा नहीं कि वह किसी को भी कब धोखा दे जाए। यही है आज के इस मतलब परस्त युग यानि कलियुग की विशेष निशानी। रूहानी संतों का उपदेश है कि इन्सान को परमार्थ यानि जरूरतमंदों की मदद करने के लिए भी जीना चाहिए। अपने बाल-बच्चों का पालन-पोषण करना इन्सान का फर्ज़ है। उनके लिए मेहनत-परिश्रम करें, उन्हें पढ़ाएं-लिखाएं, अच्छी शिक्षा दें, उन्हें अच्छे संस्कार दें।
यह मोह-ममता नहीं, बल्कि धर्मों के अनुसार यह इन्सान का धर्म है। लेकिन जायज़-नाजायज़ तरीके से रात-दिन उनके लिए मायक-पदार्थों को एकत्रित करने में लगे रहना, प्रभु-परमात्मा को एक पल भी याद न करना और उल्टा यह कहना कि इसके (प्रभु-भक्ति) लिए तो मेरे पास समय ही नहीं है। लेकिन दूसरी तरफ ईर्ष्या, नफरत, निंदा-चुगली में चाहे पूरी रात लग जाए, ज़रा भी नहीं उकताता। वह समय कहाँ से आ जाता है पूछना चाहिए उन लोगों से।
आमतौर पर सर्वत्र यही कुछ तो देखा जा रहा है। खा लिया, पी लिया, विषय-वासनाओं में खो गया और सुबह हुई, तो वही मारा-मारी, वही बोझ फिर से कंधे पर उठा लिया। पशु-जानवर भी तो यही काम करते हैं। भाव खाना-पीना-सोना और बच्चे पैदा करना। क्या कोई अंतर है? हाँ, एक बहुत बड़ा अंतर है कि अगर इन्सान अपने इस बेशकीमती व दुर्लभ जन्म (मनुष्य जन्म) के बारे विचार करे। यह मनुष्य शरीर रूपी अनमोल जन्म आत्मा को अनन्त समय के बाद मोक्ष-मुक्ति के लिए ही मिला है जो कि केवल और केवल प्रभु की सच्ची भक्ति करने से ही संभव है।
अगर इन्सान रूहानी संतों के द्वारा दिखाए सच्चे मार्ग पर नहीं चलता, अपनी बुराइयां छोड़कर मालिक के सच्चे नाम से नहीं जुड़ता, तो वह अपने इस अति-उत्तम व खुदमुख्तयार तथा आज़ाद जन्म को व्यर्थ में गंवाकर फिर से पराधीन जूनियों में चला जाएगा। जबकि रूहानी संतों ने कहा है कि इन्सान का फर्ज है कि वह हक-हलाल, मेहनत-परिश्रम, दसां नहुआं दी किरत कमाई करके खाए और प्रभु का नाम जपे तथा साथ में समय निकाल कर परमार्थ यानि जरुरतमंदों की हर संभव मदद भी करे।
सच्चे मुर्शिदे-कामिल परम पूजनीय हजूर पिता संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां के वचनानुसार कि इन्सान रोज़ाना सुबह-शाम चौबीस घंटों में से केवल दो घंटे भी निरंतर मालिक की याद में लगाए, तो हो नहीं सकता कि आत्मा को मालिक के दर्श-दीदार या उसकी दया-मेहर, रहमत, उसकी खुशी का अनुभव न हो। सर्व-सामर्थ दातार उसकी हर जायज मांग को बिन मांगे अवश्य पूरी कर देता है। इसलिए रूहानी संतों का फरमान है कि बेशक इन्सान खुद-मुख्तयार व ज्ञान का भंडार है, लेकिन हाथ में लिए उस ज्ञान रूपी चिराग का क्या लाभ अगर वह खुद ही अंधेरे में रहे। किसी गड्ढे या कूंए में जा गिरे।
महापुरूषों के वचन हैं कि ‘मन जाने सब बात, जानत ही अउगुण करै। काहे की कुसलात, हाथ दीप कूंए परै।’ पंजाबी में भी कहावत है ‘दीवे तले अंधेरा’। जबकि सभी धर्मों में एक ही साझी बात आती है कि इन्सान को एक चिराग की तरह जीना चाहिए और दूसरों के लिए भी पथ-प्रदर्शक बनना चाहिए। पूजनीय हजूर पिता जी फरमाते हैं कि इन्सान चिराग की तरह जीए, यानि दूसरों को भी रास्ता दिखाए और खुद भी अज्ञानता के अंधेरे (भाव बुराइयों से) से बचे।
जो ऐसा करते हैं, अपने चिराग (ज्ञान रूपी दीपक) से अन्य चिराग जलाते हैं, कहने का मतलब कि जो अपने ज्ञान के प्रकाश से दूसरों की बुराइयों को दूर करके नेकी-भलाई के कार्यों व इन्सानियत की सेवा में लगा देते हैं। उनकी नेकी-भलाई की ये गाथाएं दुनिया के लिए उदाहरण बन जाती हैं।


































































