तेरी अब बल्ले-बल्ले है’ -सत्संगियों के अनुभव -पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज की दया-मेहर
बहन प्रितपाल कौर इन्सां पत्नी प्रेमी सुखमंदर सिंह इन्सां निवासी फरीदकोट, जिला फरीदकोट (पंजाब)। बहन जी बताती हैं कि
सन् 1975 की बात है, मैं उस समय अचानक बीमार हो गई थी। एक महीने में ही तीन बार दवाई रिएक्शन कर गई थी। उस समय नाम लेने से पहले ही मुझे पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज के दर्शन होने लगे थे। इस दौरान ही पूजनीय परमपिता जी ने मुझे आशीर्वाद देते हुए फरमाया कि ‘बेटा, फिक्र न कर! सब कुछ ठीक हो जाएगा।’ इस तरह से दर्शन करके मुझे अत्यन्त खुशी मिलती। परंतु उस समय तक न तो मैं सच्चा सौदा के बारे कुछ जानती थी, और न ही पूजनीय परमपिता जी के बारे।
एक दिन मैं रेलगाड़ी से कहीं जा रही थी। मैंने किसी को बातें करते हुए सुना कि आज से आठवें दिन सच्चा सौदा वाले संतों का मोगा में सत्संग है। वह बहुत महान संत हैं। तो मैंने वहीं रेल गाड़ी में ही बैठे-बैठे यह प्रण कर लिया कि अगर मेरी बीमारी ठीक हो जाए तो मैं मोगा में संतों का सत्संग सुनूंगी, दर्शन करूंगी और नाम-शब्द भी ले लूंगी। तो मैं उसी दिन ही बिल्कुल ठीक हो गई, जबकि पिछले कई हफ्तों से लगातार बीमार चल रही थी। मैं निश्चित दिन को मोगा शहर में सत्संग पर पहुंच गई।
मैंने सामने स्टेज पर बैठे पूजनीय परमपिता जी के जब पहली बार प्रत्यक्ष दर्शन किए तो हैरान रह गई कि ये तो वो ही बाबा जी हैं जो मुझे पिछले कई हफ्तों से दर्शन दे रहे हैं। मैंने अपने मन में निश्चय कर लिया कि ये तो खुद रब्ब हैं। मुझे इतना विश्वास हो गया कि मैंने उसी दिन सत्ंसग के बाद ही पूजनीय परमपिता जी से नामदान ले लिया।
कार्यक्रम की समाप्ति पर मुझे एकदम यह ख्याल आया कि पूज्य परमपिता जी से मिलना चाहिए। मैंने देखा वहाँ पर और भी कई सत्संगी भाई-बहन पूजनीय परमपिता जी से मिलने की इच्छा लिए बैठे थे।
आज्ञा मिलने पर हम परमपिता जी से मिलने अंदर चले गए। मैंने अपने नियमों के अनुसार पूजनीय परमपिता जी के सत्कार में नमन करते हुए सतश्रीअकाल बोला। वर्णनीय है कि उस समय मुझे नारा ‘धन धन सतगुरु तेरा ही आसरा’ की असलीयत बारे में कुछ भी पता नहीं था कि यह नारा सभी धर्मों का सांझा नारा है। परमपिता जी ने मुस्कुराते हुए वचन फरमाए, ‘बेटा, किसी का लेना-देना था, वह पूरा हो गया। अब बल्ले-बल्ले है!’ फिर आगे वो ही वचन फरमाए जो स्वप्न में फरमाए थे, ‘बेटा! फिक्र ना किया कर, सब कुछ ठीक हो जाएगा।’ मैंने नाम-शब्द लेकर सुमिरन करना शुरु कर दिया और अपने मुर्शिद के वचनों को दृढ़ता से माना और उसके बाद सभी तरफ से अपने ख्यालों को मोड़कर केवल और केवल अपने सतगुरु मुर्शिदे-कामिल के चरणों में ही एकाग्र कर लिया। नाम शब्द से पहले हमारे घरेलू हालात ऐसे थे कि सारी तनख्वाह दवाइयों पर ही लग जाती थी।
हम सोचते रहते कि यह महीना कैसे निकलेगा। जब दवाई रिएक्शन कर गई थी तो उस दौरान घरेलु हालत इतनी बदतर हो गई थी कि डॉक्टरों ने भी जवाब दे दिया था। डॉक्टर कहते थे कि इसका सारा ब्लॅड खराब हो गया है। जब मैंने नाम-शब्द ले लिया और उसका निरंतर सुबह-शाम सुमिरन किया तो सतगुरु जी ने हमारी तकदीर ही बदल दी। सतगुरु दाता जी ने हमें कोई कमी नहीं रहने दी और हर तरफ से मालामाल कर दिया।
काफी समय बाद एक बार मुझे काला पीलिया बुखार हो गया था। मैं चलने-फिरने में भी असमर्थ हो गई थी। किसी भी डॉक्टर से आराम न आया। उन दिनों में पूजनीय परमपिता जी मलोट दरबार में आए हुए थे। मेरे पति ने पूजनीय परमपिता जी के दर्शन करने के लिए दरबार जाना था। मैंने परमपिता जी के नाम एक पत्र लिखा, जिसमें अपना सारा हाल ब्यान कर दिया था। मैंने वह पत्र परमपिता जी को देने के लिए अपने पति को दे दिया।
परमपिता जी संगत को दर्शन देने के लिए तेरा वास से बाहर आए और संगत में कुर्सी पर विराजमान हो गए। परमपिता जी कुछ समय तक संगत से वचन विलास करते रहे। मेरे पति ने मेरा पत्र परमपिता जी को नहीं दिया। उन्होंने सोचा कि पत्र देता हूँ तो पिता जी क्या कहेंगे कि तुम सेवादार होकर बीमारी की चिट्ठी देते हो। जब परमपिता जी कुर्सी से उठकर जाने लगे, तो अचानक मेरे पति के पास आकर रूक गए। परमपिता जी मेरे पति को मुखातिब करके कहने लगे – बेटा, प्रितपाल बहुत बीमार हो गई! चल-फिर नहीं सकती! बेटा उसके वास्ते प्रशाद लेकर जाना। परमपिता जी ने मेरे लिए मिश्री के प्रशाद का लिफाफा और एक लाल रंग का छनकना मेरे पति को देते हुए फरमाया- ‘बेटा, यह प्रशाद उसने अकेले ही खाना है। ’ मैंने परमपिता जी द्वारा बख्शा हुआ प्रशाद खाया तो कुछ दिनों में ही बिल्कुल तंदुरूस्त हो गई।
मुझे नया जीवन मिल गया। उसके बाद मेरी इतनी बढ़िया सेहत बनी कि सभी हैरान रह गए। कोई दवाई-बूटी नहीं ली और मुझे फिर कभी बुखार भी नहीं हुआ। मालिक सतगुरु ने इतनी रहमत बख्शी, जिसका बदला चुकाया ही नहीं जा सकता। जब मैंने प्रशाद खाया तो उसी रात मुझे यह स्वप्न आया कि मैं सरसा दरबार में गई हुई हूँ। वहाँ तेरावास के पास एक भाई कुर्सी पर बैठा था। ऐसे लगता था जैसे अंडर-ग्राउंड गुफा का दरवाजा हो। मैंने उस भाईजी को कहा कि भाई जी, मैंने परमपिता जी से मिलना है।
उस भाई जी ने मुझे कहा कि पिता जी तुम्हारी उम्र बढ़ाने के लिए गए हैं। यह सुनकर मैं हैरान रह गई। जब मेरी आंख खुली तो मैं समझ गई कि असल कहानी क्या थी। सचमुच ही परमपिता जी ने मेरी उम्र बढ़ाई है। मेरा मौत जैसा भयानक कर्म बदलकर मुझे नया जीवन बख्शा है। अब मेरी पूज्य परमपिता जी के मौजूदा पावन स्वरूप पूज्य हजूर पिता संत डॉ. एमएसजी से यही अरदास है कि सेवा-सुमिरन का बल बख्शना जी तथा इसी तरह दया-मेहर बनाए रखना कि हमारा विश्वास और भी दृढ़ हो।

































































