Experiences of the Satsangis पहले ही बता दिया अपना अंतिम समय -सत्संगियों के अनुभव -पूजनीय बेपरवाह सार्इं शाह मस्ताना जी महाराज का रहमोकरम
प्रेमी घुक्कर सिंह नम्बरदार गाँव झुम्बा, जिला भटिंडा (पंजाब) से पूजनीय बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज की उसकी पत्नी पर हुई अपार कृपा का वर्णन इस प्रकार करता है-
सन् 1958 की बात है जब मैंने पहली बार शहनशाह मस्ताना जी महाराज के दर्शन किए। दर्शन देकर शहनशाह जी ने सदा के लिए मुझे अपना बना लिया। उसी वर्ष हमारे सारे परिवार ने शहनशाह मस्ताना जी से नाम-शब्द की अनमोल दात प्राप्त कर ली। हमारा पूरा परिवार डेरा सच्चा सौदा के प्रति नत्मस्तक है। पहले पातशाह पूजनीय बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज, दूसरे पातशाह परम पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज और तीसरे पातशाह पूज्य हजूर पिता संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां में कोई अन्तर नहीं है। हमें तीनों पातशाहियों की सोहबत करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
मेरी पत्नी गुरनाम कौर पर सतगुरु जी की अपार कृपा थी। वह हर समय नाम का सुमिरन करती रहती। उसका सतगुरु के प्रति प्रेम बहुत अधिक था। जब पूजनीय परमपिताजी अथवा हजूर पिताजी हमारे घर आते तो वह अपार मस्ती में डूब जाती। वह सतगुरु जी की अति संस्कारी रूह थी। उसे भविष्य में होने वाली घटनाओं का समय पूर्व ही अहसास हो जाता था। वह साथ आए सेवादारों व साध-संगत की बहुत ज्यादा सेवा करती।
सन् 1960 की बात है। उसने सुबह सुमिरन करने के बाद मुझे बताया कि उसकी माता (मेरी सास) ऊंट से नीचे गिर गई है। उसे बहुत चोटें आई हैं। मैंने उससे पूछा कि तुझे किसने बताया है यहाँ बैठी को? वह कहने लगी कि मुझे सच्चे पातशाह मस्ताना जी महाराज ने बताया है। दूसरे दिन मेरे ससुर का परिवार माता को लेकर हमारे घर आ गया, क्योंकि हमारे गाँव में ईलाज करने वाला एक बहुत बढ़िया वैद्य था। मेरी सास को सचमुच ही ऊँट से गिर कर चोटें आई थी जो सतगुरु जी ने मेरी पत्नी को पहले ही दिखा दिया था।
इसी प्रकार मई 2001 की बात है। मेरी पत्नी गुरनाम कौर अपने मायके गाँव चक्क अतर सिंह वाला जिला भटिंडा में मिलने के लिए गई हुई थी। वहाँ पर उसने अपने भाई हरबंस सिंह को बताया कि मेरा सवा साल बाकी रह गया है। मुझे शहनशाह मस्ताना जी महाराज बता कर गए हैं। उनके परिवार ने वो तिथि लिख ली। उस दिन 4 मई 2001 का दिन था। सब संशय में थे कि ऐसा हो भी सकता है या नहीं।
उसके बाद वह अक्सर कहा करती थी कि मेरे दिन थोड़े ही रह गए हैं। जैसे-जैसे समय नजदीक आता गया, वह कहने लगी कि अब मैंने जाना है, मेरा समय आ रहा है। 29 जुलाई 2002 के दिन वह पूज्य हजूर महाराज जी के दर्शन करने के लिए डेरा सच्चा सौदा, सरसा दरबार में आई। समय मिलने पर उसने पूज्य हजूर पिताजी के चरणों में अर्ज़ की कि मुझे किसी के वश में न पाना। (यानि बढ़ती उम्र में लाचारी जैसी स्थिति से बचाना) अब मुझे ले चलो। सच्चे पातशाह दयालु सतगुरु जी ने वचन फरमाया, ‘क्या पता, तेरी अर्ज़ मालिक मंजूर कर ले।
आखिर वो समय भी आ गया। चोला छोड़ने से दो दिन पहले उसको बुखार हो गया जबकि चैकअप करवाया तो सब कुछ नॉर्मल था। उसका अन्तिम समय जो आ गया था। इसी दौरान 4 अगस्त 2002 के दिन सुबह तीन बज कर पैंतीस मिनट पर चल बसी। सतगुरु अपनी रूह को अपने वतन ले गए। वाकई उसने सवा साल पहले जो अपना समय बताया था, उसी के अनुसार ही शहनशाह मस्ताना जी महाराज उसे अपनी गोद में बैठाकर अपने निजदेश अनामी-धाम ले गए।
नाम वाले सभी जीवों को सतगुरु अंत समय अपने साथ अपने वतन-अनामी देश सतलोक, सचखण्ड ले जाते हैं। पर जो सतगुरु की अति प्यारी रूहें होती हैं, उन्हें सतगुरु जी पहले ही बता देते हैं। जिस तरह कि उपरोक्त साखी से स्पष्ट है। पूज्य गुरु जी के पवित्र चरण-कमलों में यही अरदास है कि हमारे परिवार पर इसी प्रकार रहमत बनाए रखना और आने वाली पीढ़ियाँ सेवा-सुमिरन में लगी रहें जी।


































































