Children’s Story: बाल कथा: रोहित का संगीत
हरियाणा के एक गाँव में रोहित नाम का एक लड़का था जो बचपन में ही अनाथ हो गया था। उसकी परवरिश गाँव के लोगों ने की और उसे माता-पिता की कमी महसूस नहीं होने दी। रोहित स्वभाव से ईमानदार और मेहनती था। गाँव वालों की मदद करने के लिए वह तैयार रहता था। भगवान ने रोहित को बहुत मीठी व सुरीली आवाज दी थी। रोहित भी अपने पिता की तरह बहुत अच्छी बाँसुरी बजाता और भक्ति गीतों के स्वर निकालता। जब भी वह अपने काम से खाली होता तो बाँसुरी लेकर खेतों में जा बैठता और नए-नए गीतों की धुन निकालता।
जिन दिनों फसलें पकने को होती या कोई त्यौहार, उत्सव होता, सब रोहित को भजन सुनाने को कहते और बाँसुरी बजाने को कहते। रोहित पूरे उल्लास और उत्साह से यह सब करता। धीरे-धीरे आसपास के गाँव वाले भी उसे न्यौता देने लगे कि हमारे गाँव में त्यौहार, ब्याह शादियों में गीत सुनाओ। रोहित ने न्यौते स्वीकार करने शुरू कर दिए और लोग उसे उसकी एवज में पैसे देते पर गांव वालों से वह पैसे नहीं लेता था। धीरे-धीरे वह मशहूर होता गया। अब तो वह शहरों में भी अपने प्रोग्राम देने लगा और खूब कमाई करने लगा।
अपने व्यस्त जीवन में भी वह गाँव वालों को नहीं भूला। जब भी गाँव से बुलावा आता या कोई ग्रामवासी उससे मिलने शहर आता और उसे न्यौता देने आता तो उसकी पहली प्रमुखता अपना गाँव ही होता। गांव के मुखिया रोहित को बचपन से ही प्यार करते थे। मुखिया की अपनी औलाद न होने के कारण उन्होंने उसे अपने घर में रखा हुआ था। रोहित मुखिया और उनकी पत्नी की बहुत इज्जत करता था और वक्त-बेवक्त उनके कामों में हाथ बँटाता था।
एक बार मुखिया बहुत बीमार हो गया और संतान न होने के कारण वह चिड़चिड़ा हो गया था। वह पत्नी को डांटता-फटकारता और समय पर दवा भी न लेता। चुपचाप कमरे में लेटा रहता और छत की ओर ताकता रहता। यह बात जब शहर में रोहित को पता चली तो वह अपने आगामी प्रोग्राम कैंसिल कर गाँव आ गया और दिन रात मुखिया की सेवा करने लगा। सुबह-शाम भजन सुनाता और बाँसुरी बजा कर उनका मनोरंजन करता।
अब मुखिया जी काफी ठीक होने लगे। इस प्रकार रोहित को शहर से आए दो माह बीत गए और मुखिया जी तन्दुरूस्त होने लगे। गाँव के सब लोग हैरान थे कि जो काम डॉक्टर, वैद्य न कर सके, वह रोहित ने कर दिखाया। रोहित की बाँसुरी और आवाज़ में इतना जादू था कि मुखिया जी का जीवन ही बदल गया। जब मुखिया जी काफी तन्दुरूस्त हो गए तो रोहित ने विदाई लेनी चाही। उसने देखा, मुखिया जी उसके जाने के नाम पर फिर से उदास और ढीले हो गए। रोहित ने मुखिया जी से कहा, ‘अब तो मुझे जाना होगा।
’ मुखिया जी ने रोहित के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘अब तुम कहीं नहीं जाओगे। मेरी जमीन जायदाद का ध्यान रखोगे, मेरे पास रहकर’ पर रोहित तो किसी पर निर्भर होना नहीं चाहता था। वह आत्मनिर्भर बनना चाहता था। मुखिया जी को लगा, ऐसा कुछ सोचूं कि उसके आत्मसम्मान को ठेस न पहुंचे। उन्होंने रोहित को सलाह दी कि अब तुम यहाँ रहोगे और गाँव में संगीत विद्यालय खोल कर गाँव के अन्य बच्चों को संगीत सिखाओगे। यह बात रोहित को भा गई और उसकी आँखों में संतोष और आत्मसम्मान की चमक साफ दिखाई देने लगी। -नीतू गुप्ता


































































