Story: राजा और लक्कड़हारा -जीवन की सीख
एक बार की बात है। एक राजा शिकार खेलने के लिए गया और शिकार खेलते-खेलते वह आबादी से बहुत दूर जंगल में निकल गया। गर्मी का मौसम था। राजा को बहुत जोर से प्यास लग आई। राजा शिकार को छोड़कर वहाँ पानी की तलाश करने लगा लेकिन उसे कहीं भी पानी नज़र नहीं आ रहा था। राजा ने सोचा कि अगर पानी न मिला, तो प्यास के कारण जान निकल जाएगी। उसने थोड़ी और हिम्मत जुटाई और इधर-उधर पानी की तलाश करने लगा।
अचानक उसे जंगल में लकड़ियाँ काटने की आवाज़ सुनाई दी। राजा ने सोचा कि लकड़ियाँ काटने वाले व्यक्ति के पास पानी जरूर होगा। इसलिए वह आवाज़ की दिशा की ओर चल पड़ा। जल्दी ही वह वहाँ पर पहुँच गया जहाँ वह व्यक्ति (लकड़हारा) लकड़ियाँ काट रहा था। राजा ने लकड़हारे से पीने के लिए पानी मांगा।
लकड़हारे ने उसे बहुत ही प्यार से पानी पिला दिया। पानी पीकर राजा बहुत खुश हो गया और उससे कहने लगा, ‘मैं राजा हूँ, मांग ले क्या चाहता है?’ राजा ने उसे खुश होकर चन्दन का बाग बख्श दिया। एकदम इतनी भारी संख्या में वृक्ष हासिल करके लकड़हारा बहुत खुश हो गया और मन में कहने लगा, ‘पहले लकड़ियों के एक गठ्ठे के लिए वन-वन भटकना पड़ता था, अब पूरे का पूरा जंगल ही मिल गया है। इसीलिए तो कहते हैं कि राजे राजे ही होते हैं।’
वह लकड़हारा लकड़ियों के कोयले बना-बना कर बेचा करता था। उसे चन्दन की महत्ता व इसके बेअन्त मूल्य का बिल्कुल भी पता नहीं था। इसलिए उसने चन्दन के उन वृक्षों को भी काट-काटकर व उनके कोयले बना-बनाकर बेचना शुरू कर दिया। इस तरह धीरे-धीरे सारे का सारा बाग खाली हो गया और फिर से पहले की तरह उसने जंगल में लकड़ियाँ काटना शुरू कर दिया।
अचानक एक दिन फिर राजा शिकार खेलने के लिए जंगल में गया तो उसने देखा वही लकड़हारा पहले की तरह फिर लकड़ियाँ काट रहा है। राजा ने उसके पास जाकर पूछा, ‘ऐ लकड़हारे! तू अपनी आदत से मजबूर है। तू अभी भी अपना यह धंधा नहीं छोड़ता?’ इस पर लकड़हारे ने विनती सहित उत्तर दिया, ‘बादशाह सलामत! आप राजा लोग हैं। आपको किस चीज़ की परवाह है। हम तो मजदूर लोग हैं, मेहनत-मजदूरी नहीं करेंगे तो क्या खाएंगे।
आपने मुझे ऐसा कौन-सा खजाना, इतना-कितना धन दे दिया था, जो कभी खत्म ही न होता?’ राजा ने आश्चर्य से पूछा, ‘वो चन्दन का बाग, जिसमें चन्दन के हज़ारों वृक्ष थे, वो कहाँ है?’ ‘वो तो कभी का खत्म हो गया है।’ इसके साथ ही उसने अपने जीवन की वास्तविकता जो थी, वो सारी की सारी सुना दी।
राजा को उसकी मूर्खता पर गुस्सा भी बहुत आया और हैरानी भी हुई। राजा ने सोचा कि इसे चन्दन की बहुमूल्यता व महत्ता का पता नहीं है, इसलिए इसे चन्दन की कीमत का पता बताना चाहिए। राजा कहने लगा, ‘तेरे पास उस बाग की लकड़ी का कोई टुकड़ा बचा है?’ लकड़हारे ने जवाब दिया, ‘और तो कुछ नहीं बचा केवल कुल्हाड़ी में जो हत्थ्सस है, यह उसी लकड़ी का है।’ ‘अच्छा! यह लकड़ी का टुकड़ा ले जा और बाज़ार में इसकी कीमत पूछ कर आ।
’ चन्दन की लकड़ी के उस छोटे से टुकड़े की बाजार कीमत सुनकर वह लकड़हारा सिर पकड़ कर रोने लगा। वो जोर-जोर से आहें मार-मारकर रोने बैठ गया कि हाय! मैंने तो इतना बहुमूल्य सारे का सारा बाग कोयले बना-बनाकर बेच डाला है। लेकिन अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत।
इसी तरह, हे इन्सान! तेरा यह मनुष्य शरीर भी चन्दन का बाग है और इसमें जो स्वांस चल रहे हैं ये चन्दन के वृक्ष हैं। महापुरुषों ने एक स्वांस की कीमत की तुलना हीरे, लाल, जवाहरात और त्रिलोकी की कीमत से की है। बल्कि इससे भी बढ़कर बहुत ही कीमती बताई है। इसी तरह इन्सान भी अपने इन स्वासों को चन्दन के पौधों की तरह विषय-विकारों रूपी अग्नि में कोयले बना-बनाकर खत्म किए जा रहा है।
इस तरह जब यह इन्सान अपने सारे के सारे स्वांस खत्म कर लेगा तो उस लकड़हारे की तरह यह भी बिल्कुल कंगाल बन जाएगा। इसलिए अगर इन्सान सच्चे संतों, रूहानी-फकीरों के सत्संग में आए तो स्वासों की अपनी कीमती पूंजी को मालिक-प्रभु के सुमिरन में लगाकर इनसे बहुत ही उत्तम लाभ ले सकता है। यानि अपने जन्म-मरण की फाही खत्म कर सकता है। -डेस्क

































































