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Story मात मनै मरवाइये ना थारी शान देखणा चाहू सूं…

‘मात मनै मरवाइये ना थारी शान देखणा चाहू सूं…
गर्भ तै बाहर लिकड़ कै हिंदुस्तान देखणा चाहू सूं…।’

हरियाणवी फिल्म आठवां वचन के इस गीत में गर्भ में पल रही बच्ची अपनी मां से यही पुकार कर रही है कि उसे जन्म लेना है। यह धरती देखनी है। उसे मरवाया ना जाए। एक गीत के माध्यम से यह भावुक पंक्तियाँ हर किसी को भावुक कर देती हैं। यही भावुकता हर व्यक्ति के मन में होगी तो ना बेटियों का कोख में कत्ल होगा और ना ही समाज में बेटियों का सम्मान घटेगा। हम 21वीं सदी में जी रहे हैं, ऐसे में हमें इस भेद से ऊपर उठकर बेटे-बेटियों को शत-प्रतिशत बराबरी का दर्ज़ा देना होगा।

20 सितंबर 1994 को भ्रूण के लिंग निर्धारण के लिए प्रसव पूर्व निदान तकनीकों का उपयोग करके कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के उद्देश्य से पीसी-पीएनडीटी अधिनियम लागू किया गया था। इसका उद्देश्य कन्या भ्रूण हत्या पर रोक लगाना है। इसमें कोई दोराय नहीं कि सरकार और निजी स्तर पर कन्या भ्रूण हत्या रोकने के लिए हमेशा भरसक प्रयास होते रहे हैं। हरियाणा स्वास्थ्य विभाग की टीमें तो दूसरे राज्यों में जाकर भी कन्या भ्रूण हत्या के उद्देश्य से अवैध रूप से संचालित अस्पतालों, अल्ट्रासाउंट यूनिट्स का पदार्फाश करती है। इसके बावजूद कुछ गिरोह बेटियों को कोख में मरवाने के जघन्य अपराध में सक्रिय रहते हैं।

लिंगानुपात को लेकर कई संस्थाएं काम कर रही हैं। गुरुग्राम, दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में काम करने वाली संस्था स्माइल फाउंडेशन यहाँ कन्या भ्रूण हत्या, बाल विवाह जैसी प्रथाओं के खिलाफ जागरुकता अभियान चलाती है। सहेली नेटवर्क संस्था जिला प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग के माध्यम से जिले में बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान को आगे बढ़ाकर ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में महिलाओं के प्रति सम्मान व जागरुकता को बढ़ावा देने का काम करती है।

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हरियाणा का स्वास्थ्य विभाग पीएनडीटी एक्ट पर सख्ती से काम कर रहा है और हमेशा मुस्तैद रहता है। प्रदेश में स्वास्थ्य विभाग की ओर से 1200 से अधिक केस दर्ज कराए जा चुके हैं। इसमें अब बात आती है आम जनता की। उन्हें अपनी मानसिकता में बदलाव लाना होगा। अकेले सरकार के प्रयासों से कुछ नहीं होगा, हम सबको इस बुराई की समाप्ति में साथ आना होगा। वैसे तो हरियाणा में पिछले कुछ वर्षों में लिंगानुपात की स्थिति काफी बेहतर रही है, लेकिन इस साल यानि 2026 की शुरूआत के चार महीनों में आंकड़े चिंताजनक रहे।

इस साल में शुरू के चार महीनों में 22 जिलों में से 14 जिलों में लिंगानुपात के आंकड़े 900 से नीचे रहे। चरखी दादरी जिला में सबसे कम लिंगानुपात दर्ज किया गया। वहां पर 1000 लडकों के मुकाबले 768 लड़कियां पाई गई। इस जिला में 1691 बच्चों का जन्म हुआ, जिनमें से 957 लड़के व 734 लड़कियां थीं। प्रदेश की बात करें तो जनवरी 2026 से अप्रैल 2026 तक जन्म के समय लिंग अनुपात 105 रहा। यानी 1,000 लडकों पर 895 लड़कियों का ही जन्म हुआ।
-संजय कुमार मेहरा

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