Literary Story

Literary Story:Sसाहित्य कहानी: अपना आकाश

लखनऊ के गोमतीनगर इलाके की एक आलीशान कोठी के ड्राइंगरूम में दोपहर की धूप खिड़की की जाली से छनकर सोफे पर बनी डिजाइन पर आकृतियां बना रही थी। लेकिन कुंदन के लिए यह दोपहर आराम करने की नहीं, बल्कि एक अदृश्य तनाव की थी। ऐसा लग रहा था, दीवार पर लटकी घड़ी की टिकटिक की आवाज़ जैसे उसके दिल की धड़कनों से होड़ लगा रही थी।

सामने की आराम कुर्सी पर अविनाश राय बैठे थे। हाथ में अखबार था, लेकिन नज़र कहीं शून्य में थी। सेवानिवृत्ति, यह शब्द कुंदन के जीवन में एक बड़े भूकंप की तरह आया था। अविनाश राय जिला पंचायत कार्यालय में क्लास वन अधिकारी थे। जब तक नौकरी चल रही थी, तब तक सुबह नौ बजे से रात के आठ बजे तक कुंदन का घर पर एकछत्र शासन था लेकिन पिछले आठ महीनों से तस्वीर बदल गई थी। कार्यालय की फाइलों का निपटारा करने वाले अविनाश राय अब घर की सब्जियों के हिसाब और दूध की थैलियों में फैट के प्रतिशत में रुचि लेने लगे थे।

‘कुंदन…’ अविनाश राय की भारी आवाज गूंजी। कुंदन रसोई में आटा गूंध रही थी, वहीं से हाथ पोंछते हुए बाहर आई, ‘हां, बोलिए।’‘यह पंखा पांच नंबर पर क्यों है? अभी तो मौसम में ठंडक है। तीन पर भी चल सकता है। पिछले दो महीनों का बिजली का बिल देखा है?’ कुंदन ने गहरी सांस ली और पंखे का रेगुलेटर घुमा दिया। यह रोज का काम था। कभी सब्जी में नमक ज्यादा होने की शिकायत, तो कभी धोबी ने कपड़ों पर ठीक से इस्त्री नहीं की, इसकी पंचायत।

कुंदन को लगता था कि क्या यह वही पुरुष है, जिसके साथ उसने पैंतीस साल बिताए हैं? या फिर कुर्सी से उतर जाने के बाद के इस आदमी को भीतर का खालीपन कचोट रहा है? वह वापस रसोई में चली गई। उस दिन रविवार था। थोड़ी ही देर में उनकी बेटी कृतिका आने वाली थी। कृतिका दिल्ली में पत्रकार थी। उसके आने की खबर मात्र से कुंदन के चेहरे पर थोड़ी रौनक आ जाती थी। कृतिका यानी कुंदन की दबी हुई इच्छाओं का मुक्त आकाश।

दोपहर में भोजन करते समय डाइनिंग टेबल पर अविनाश राय ने थाली में रखी रोटी की ओर देखकर कहा, ‘आज रोटी थोड़ी मोटी नहीं लग रही? या फिर कृतिका आ रही है, इसलिए जल्दबाजी में बना दी?’ कुंदन परोसते-परोसते रुक गई। उससे रहा नहीं गया। वह बोली, ‘रोज तो यही रोटी आपको ठीक लगती है, आज कृतिका आने वाली है, इसलिए आपको सब कुछ अलग लग रहा है। आपका मिजाज़ आॅफिस के साहब जैसा है लेकिन अब यहाँ कोई चपरासी नहीं है, मैं हूं।’
अविनाश राय चौंक गए।

कुंदन सामान्यत: उनके सामने जवाब नहीं देती थी। उन्होंने कुंदन को तीखी नज़र से देखा, लेकिन कुंदन नज़र मिलाए बिना रसोई में चली गई। तभी डोरबेल बजी। कुंदन ने चेहरे पर मुस्कान ठीक की और दरवाजा खोला। कृतिका खड़ी थी। दरवाजा खुलते ही कृतिका उससे लिपट गई। उस स्पर्श में एक ऐसी गर्माहट थी, जो कुंदन को पिछले काफी समय से नहीं मिली थी। खाने के बाद सभी हॉल में बैठे थे।

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अविनाश राय कृतिका से राजनीति और देश की स्थिति के बारे में पूछ रहे थे, जैसे इंटरव्यू ले रहे हों। कृतिका ने बीच में ही बात काट दी और कुंदन की ओर मुड़ी, ‘मम्मी, तुम्हें याद है वह जो आपने छोटी-सी कहानी लिखी थी? ‘ओस की बूंद’, उस कॉलेज मैगजीन के लिए?’ कुंदन हंसी, ‘अरे पागल, वह तो एक जमाना बीत गया। अब कहाँ याद दिला रही है?’ ‘नहीं, मुझे याद दिलाना है। मैंने वह कहानी अपने एक संपादक मित्र को पढ़ाई थी। वे लोग एक नई सीरीज शुरू कर रहे है, ‘गृहिणियों की कलम से’ और उन्हें तुम्हारी लेखन शैली बहुत पसंद आई है। अगले सप्ताह दिल्ली में एक वर्कशॉप है, जिसमें जाने-माने साहित्यकार आने वाले हैं। मैंने तुम्हारा नाम रजिस्टर करवा दिया है।’

ड्राइंगरूम में सन्नाटा छा गया। अविनाश राय ने चश्मा नाक से थोड़ा नीचे किया। फिर बोले, ‘वर्कशॉप? दिल्ली? इस उम्र में?’ अविनाश राय की आवाज़ व्यंग्यात्मक थी। कृतिका ने पिता की ओर देखकर कहा, ‘पापा, आप रिटायर हुए हैं, मम्मी नहीं। वास्तव में मम्मी ने कभी छुट्टी ली ही नहीं। रविवार को भी नहीं और त्योहारों में भी नहीं। आपने पूरी जिंदगी आॅफिस में फाइलें संभालीं, मम्मी ने घर संभाला। अब जब आपके पास समय है तो आप घर क्यों नहीं संभाल सकते? दो दिन की तो बात है।’

‘यह सब बोलने में अच्छा लगता है कृतिका।’ अविनाश राय ने हाथ झटक दिया, ‘व्यवहार में यह सब नहीं चलता और वैसे भी कुंदन को अब इन सबमें रुचि नहीं होगी। क्यों कुंदन?’ उन्होंने कुंदन से समर्थन की उम्मीद की थी। सालों से कुंदन उनकी ‘हां’ में ‘हां’ मिलाती आई थी। लेकिन आज कुंदन का मन कुछ अलग ही सोच रहा था। उसे याद आया। शादी से पहले तो वह हाथ में किताबें लेकर घूमती थी, कविताओं के कार्यक्रमों में आगे की पंक्ति में बैठती थी।

शादी के बाद अविनाश का कैरियर, बच्चों की परवरिश, सामाजिक कार्यक्रम, इन सब में वह रसोई के मसालों के डिब्बों के पीछे खो गई थी। ‘मुझे जाना है।’ एक धीमी, लेकिन स्पष्ट आवाज़ आई। अविनाश राय और कृतिका दोनों चौंक गए। ‘मुझे दिल्ली जाना है।’ कुंदन ने नज़र उठाकर पति की आँखों में देखा। उन आँखों में अब डर नहीं था, बल्कि एक दृढ़ निर्णय था। उसने कहा, ‘आपने सही कहा, इस उम्र में लेखिका बनने का शौंक नहीं है, लेकिन इस उम्र में मुझे खुद से मिलने का शौंक जाग गया है। सालों से मैं आपके और घर की छाया में जी रही हूँ।

मुझे लगता था कि आपकी सेवानिवृत्ति के बाद हम साथ मिलकर जीवन बिताएंगे। लेकिन आपकी सेवानिवृत्ति तो मेरे लिए एक नई कैद बन गई है। सुबह से शाम तक आपके निर्देश, आपकी रोकटोक, मैं सांस लेती हूँ। लेकिन जीती नहीं हूँ।’ अविनाश राय स्तब्ध रह गए। कुंदन इतना लंबा और इतना स्पष्ट बोल सकती है, यह उनकी कल्पना से बाहर था। वातावरण में एक भारी शांति छा गई। कृतिका की आँखों में माँ के लिए गर्व था। उसने धीरे से मम्मी का हाथ दबाया।

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रात में अविनाश राय सो नहीं सके। करवट बदलते समय उन्हें कुंदन के शब्द सुनाई दे रहे थे, ‘आपकी सेवानिवृत्ति मेरे लिए कैद बन गई है।’ क्या सचमुच वह इतनी ज्यादा दखलंदाजी करने लगे थे? अपनी सत्ता चली गई थी, इसलिए क्या वह घर पर सत्ता जमा रहे थे? बगल में कुंदन शांतिपूर्वक सो रही थी। उसके चेहरे पर एक सुकून था, जो शायद निर्णय लेने के बाद मिलने वाले संतोष का था।

अगले दिन सुबह कुंदन जल्दी उठी। तैयारी की। अलमारी से अपनी पसंदीदा कॉटन की साड़ी निकाली। बाल संवारे, जूड़ा बनाया और उसमें एक गुलाब लगा लिया। आईने में देखा तो उसे लगा कि यह प्रतिबिंब किसी गृहिणी का नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र व्यक्तित्व का है। हॉल में अविनाशराय बैठे थे। कुंदन बैग लेकर बाहर आई। उसने कहा, ‘मैं निकल रही हूँ।

कृतिका मुझे स्टेशन छोड़ने आ रही है।’ अविनाश राय खड़े हुए। रसोई में गए, एक डिब्बा लेकर आए और कुंदन की ओर बढ़ाकर कहा, ‘ये पूड़ी और सूखी सब्जी। सुबह जल्दी उठकर मैंने बना लिए थे। बाहर का खाओगी तो पित्त हो जाएगा।’
कुंदन क्षणभर के लिए ठिठक गई। अविनाश राय के हाथ में डिब्बा काँप रहा था।

उनकी आंखों में पश्चाताप और स्वीकार, दोनों थे। ‘और सुनो,’ अविनाश राय ने गला साफ किया, ‘तुम्हारी कहानी वह ‘ओस की बूंद’ मैंने भी पढ़ी थी। चोरी-छिपे। अच्छी थी। वहाँ जाकर दूसरी लिखना। मैं…मैं… यहाँ सब संभाल लूंगा।’ कुंदन की आँखें नम हो गई, ये आँसू दु:ख के नहीं थे। दहलीज पार करने से पहले उसने पीछे मुड़कर देखा। यह घर अब उसे कैदखाना नहीं, बल्कि घर लग रहा था। कार में बैठने के बाद कृतिका ने पूछा, ‘मम्मी, पापा बदल गए न?’ कुंदन हंसी। इस बार हंसी में खिलखिलाहट थी। उसने कहा, ‘इंसान नहीं बदलते कृतिका, सिर्फ दृष्टिकोण बदलता है। मैंने अपनी रेखा लंबी कर दी, इसलिए उनकी रेखा अपने आप छोटी हो गई।

लेकिन कोई बात नहीं। अब हम समानांतर चल सकेंगे।’ दिल्ली पहुँचकर जब कुंदन स्टेज पर चढ़ी तो उसे लगा कि वह केवल स्टेज पर नहीं चढ़ी, बल्कि जिंदगी की एक नई सीढ़ी पर चढ़ी है। माइक के सामने खड़ी होकर जब उसने अपना परिचय दिया, तो उसने ‘श्रीमती अविनाश राय’ कहने के बजाय कहा, ‘मैं कुंदन, एक ऐसी लेखिका और एक ऐसी स्त्री, जो अभी-अभी अपना आकाश नाप कर आई है।’

तालियों की बढ़ती गड़गड़ाहट के बीच कुंदन को समझ आया कि दहलीज के भीतर और बाहर की दुनिया के बीच बहुत बड़ा अंतर नहीं होता। अंतर केवल उस दहलीज को पार करने की हिम्मत में होता है। शाम ढल चुकी थी। लेकिन कुंदन के मन में आज दोपहर का सूरज तप रहा था, जो कभी अस्त होने वाला नहीं था। -वीरेंद्र बहादुर सिंह

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