Happy Dussehra

Happy Dussehra: अहिंसा की जीत है दशहरा

रावण को बुराई का प्रतीक माना गया है। इसी के संदर्भ में दशहरा मनाया जाता है और इस दिन रावण, मेघनाथ व कुंभकरण के विशालकाय पुतले जलाए जाते हैं। इन पुतलों को जलाए जाने से अभिप्राय है कि बुराई का नाश हो गया है। श्रीराम चंद्र जी ने रावण रूपी बुराई को खत्म करके लोगों को सत्य व अहिंसा की राह दिखाई।

उन्होंने रावण राज को खत्म करके एक सौहार्द, प्रेम, त्याग व अहिंसा युक्त ऐसे राज की स्थापना की जो सबके लिए कल्याणकारी हो, मंगलकारी हो। श्री राम जी का लंका पर विजय पाने का मनोरथ केवल इतना ही था कि समाज से राक्षस प्रवृत्ति को खत्म किया जाए।

रावण को खत्म करके उन्होंने लंका पर अपना अधिकार नहीं जमाया और न ही कोई अपना शासन कायम किया बल्कि एक योग्य व सदाचारी प्रवृति वाले व्यक्ति के हाथों में लंका की बागडोर सौंप दी। अपने राम राज्य के समान लंका में विभीषण को राजा नियुक्त किया ताकि लंका में भी दैवीय गुणों का प्रसार हो। उन्होंने अपने दैवीय गुणों के साथ अहिंसा का मार्ग प्रशस्त किया। वर्षों से पीड़ित लोगों को सुख का राह मिला।

राक्षसों की पीड़ा से जनमानस को छुटकारा मिल गया क्योंकि राक्षसों के अत्याचार इतने बढ़ चुके थे कि वे राम का नाम लेने वाले तपस्वियों, साधु-सन्यासियों को सताने लगे थे। उनके यज्ञ, हवन आदि जो भी वो तपस्या करते थे उसको भंग कर दिया करते और उनको मार देते ताकि कोई भक्ति व सत्य के मार्ग पर न चले। जब उन राक्षसों के अत्याचार इस कदर तक बढ़ गए तो भगवान ने अपने तौर-तरीकों से उस राक्षस राज से लोगों को निजात दिलाई। राक्षस राज का खात्मा होना साधुजनों के लिए हर्ष की बात थी। इसी खुशी में दशहरा मनाया जाता है।

यह एक आध्यात्मिक चिंतन का विषय है लेकिन आज के दौर में जिस प्रकार दशहरा मनाया जाता है उसमें आध्यात्मिक चिंतन तो शून्य हो चुका है। दशहरा सिर्फ आतिशबाजी व धू-धू कर जलते पुतलों का तमाशा बनकर रह गया है। जबकि आज की अहम जरूरत यह है कि श्री राम जी ने रावण को मारने के लिए इतना संघर्ष क्यों किया, इन तथ्यों को जेहन में उतारा जाए। इसका जो आध्यात्मिक पहलू है उस पर चिंतन-मनन किया जाए क्योंकि दशहरा जीवन का पाठ है।

जीने का एक सबक है। पूरी रामायण बहुत बड़ा महाकाव्य है जिसका हर प्रसंग जीवन के सही अर्थ को समझाने में उपयोगी है। इससे जीने की कला आती है। दशहरे का दिन जीवन से जुड़े पहलुओं पर विचार करने योग्य है। मौत किसी की भी हो, एक पाठ पढ़ा कर जाती है फिर रावण की मौत का सबक कोई छोटा-मोटा नहीं हो सकता। जब रावण का मृत शरीर युद्ध भूमि में पड़ा था, उसकी धर्मपत्नी मंदोदरी को जैसे ही उसकी मौत की सूचना मिली तो वो दौड़ी-दौड़ी आई और उसके वक्षस्थल पर अपना सिर पटक-पटक कर विलाप करने लगी।Happy Dussehra

वो अपने मृत पति को संबोधित करते हुए कहने लगी, हे नाथ! ये क्या हो गया। इतने बड़े विद्वान, वेदों के ज्ञाता, जिसका तीनों लोकों में नाम गूंजता था, चांद-सूरज जिसके इशारे पर चलते थे, आज वो कहां है? हे स्वामी! ऐसा क्यूं हुआ? जिसकी भुजाओं में कैलाश पर्वत को उठाने का बल था, जिसके सामने इंद्र देवता तक की हिम्मत न थी, जिसने मौत को भी अपने काबू में कर रखा था। आज ये क्या हालत हो गई है?

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मंदोदरी अपनी पीड़ा के साथ-साथ उस सच्चाई को भी बयां कर रही थी जो उसने पहले भी कही थी। वो कहने लगी- हे नाथ! मैंने आपको बड़ा समझाया था कि सीता जी को सम्मान के साथ वापिस लौटा दो। श्री राम जी कोई साधारण वनवासी नहीं हैं। वो विष्णु के अवतार हैं। उनसे युद्ध आपके हित में नहीं है। लेकिन आपने अपने अहंकार के अधीन होकर मेरी एक ना सुनी। आज कहाँ है वो लंकेश्वर। कहाँ है वो दशानन जिसके चलने से ही धरती हिल उठती थी।

यह एक विनाशक दृश्य था। रावण की मौत का दृश्य विभीषण को भी पीड़ा देने वाला था। बेशक वो सच के साथ था लेकिन मौत का दृश्य क्रंदन देने वाला था। मंदोदरी के शब्द हृदय-विदारक थे। उसके शब्द जीवन की गहराइयों को कुरेद रहे थे। वहाँ खड़े स्वयं श्री राम जी भी शोकमयी स्थिति में थे। उन्होंने मंदोदरी को ढाँढस बंधाया और कहा कि मेरी रावण से कोई जाति दुश्मनी नहीं थी और न इन्हें मारने का मेरा कोई प्रयोजन था। व्यक्ति का अहं ही उसे मिटा डालता है।

वाकई मौत का दृश्य दिखा रहा था कि वो रावण जिसके बराबर कोई विद्वान नहीं था। वेद-उपनिषदों में वह उच्च कोटि का पंडित था। वह शिव का अनन्य भक्त था। शास्त्र विद्या का अति ज्ञानी था, खगोलविद्या में माहिर था। ज्योतिशास्त्र में उसके जैसा न था कोई। इन सब गुणों पर उसका अहंकार भारी पड़ गया। क्रोध की अग्नि ने उसे जला डाला। काम का विचार उसे अपने अंत की ओर खींच कर ले गया। इतना बड़ा विद्वान अपने इन्हीं दर्गुणों की भेंट चढ़ गया और अपनी पूरी कुल के खात्मे का कारण भी खुद रावण ही बना।

मंदोदरी और विभीषण को ढाँढस बंधाते हुए जैसे श्रीराम जी ने कहा कि रावण के साथ मेरी कोई जातिगत दुश्मनी नहीं थी। उनके शब्दों की सच्चाई भी यही है। इसका प्रमाणिक साक्ष्य भी इसी प्रसंग में मौजूद है। जब रावण अपनी मृत्यु के आखिरी सांस गिन रहा था। श्रीराम जी ने अपने अनुज लक्ष्मण से कहा कि जाओ लक्ष्मण, रावण बहुत बड़े विद्वान है और कोई शिक्षा ग्रहण कर लो। उनके कहने पर लक्ष्मण जब रावण के पास गया और कोई सीख देने की प्रार्थना की तब रावण ने उसे कहा कि आज का काम कभी कल पर मत छोड़ो।

यह रावण की ओर से दिया गया बड़ा सबक है। किदवंती के अनुसार रावण धरती से स्वर्ग तक एक मार्ग बनाने वाला था लेकिन कल, कल करता वह उसे पूरा ना कर सका और इतने में मौत की ओर जा बैठा। श्री राम जी ने उसके आखिर के पलों में भी वो सीख लोगों के लिए उदाहरण सहित प्रस्तुत कर दी जो जीवन के लिए बड़े काम की सीख है। यही नहीं, श्रीराम जी ने उसका अंतिम संस्कार भी पूरे विधि-विधान के तहत सम्पूर्ण करवाया।

विभीषण का राज तिलक किया गया और उसको लंका का राजा बनाया गया। विभीषण जो लंका का राज-पाट संभालने में अपनी असमर्थता जाहिर कर चुका था उसे श्रीराम जी ने ज्ञान के बल पर योग्य बनाया। वहीं श्रीराम जी मंदोदरी के प्राणों की रक्षा करके उसके भी जीवन रक्षक बनकर सामने आए क्योंकि उस युग में पति की मौत होने पर सती होना ही पत्नी का धर्म माना जाता था। मंदोदरी भी अपने पति की चिता पर सती होने का संकल्प कर चुकी थी।

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जैसे ही श्रीराम जी को इस बारे सूचना मिली तो उन्होंने अपने उपदेश से उसको ऐसा करने से रोका। उन्होंने अपने उपदेश में कहा कि इस प्रकार अपने आप को खत्म कर देना स्त्री धर्म नहीं है। आप लंका की भलाई के लिए अपने इस संकल्प को त्याग दें। पूरी जीवटता के साथ लंका को नए रूप में गढ़ने का सहयोग दें। लंका में जो विलाप व क्रंदन मचा हुआ है उसे शांत करें। प्रजा जिस शोकाकुल स्थिति में है, जनमानस में जो शंकाए हैं, उनको अपना मार्गदर्शन देकर उनका जीवन संवारें। एक नारी का यह सच्चा राज धर्म है।

मंदोदरी के मन पर श्रीराम जी के इन बहुमूल्य उपदेशों का जादुई असर हुआ। उसको जैसे जीवन का सही मार्ग मिल गया। उसमें अदम्य साहस जाग उठा और उसने सती होने का निर्णय बदल लिया। वह मार्गदर्शक बन कर लंका को नया बनाने के लिए उठ खड़ी हुई। श्रीराम जी के उपदेशों को उसने अपने जीवन का आधार बना लिया। और अंत में विभीषण के लिए यह राजतिलक किसी चुनौती से कम न था। वह स्वयं भी कई प्रकार की शंकाओं से घिरा हुआ था क्योंकि उसे भय था कि लंका के लोग मुझे स्वीकार करेंगे या नहीं।

फिर श्रीराम जी ने उसको पूरा हौसला दिया और एक कुशल शासक के रूप में राजा बनने का उपदेश देकर लंका के सिंहासन पर विराजमान किया। लेकिन विभीषण की शंका भी कुछ सही साबित हुई। जैसे ही विभीषण लंका में गया तो लोगों ने भला-बुरा कहकर उसका विरोध करना शुरु कर दिया। लोग उसे भाई को मारने वाला कहने लगे। लंका की विधवाओं का उसे घोर विरोध सहना पड़ा। औरतें उसके खिलाफ डटकर खड़ी हो गई।

फिर विभीषण को इन हालातों से निकालने में मंदोदरी सामने आई। मंदोदरी को श्रीराम जी ने पहले ही सब कुछ बता दिया था कि विभीषण के मार्गदर्शक बनकर लंका में सब कुछ सामान्य करना है। दरबार के बाहर एक भीड़ जो विभीषण को कलंकित कहकर विरोध पे उतारू थी, मंदोदरी ने उनको समझाया। अपने संबोधन में उसने लोगों से कहा कि लंका में जो भी कुछ हुआ उसका दोषी विभीषण नहीं है, अब वो लंका के राजा हैं।

वे धर्म के मार्ग पर रहे हैं और हमने लंका के सुनहरे भविष्य के लिए अपने राजा का सहयोग करना है। मंदोदरी की इन बातों का लोगों पर पूरा असर हुआ और विरोध के जो सुर थे सब शांत हो गए। अब लंका में एक धर्मपरायण राजा आसीन था जो श्रीराम जी की आज्ञा से अपना राज-काज चला रहा था। अपने अतीत से निकलकर लंका फिर नव-निर्माण की ओर बढ़ने लगी। लेकिन अतीत से निकलना इतना आसान भी नहीं था।

युगों पुराना उसका अतीत आज भी उसका पीछा छोड़ने वाला नहीं है। आज भी उसी प्रकार लंका को जलाया जाता है, उजाड़ा जाता है। आज भी रावण, कुंभकरण, मेघनाथ को फूंका जाता है। इनके पुतलों को धधकता देख लोग खुशियां मनाते हैं कि हमने रावण को मार दिया है, जला दिया क्योंकि वो बुरा था, बुराई का प्रतीक था।

दशहरे के इस मेले को मनाने में बड़ा जोर लगा देते हैं लोग। लेकिन गौर करना कि कितने लोग होंगे जो सच में अपने भीतर रावण वाली बुराइयों को मार चुके हैं। बुराइयों की ओर जाने वाले लोग इस दिन अपनी बुराइयों को छोड़कर अच्छाई को अपनाने का प्रण करें और श्री राम जी को अपना आदर्श मानें।

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