Glacier: अचानक क्यों टूट रहे हैं ग्लेशियर
ज्यों ही रात का अंधेरा छंटा तो सूरज की किरणों से उजाला अभी चारों ओर फैला ही था, प्रकृति के नाना कलरव के बीच एकाएक ऐसी हलचल सुनाई दी जो भयावह प्रतीत हुई। शुरूआत में इतनी तीव्रता से कंपन हुई कि मानो कोई भूकंप आने की आहट हो। थोड़ी देर बाद आभाष का यह डर सच साबित हुआ। हिमालय के एक बड़े ग्लेशियर और चट्टानों के टूटने की खबर आई।
नेपाल-तिब्बत सीमा के पास लैंगटांग क्षेत्र में अत्यधिक ऊंचाई पर ग्लेशियर का एक विशाल हिस्सा टूटकर घाटी में जा गिरा। इस भयानक एवलांच (हिमस्खलन) से पानी, बर्फ, चट्टान और भारी मात्रा में गाद का एक सैलाब बन गया, जो सुनामी की तरह भोटेकोशी, लेंडे खोला और त्रिशूली नदियों में तेजी से नीचे की ओर बह निकला। चीन-नेपाल सीमा के पास उपकरणों की हलचल और भूकंप जैसी रीडिंग मिलने के बाद, नेपाल के बाढ़ प्रबंधन अधिकारियों को सुबह करीब 9 बजे इस स्थिति का पता चला।
अधिकारियों ने जब तक इमरजेंसी एसएमएस अलर्ट भेजा, तब तक पानी और मलबे का सैलाब निचले इलाकों में भारी तबाही मचा चुका था। 26 अगस्त 2026 को तिब्बत सीमा के पास आए भीषण सैलाब के चलते भोटेकोशी और त्रिशूली नदी में उठे उफान से नुवाकोट, रसुवा और चितवन जैसे कई जिले बुरी तरह प्रभावित हुए। कई पुल और रास्ते बह जाने के कारण लोग अपने घरों में कैद हो गए तथा हजारों लोगों की जानें चली गई। यह त्रासदी मात्र एक घटना नहीं है, अपितु भविष्य के बड़े खतरे का संकेत है।
करीब 13 साल पहले भी उत्तराखंड के केदारनाथ में ऐसी भयावह तबाही देखने को मिली थी। 16-17 जून 2013 की रात को भारी बारिश व बादल फटने से जलप्रलय आई थी जिससे चोराबाड़ी झील का तटबंध टूट गया। झील का पानी अपने साथ भारी मात्रा में मलबा, बड़े-बड़े पत्थर और कीचड़ लेकर सीधे केदारनाथ पुरी और मंदाकिनी नदी घाटी की तरफ बह निकला था। इस आपदा में रामबाड़ा जैसे पूरा बाजार और कई गाँव बह गए थे तथा हज़ारों लोगों की जानें चली गई थी।
वैश्विक तापमान वृद्धि के कारण, दुनिया के हिमनद पिछले दो दशकों की तुलना में दोगुनी गति से पिघल रहे हैं। 2000 से 2019 के बीच, हिमनदों ने प्रति वर्ष 267 गीगाटन बर्फ खो दी, जो लगभग गीजा के 46,500 महान पिरामिडों के द्रव्यमान के बराबर है। बढ़ती वैश्विक तापमान वृद्धि में, यह अनुमान लगाया गया है कि 2100 तक लगभग 50 प्रतिशत हिमनद (ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका को छोड़कर) खो देंगे, भले ही वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित कर दिया जाए। जैसे-जैसे हिमनद पीछे हटना शुरू करता है, उसकी बर्फ धीरे-धीरे पिघलती है और नदी बेसिन में बहने वाले पानी की मात्रा बढ़ जाती है।
पिघले हुए पानी की मात्रा बढ़ने से निचले इलाकों में बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है।माना जाता है कि वैश्विक तापमान में वृद्धि के कारण ग्लेशियर दोगुनी गति से पिघल रहे हैं। साइंस एडवांसेज 2019 में छपी एक स्टडी के मुताबिक, 2000 के बाद बर्फ पिघलने की रफ्तार दोगुनी हुई है। 175 वर्षों के रिकॉर्ड में वर्ष 2024 सबसे गर्म वर्ष था, जिसमें वैश्विक औसत सतही तापमान 1850-1900 के औसत से 1.55 डिग्री सेल्सियस अधिक आंका गया था। कोपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस के एक वैज्ञानिक डेटासेट के अनुसार आगामी पांच वर्षों में कम से कम एक वर्ष के लिए वार्षिक औसत वैश्विक तापमान के पूर्व-औद्योगिक स्तरों से 1.5 डिग्री सेल्सियस अधिक होने की संभावना काफी बढ़ गई है। यूएनएफसीसीसी का दावा है कि तापमान में हर एक डिग्री का अंश भी मायने रखता है।
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रेड जोन में देश की 189 ग्लेशियर झीलें
इसरो और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के आंकड़े बताते हैं कि भारतीय हिमालयी क्षेत्र में 7,500 से अधिक ग्लेशियर झीलें हैं। इनमें से 189 रेड जोन में हैं और किसी भी वक्त टूटकर तबाही ला सकती हैं। अध्ययन में पता चला कि सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी बेसिन की चोटियों पर छोटी-बड़ी हज़ारों झीलें हैं। लद्दाख में ही 3,219 झीलों की पहचान की गई है। 2,431 ग्लेशियर झीलें ऐसी हैं, जो 10 हेक्टेयर से बड़ी हैं। सबसे ज्यादा चिंता का विषय वह 189 झीलें हैं, जिन्हें एनडीएमए ने अत्यधिक जोखिम भरी श्रेणी में रखा है।
13 ग्लेशियर झीलें खतरनाक स्थिति में
उत्तराखंड में 426 ग्लेशियर झीले हैं जिनमें से 13 अति संवेदनशील हैं। नेशनल डिज़ास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी ने उत्तराखंड में चिह्नित 426 बड़ी ग्लेशियर झीलों में से 25 ग्लेशियर झीलें संवेदनशील और इनमें 13 अतिसंवेदनशील हैं। इनमें भिलंगना घाटी में मौजूद मसर ताल बेहद संवेदनशील बताई गई है। वहीं वसुधारा, माबोंग, स्यूनतियांकती व प्यंगरी झीलें भी अति संवेदनशील बताई जा रही हैं। -डेस्क
क्या है अर्ली वॉर्निंग सिस्टम
ग्लेशियर झीलों पर लगाया जाने वाला अर्ली वॉर्निंग सिस्टम झील फटने से आने वाली बाढ़ के खतरे का अलर्ट देता है। इसके लिए झील के आसपास जलस्तर मापने वाले सेंसर, वेदर स्टेशन, कैमरे व अन्य उपकरण लगाए जाते हैं। ये पानी के स्तर में बदलाव, भारी बारिश, भूस्खलन और दूसरी गतिविधियों पर नज़र रखते हैं। इससे मिलने वाला डेटा वायरलेस या सैटेलाइट संचार के जरिए कंट्रोल सेंटर तक पहुंचता है। खतरे के संकेत मिलते ही सिस्टम संबंधित एजेंसियों को अलर्ट भेजता है। इसके बाद सायरन, एसएमएस अलर्ट, वायरलेस और प्रशासन के जरिए लोगों तक चेतावनी पहुंचाई जाती है, ताकि लोगों को समय रहते सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा सके।

































































