Happy Lohri

Happy Lohri पा नी माये पा लोहड़ी, सलामत रहे तेरे पुत दी जोड़ी’

कुछ ऐसे ही दिल की गहराइयों में उतरने वाले लोकगीतों से सजा लोहड़ी का पर्व खुद में कई सांस्कृतिक रंगों को भी समेटे है। आस्था के साथ-साथ संस्कृति का यह अनूठा संगम बड़ा दिलचस्प नज़ारा पेश करता है। पोंगल व मकर संक्रांति (13 जनवरी) के साथ मनाया जाने वाला यह पर्व धरती पर समृद्धि लाने के लिए सर्वशक्तिमान ईश्वर को धन्यवाद देने का संदेश देते हैं। क्योंकि इस मौसम में किसानों के खेत फसलों से लहलहाते दिखाई देते हैं।

जीवन के 80 बसंत देख चुकी सुखदेव कौर के लिए यह लोहड़ी का त्यौहार एक अमिट छाप की तरह है, जिसकी यादों को तरोताजा करते हुए वह बताती है कि मैंने जीवन के बहुत से उतार-चढ़ाव के बीच इस पर्व की हर खुशी को बहुत पास से महसूस किया है। बेशक समय की रफ्तार के मुताबिक इसके रिवाजों में बदलाव आया है, लेकिन इसकी सार्थकता आज भी कायम है। वह बताती हैं कि लोहड़ी वाले दिन ज्यों-ज्यों सूरज अपने शिखर पर पहुंचता तो युवा लोहड़ी मांगने के लिए टोलियों में इकट्ठे हो जाते। सूरज की ढलती लालिमा के साथ ही शुरू हो जाती लोहड़ी बनाने की तैयारी।

घर-घर जाकर माता-बहनों से लोहड़ी के लिए पाथियां (उपले) एकत्रित की जातीं। बड़े गांवों में अपनी पत्ती यानि मोहल्ले के हिसाब से लोहड़ी बनाई जाती। थेपड़ियों का बड़ा सा ढेर बनाकर उसे इस तरीके से सजाया जाता कि वह पूरी रात जलता रहे। उधर घरों में माता-बहनें जल्दी ही अपना रूटीन का कामकाज निपटा लेती थी। ज्यों ही शाम ढलती वे लोहड़ी के लिए निर्धारित जगह पर जुटनी शुरू हो जाती। पूरे हार-शृंगार से सजी लड़कियां माहौल को पूरी तरह खुशनुमा बना देतीं। फिर शुरु होती लोकगीतों की गुनगुनाहट-

पा माये लोहड़ी, तेरा पुत चड़े घोड़ी।
माये नी माये पा पाथी, तेरा पुत चड़े हाथी।।

इस तरह के अनेकों गीत गाकर लोहड़ी मांगी जाती थी। देर रात तक ढोलक के फड़कते ताल, गिद्दों-भंगड़ों की धमक तथा गीतों की आवाज़ गूंजती रहती है। पंजाब की कई जगहों पर परंपरागत वेशभूषा पहनकर महिलाएं व पुरुष नृत्य करते हैं।

आस्था संग संस्कृति का होता है सुमेल

लोहड़ी का पर्व यूं तो देश के कई राज्यों में मनाया जाता है, लेकिन पंजाब में इसके रंग अनूठे हैं। मकर संक्रांति से पहले वाली रात को मनाया जाने वाला यह पर्व पंजाब में बैसाखी जैसा महत्व रखता है। पंजाब में लोग साल की शुरूआत किसानों को उनकी कड़ी मेहनत के लिए उनका शुक्रिया अदा करते हुए करते हैं। यह प्रकृति के प्रति आभार का पर्व भी है, जिसमें जल, अग्नि और सूर्य की पूजा की जाती है। इस दिन का एक विशेष महत्व यह है कि इस दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है, जिसे शुभ माना जाता है। यह एक नई शुरूआत का प्रतीक है। मकर संक्रांति पर आने वाले इस त्योहार में सूर्य भगवान का आभार व्यक्त करने के लिए लोग गुड़ की गजक, मूंगफली और तिल की रेवड़ी अग्नि को अर्पित करते हैं। बाद में इन्हें आपस में बांटा जाता है।

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नवयुगल दंपति और नवजात शिशुओं के नाम होती है विशेष लोहड़ी

परंपरागत रूप से यह माना जाता है कि जिस रात लोहड़ी का त्योहार मनाया जाता है, वह वर्ष की सबसे लंबी रात होती है। सूर्यास्त के बाद खुली जगह में गोबर के उपलों व लकड़ी के साथ आग जलाई जाती है। परिवार के सभी लोग इसके आसपास इकट्ठा होते हैं। यह पवित्र अग्नि नवविवाहित जोड़ों और नवजात शिशुओं के माता-पिता के लिए विशेष रूप से शुभ मानी जाती है। ऐसे नवविवाहित जोड़े और माता-पिता अग्नि की परिक्रमा करते हैं और अग्नि में गुड़ की गजक व तिल की रेवड़ी अर्पित करते हैं। इस दौरान महिलाएं लोकगीत गाती हैं और गिद्दा डालती हैं। पुरुष भी भंगड़ा कर उत्सव मनाते हैं। इसके साथ ही कड़ाके की ठंड का भी अंत होने लगता है।

व्यंजनों का खास महत्व

इस दिन सरसों का साग-मक्की की रोटी, पिन्नियां, तिल के लड्डू, पंजीरी और मखाने की खीर जैसे व्यंजन बनाए जाते हैं। पंजीरी असल में विभिन्न मेवों, बीजों, विभिन्न अनाज के आटे, गुड़, खाने वाली गोंद और घी से मिलकर बनाई जाती है। पंजीरी को उन महिलाओं के लिए भी पोषण का बड़ा स्रोत माना जाता है, जिन्होंने हाल ही में बच्चे को जन्म दिया है।

लोहड़ी से कुछ दिन पहले युवा लड़के-लड़कियां घर-घर, द्वार-द्वार जाकर गीत गाते हैं। इस पर लोग उन्हें लोहड़ी के पाथियां, पैसे व मिठाई देते हैं। उनके गीतों में दुल्ला भट्टी का एक पौराणिक गीत प्रमुखता से शामिल रहता है…

सुंदर मुंदरिये हो!
तेरा कौन विचारा हो!
दुल्ला भट्टी वाला हो!
दुल्ले दी धी ब्याही हो!
सेर शक्कर पाई हो! कुड़ी दा लाल पटाखा हो!
कुड़ी दा सालू पाटा हो!
सालू कौन समेटे!
चाचा गाली देसे!
चाचे चूरी कुट्टी! जमीदारां लुट्टी !
जमींदार सुधाए!
बम बम भोले आए!
एक भोला रह गया!
सिपाही फड़ के लै गया!
सिपाही ने मारी इट्ट!
भांवे रो ते भांवे पिट्ट!
सानू दे दे लोहड़ी,
ते तेरी जीवे जोड़ी!