Editorial: रूहानियत में यही रीत है… सम्पादकीय
रूहानी संतों, पीर-फकीरों के वचन युगों-युग सत्य, युगों-युगांतरों तक अटल रहते हैं। युग तो बेशक पलट जाएं लेकिन महापुरुषों के वचन ज्यों के त्यों पूरे होते ही होते हैं। इस सच्चाई को सभी इतिहासकार, सभी धार्मिक प्रवृति के लोग भली-भांति जानते व समझते हैं। इतिहास के अनुसार एक महान तपस्वी द्वारा किसी समय में अहिल्या को पत्थर बन जाने के लिए दिए गए श्राप के अनुसार उसका इन्सान से पत्थर, चेतन से जड़ होना तथा त्रेता युग में भगवान श्री रामचंद्र जी द्वारा उसका उद्धार होने का वचन सौ प्रतिशत अटल था
और सत्य होकर ही रहा लेकिन उस जीवात्मा द्वारा अपने उद्धार के लिए की गई अनुनय-विनय, यानि रहम की दरख्वास्त कि ‘क्या मैं इतने लंबे समय तक जड़ जूनि में ही रहूंगी!’ तो उन महापुरुषों ने अपने रहमो-करम के दरिया से उसे यह एक बूंद प्रदान करते हुए त्रेतायुग का द्वापर युग से पहले आने का वचन दे दिया कि ‘भगवान श्री रामचंद्र जी का त्रेता युग द्वापर युग से पहले आएगा और वो ही उस जीवात्मा को जड़ जूनि से निकाल कर मुक्ति प्रदान करेंगे’ और सौ प्रतिशत वैसा ही हुआ।
पवित्र रामायण के एक प्रकरण में इस सच्चाई को दुनियाभर के सभी लोगों ने पढ़ा है। अर्थात् संत गुरु पीर-फकीरों के द्वारा यह सदियों पहले के वचन, समय-समय पर जो-जो भी और जैसा भी उन्होंने अपने वचनों में बोला था, सौ प्रतिशत पूरे हुए हैं। रूहानियत की यही रीत है। बात कर रहे हैं डेरा सच्चा सौदा के रूहानी इतिहास की। रूहानी महापुरुषों द्वारा स्थापित रूहानी नियम, उनके द्वारा निश्चित की गई परम्पराएं (आदिकाल से जो चली आ रही है) व उनके द्वारा रूहानियत में बनाए वो सिद्धांत वही रहते हैं वो कभी बदला नहीं करते।
लेकिन तत्कालीन परिस्थितियों के अनुसार उन सिद्धांतों पर चलने के लिए एक विशेष वचनबद्धता की जाती है और ऐसा पिछले युगों, पिछले कालों से हमेशा होता आया है। डेरा सच्चा सौदा के संस्थापक पूजनीय बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज ने मई 1948 को अपने मुर्शिदे कामिल के अटल वचनों के अनुसार डेरा सच्चा सौदा की शुभ स्थापना कर ये वचन किए कि ‘इत्थे लेहंदा झुकेगा, चढ़दा झुकेगा, झुकेगी दुनिया सारी कुल आलम इत्थे झुकेगा और यहाँ पर लाखों-करोड़ों दुनिया के मेले लगेंगे।’ आप जी ने यह भी फरमाया कि नेजिया-सरसा एक हो जाएगा।
ऊपर से थाली फैंके तो नीचे न गिरे, सिरों पर रह जाएगी। हाथी पर चढ़कर दर्शन देंगे, फिर भी मौज के दर्शन मुश्किल से हो पाएंगे और यह भी फरमाया कि यहाँ पर बहुत कुछ बनेगा। यहाँ पर सचखंड का नमूना बनेगा और दुनिया खड़-खड़ के देखेगी। ना कोई दान-दक्षिणा, ना चंदा-चढ़ावा आदि यहाँ कुछ नहीं लिया जाता। अपने-अपने धर्म, घर-परिवार में रहते हुए मालिक का नाम जपें, राम-नाम का सुमिरन, जाप करें, हक-हलाल-मेहनत-दसां नहुआं दी किरत कमाई करके खाएं, अंडा-मांस, शराब आदि नशों से परहेज करें यानि मानवीय गुणों का पालन करें।
पूजनीय सार्इं जी ने ये पवित्र मर्यादाएं सन् 1948 में डेरा सच्चा सौदा स्थापित करते हुए निश्चित की हैं। पूजनीय बेपरवाह सार्इं मस्ताना जी महाराज द्वारा 78 वर्ष पहले डेरा सच्चा सौदा में निश्चित किए मानवीय गुणों से सम्पन्न इन पवित्र नियमों पर डेरा सच्चा सौदा के लगभग साढे सात-आठ करोड़ श्रद्धालुगण, जिनमें 70-80 प्रतिशत से ज्यादा यूथ हैं, जोकि पूर्ण मर्यादाओं पर चलते हुए अपने इस मानस जन्म को सफल बना रहे हैं।
डेरा सच्चा सौदा की स्थापना का यही पवित्र मकसद है कि लोग सच के साथ जुड़ें, भजन-बंदगी करें और धरती पर स्वर्ग-जन्नत का नज़ारा नज़र आए। पूजनीय बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज व पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज ने डेरा सच्चा सौदा के अति उज्जवल भविष्य के लिए जो-जो भी वचन अपने पवित्र मुखारबिंद से फरमाए, आज पूज्य मौजूदा गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां के पावन मार्गदर्शन में ज्यों के त्यों पूरे हो रहे हैं
और पूज्य गुरु जी के मार्ग-दर्शन में डेरा सच्चा सौदा में साध-संगत नशा आदि बुराइयों को छोड़कर राम-नाम से जुड़ने वाले रोजाना बढ़ रहे हैं। यही बेपरवाही वचनों की सच्चाई है और यही रूहानियत की रीत है।

































































