Experiences of Satsangis: बेटा! दोबारा ऐसी गलती नहीं करना -सत्संगियों के अनुभव – पूज्य हजूर पिता संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां की अपार रहमत
फौजी बिल्लू सिंह इन्सां पुत्र श्री जीत सिंह गांव मूंम जिला बरनाला से पूज्य हजूर पिता संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां की अपने पर हुई रहमत का वर्णन करते हुए बताते हैं कि मैंने सन् 1988 में पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज से नाम शब्द की दात प्राप्त की थी। सतगुरु जी के हुक्मानुसार मैंने माँस-अंडा, शराब और सभी बुराइयाँ छोड़ दी थी। मैं सतगुरु जी के हुक्मानुसार ही अपना जीवन-बसर कर रहा था।
इसी दौरान मैं सेना में भर्ती हो गया। 28 फरवरी 2002 की बात है उस समय मैं उत्तर प्रदेश के सैनिक सेंटर में था। उस दिन सैनिक सम्मेलन के चलते सेना अधिकारियों के लिए बड़ी पार्टी थी जिसमें माँस, शराब भी था। उस पार्टी में मैंने भी वह सब खा-पी लिया। लेकिन बाद में मुझे पश्चाताप होने लगा कि मैंने ये क्या कर लिया।
मैं तो बहुत बड़ा गुनाह कर बैठा। ऐसा खाना-पीना तो मेरे गुरु जी की शिक्षाओं के विरुद्ध है। ऐसा सोचता हुआ मैं रात को दस बजे सो गया। रात को पौने दो बजे मैं पेशाब करने के बहाने उठा तो मुझे चक्कर आने लगे। मैं वॉशरूम में ही पांवों के बल बैठ गया तो मुझे दिखना भी बंद हो गया।
मेरे मुँह से निकला कि मैं तो मर गया। मैंने पूज्य पिता जी को याद करते हुए ‘धन धन सतगुरु तेरा ही आसरा’ का नारा बोला तथा पूज्य हजूर पिता संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां से अर्ज़ की कि पिता जी बचाओ, बचाओ! उसी समय मेरी आँखों में धीरे-धीरे रोशनी आ गई अर्थात् मुझे दिखाई देने लगा।
कुछ ही समय में मैं बिल्कुल ठीक हो गया। मैं सतगुरु जी का शुक्राना करता हुआ अपने बिस्तर पर जाकर लेट गया। जिसके बाद मुझे नींद आ गई तो मुझे सपने में ऐसे लगा कि जैसे मैं डेरा सच्चा सौदा सलाबतपुरा के सत्संग पंडाल में बैठा हुआ हूं। मेरे साथ और भी संगत बैठी हुई है। संगत के सामने पूज्य गुरु जी के लिए कुर्सी सजी हुई है। इतने में पूज्य हजूर पिता जी आए और साध-संगत को आशीर्वाद देते हुए विराजमान हो गए।
पिताजी ने सफेद वस्त्र तथा सफेद टोपी पहनी हुई थी। बहुत ही सुंदर लग रहे थे। पूज्य पिता जी ने मुझे मुखातिब करते हुए फरमाया, बेटा! तू तो रात को मर गया था, पर हमने तुझे बचा लिया है। बेटा! दोबारा गलती नहीं करनी। मैंने उसी समय हाथ जोड़कर माफी मांगी। इतने में मेरी आँख खुल गई।
उसी समय पिता जी अदृश्य हो गए। फिर मैंने सरसा दरबार में जाकर भी माफी ली। पूज्य पिता जी की दया-मेहर से मैं आज बिल्कुल सही सलामत हूँ और यही अरदास करता हूँ कि पिता जी ऐसे ही दया-मेहर, रहमत बनाए रखना जी।































































