Diwali: भारतीय संस्कृति की शान दीपावली

दीपावली बड़ी खुशियों के साथ मनाया जाने वाला त्यौहार है। इसकी खुशियां अब केवल देश ही नहीं अपितु पूरी दुनिया में मनाई जाने लगी है। प्रभु श्री राम के यश का गौरव पूरी दुनिया में फैल रहा है। हमारी संस्कृति के प्रणेता श्री राम ही हैं जो अतुलनीय है। भारतीय त्यौहारों को मनाने की परम्परा अब अमेरिका, इंग्लैंड, आस्ट्रेलिया, जर्मनी, कनाड़ा आदि देशों में भी देखने को मिल रही है।

मुख्यत: दीपावली का त्यौहार पश्चिमी संस्कृति को अपने रंग में रंग रहा है। रंग-बिरंगी छटा से भरपूर इस त्यौहार को मना कर पश्चिम के लोग भी अब हमारे धार्मिक आस्थाओं, मान्यताओं, परम्पराओं, प्रतीकों, रीति-रिवाजों को अपने मन में बसाने लगे हैं और भगवान के प्रति नतमस्तक होने लगे हैं। हमारे वेद-ग्रंथों के प्रति उनका विश्वास बढ़ रहा है।

दीपावली को मनाने का अभिप्राय ये है कि वो रामायण को जानने व समझने लगे हैं। रामायण जो एक सारगभिति जीवन ग्रंथ है और श्री राम के यश व कीर्ति का महाकाव्य है। यह एक अद्भुत जीवन-यात्रा है। चुनौतियों से निपटने का साहस है। अंधियारे को मिटाकर सूर्य की भांति चमकने का संकल्प है। श्री राम का वन को जाना लोगों को दु:खी करता है लेकिन उनकी यही यात्रा दु:खों को मिटाने वाली भी है। उनका वन में जाना और नाना प्रकार के खेल करते हुए अंत में रावण का वध करके वापिस अपने नगर अयोध्या आना अयोध्यावासियों के लिए मंगलकारी कामनाओं का सिद्ध होना है।

कहते हैं चौदह वर्ष तक अयोध्या में न कोई उत्सव मनाया गया और न ही किसी घर में खुशियों भरे कोई रीति-रिवाज़, संस्कार इत्यादि किए गए। अपने प्रभु श्री राम की सलामती व वापसी के लिए भरत से लेकर प्रजा के अन्य जनमानस यज्ञ, हवन आदि करते रहे। फिर जैसे ही चौदह वर्ष के बाद श्री राम का आना हुआ, उनकी खुशियों का ठिकाना न रहा। पूरी अयोध्या को रंग-बिरंगी आभा से सजाया गया।Importance of diwali festival in hindi

अपने प्रभु के स्वागत में अयोध्या वासियों ने खुशी में घी के दीप जलाए। घर-घर में फिर से खुशियों भरे वही दिन लौट आए। राजा भरत ने अपने प्यारे भाई श्री राम जी के आने की खुशी में एक बहुत बड़े त्यौहार का आयोजन किया। यह आयोजन कोई दिखावा या कोई राजसी वैभव के लिए नहीं था बल्कि यह अपने प्रभु के प्रति समर्पण व श्रद्धा का नज़ारा था। यह भक्ति-भाव से सजा हुआ उच्च कोटि का उत्सव था। भक्ति की शक्ति से ओत-प्रोत यह उत्सव अमिट हो गया, जो युग-युगांतर तक अपनी छाप छोड़े हुए हैं।

चिरंकाल से स्थापित यह प्रतीक आज भी हमें रामायण काल के उसी उत्सव में ले जाता है। भले ही युग बदल गया हो, मनाने वाले बदल गए हों और तौर-तरीके बदल गए हों लेकिन इस त्योहार की आत्मा वही है। प्रेम-प्यार, श्रद्धा व भक्ति-रस की वही गंगा आज भी ज्यों की त्यों बह रही है। दीपावली के त्योहार का यही आकर्षण है जो हमारी संस्कृति की शान है। ऐसी शानदार संस्कृति को देने वाले अयोध्या के राजा, भक्तों के प्रभु श्री राम जी के जीवन उपदेश को मन में बसा कर रखना ही दीपावली के त्यौहार की सार्थकता है।

दीपावली एक त्योहार जरूर है, साथ ही यह शोध व अध्ययन का विषय भी है जो आज की युवा पीढ़ी के लिए अति जरुरी है। श्री राम का जीवन चरित्र व मार्गदर्शन मानव को सजगता, सतर्कता, वीरता प्रदान करता है। वे सादा जीवन व उच्च विचार की जीवन शैली को गढ़ने वाले हैं।

श्री राम जी को विष्णु जी का अवतार माना जाता है। ऐसे अवतार धरती पर यदा-कदा ही प्रकट होते हैं। धरती पर जब पाप-जुल्मों की अति हो जाती है तब ही ऐसे अवतार जन्म लेते हैं। धरती पर जन-जीवन त्रस्त हो गया और भगवान का नाम लेने वाले भक्तजनों का भी जीना मुहाल हो गया था। देवताओं ने जब इन हालातों को देखा तो सभी देवगण विष्णु जी के पास गए और उनसे धरती पर बढ़ रहे पापों को खत्म करने की प्रार्थना की।

उनकी पुकार सुनकर विष्णु जी ने प्रभु श्री राम के रूप में राजा दशरथ के घर जन्म लिया। श्री राम एक तो विष्णु जी के अवतार हैं, दूसरा वो चक्रवर्ती सम्राट राजा दशरथ के बेटे हैं लेकिन उन्होंने कभी अपने-आपको न तो भगवान के रूप में दर्शाया और न ही अपने महान सूर्यवंशी कुल से होने का दिखावा किया। पूरी रामायण में कहीं भी ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता। इतने महान पराक्रमी होते हुए भी श्री राम अत्यंत कोमल, सरल स्वभाव, मृदुभाषी, सहनशील तथा विनम्र भाव को ही प्रमुखता से प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने कभी भगवान होने का चमत्कार नहीं दिखाया।

एक सूर्यवंशी सम्राट के राजकुमार होने का भी अपना परिचय नहीं देते थे। सम्राट बनने के बाद भी उनको कोई सम्राट कहकर पुकारे, ये स्वीकार नहीं था। चौदह वर्ष के वनवास के बाद जब वो अयोध्या लौटे और उनका राजतिलक हो चुका था, इसके बाद वो ऋषि भारद्वाज के आश्रम में गए। ऋषि ने उनको इतना ही कहा था, आओ सम्राट राम! आपका इस कुटिया में स्वागत है।

ये सुनते ही श्री राम तुरंत बोले कि महर्षि जी, मैं आपका शिष्य राम हूँ, सम्राट राम नहीं। अत: आप मुझे बेटा राम ही कहिए। महर्षि भी उनकी यह सरलता देख कर अत्यंत खुश हुए। भगवान होते हुए, एक सम्राट होते हुए भी उन्होंने सदैव मानवीय गुणों को ही सर्वोच्च करके जीया है। उन्होंने अपने-आपको एक बेटे के रूप में, एक पति के रूप में, एक भाई के रूप में और एक सच्चे मित्र के रूप में स्थापित किया है।

पति के रूप में:

श्री राम भगवान थे, फिर भी एक स्वर्ण-मृग के पीछे दौड़े। वो चाहते तो मृग की क्या मजाल थी कि वो भाग खड़ा होता। पर नहीं, वो एक आम इन्सान की तरह मृग को पकड़ने दौड़े। अपनी भार्या सीता जी की इच्छा को प्रमुख रखा। अपना पतिधर्म निभाते हुए उन्हें उस पल वही उचित लगा। मृग का पीछा करते हुए कहीं दूर निकल जाना और फिर सीता जी का ना मिलना उनको व्याकुल कर देता है।

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उन्हें कुछ नहीं पता वो कहाँ गई? कौन उनको ले गया? वो बेचैन हैं, अधीर हैं। वो लक्ष्मण पर भी झुंझलाते हैं। वो सीता जी के बिना अपने-आपको अधूरा कहने लगते हैं। उनको हर हाल में ढूंढ लेना चाहते हैं। उनके दु:खों की जैसे कोई सीमा न रही हो। पहले उनको राजपाट से निष्कासित कर वनवास मिला। यहाँ भी सब कुछ सही-सलामत गुज़र रहा था कि अब सीता जी का उनसे वियोग हो गया। अब सीता जी को ढूंढ़ना कोई आसान काम नहीं था। कौन बताए…? कहाँ से उनको खबर मिले? वो पेड़ों से पूछते हैं। पंछी-जानवरों से गुहार लगाते हैं।

आकाश से पूछते हैं लेकिन पूरी प्रकृति जैसे खामोश हो गई हो। कहीं से कोई सुराग तक नहीं मिल रहा। वो अत्यंत दु:खी हो चुके हैं। आखिर जटायु से उन्हें सीता जी का रावण के द्वारा अपहरण हो जाने का पता चलता है। फिर माता सीता जी को उसके चंगुल से आज़ाद करवाते हैं। वो जब तक सीता जी को लेकर नहीं आए, एक दिन भी चैन से नहीं बैठे। रावण मायावी था। बलशाली था। उसके पास विशाल सेना थी, जबकि श्री राम के पास तो ऐसा कुछ भी नहीं था।

उनके सामने लक्ष्य छोटा नहीं था। वो यही सिखाते हैं कि लक्ष्य को किस प्रकार हासिल किया जा सकता है। जब लक्ष्य बड़ा हो तो हौंसला भी बड़ा रखना होगा। हर दिन कर्मरत रहना होगा। अपने सपनों में, विचारों में, लक्ष्य को सामने रखकर आगे बढ़ते रहना होगा। मदद पाने की जरूरत पड़े तो उसके लिए भी तैयार रहना होगा। अपने हितैषी, अपने शुभ चिंतकों से अपनी व्यथा को सांझा करना होगा। आई हुई विपत्ति को सरलता से, समझदारी से धैर्य के साथ हटाया जा सकता है।

बेटे के रूप में

एक बेटे के रूप में जिस प्रकार उन्होंने अपने आप को स्थापित करके दिखाया है, दुर्लभ है। वो अपनी माँ कौशल्या से ज्यादा माँ कैकेयी से प्रेम करते थे। कैकेयी, कौशल्या और सुमित्रा जब भी तीनों माएँ उन्हें मिलती, वे सबसे पहले माँ कैकेयी को ही सिर झुकाते थे। उनके हाथों से बने खाने को ही अधिक पसंद करते थे। इतना प्रेम होने पर भी माँ कैकेयी ने जब उनके लिए वनवास जाना तय किया तो वो किंचित भी विचलित नहीं हुए।

उनके मन में माँ कैकेयी के प्रति जरा भी दुर्भावना पैदा नहीं हुई। बल्कि उन्होंने माँ की भावना को समझा और सिर-माथे पर रखा। वहीं उन्होंने पिता दशरथ के शब्दों को निभाने में अपना बड़प्पन समझा। वो चाहते तो विरोध भी कर सकते थे। मगर उन्होंने सहर्ष जंगलों को जाना स्वीकार किया और छोटे भाई भरत के लिए राजा बनने का अधिकार छोड़ दिया। माँ की ममता, जो कैकेयी की अपने बेटे भरत के लिए उमड़ रही थी, उसको सर्वोपरि रखा। अपने पिता के शब्दों का मान रखने का हौंसला दिखाया। उनमें कहीं भी द्वेष की भावना नहीं उपजी।

जबकि कहाँ तो उनके राजा बनने की तैयारियाँ चल रही थी और कहाँ एकदम से उनको घर-बार से ही दूर कर दिया गया। जब राजतिलक न होकर उनके वनवास जाने की खबर महलों तक पहुंची तो सबके होश उड़ हो गए। खुशियों की जगह मायूसी फैल गई। महलों में उदासी छा गई। इन सबके बीच एक राम ही थे, जो अविचलित अपने वन गमन की तैयारियों में ऐसे मग्न हो गए, जैसे कुछ भी न हुआ हो। माँ कौशल्या की पीड़ा असहनीय थी। वो दौड़ती हुई अपने लाल के पास आई और पूछा, ‘राम मैं ये क्या सुन रही हूँ बेटा!’ राम तो फिर राम हैं ना।

माँ की व्यथा को देख रहे हैं, महसूस कर रहे हैं, परंतु तनिक भी घबराए नहीं। अपने-आपको सहज भाव में रखे हुए हैं। माँ के सवाल पर बड़े मान के साथ कहा कि हाँ माता, आप जो सुन रही हैं, सत्य है। माँ की हिम्मत ना पड़ी कुछ और सवाल कर सके। इस हालात के लिए राम ने माँ कैकेयी को जिम्मेवार नहीं ठहराया। उन पर कोई दोषारोपण नहीं किया। खुद तो क्या करना बल्कि भरत को भी इसके लिए आगाह करते हैं। भरत के मन में आए इस दोष को निकाल देते हैं क्योंकि इस घटना के बाद भरत ने कैकेयी को माँ कहना छोड़ दिया था।

न ही वो उनसे मिलते थे। जंगल में श्री राम जब चित्रकूट में ठहरे हुए थे, भरत उन्हें वापिसी के लिए मनाने पहुँच जाते हैं। उनके साथ अयोध्यावासी और तीनों माताएँ भी जाती हैं। श्री राम वहाँ भी कैकेयी से सबसे पहले मिलते हैं। उन्होंने देखा कि भरत ने माँ कैकेयी से मिलना-जुलना छोड़ रखा है और न ही उन्हें बुलाते हैं। श्री राम भरत से कहते हैं कि हे भरत, मेरी एक इच्छा है। भरत जो अपने बड़े भाई राम के लिए अपना जीवन भी न्यौछावर करने को तैयार रहते थे, इतना सुनते ही उतावला हो गया। भरत बोले कि भईया सब कुछ आपके लिए ही तो है।

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आपकी इच्छापूर्ति मेरा सौभाग्य है। आप कहिए तो सही। श्री राम कहने लगे कि भरत, माँ कैकेयी को सिर झुकाओ। उन्हें माँ कहकर बुलाओ। जो भी कुछ हुआ है उसके लिए माता कैकेयी का कोई दोष नहीं हैं। माँ के चरण स्पर्श करो। श्री राम के प्रिय भरत आज्ञा को मानते हुए माँ कैकेयी से मिले और मन में जो कुंठा के भाव थे मिट गए। यह श्री राम के निर्मल स्वभाव का ही गुण है। घर-परिवार के बीच सामंजस्य कैसे रखना है, उनका यह गुण एक बड़ी सीख है।

परिवार राजा का हो, चाहे आम नागरिक का परिस्थितियाँ सबको तोड़ देती है। लेकिन श्री राम सिखाते हैं कि मुश्किल हालातों में भी परिवार टूटे नहीं, बल्कि समुचित प्रयासों से मिलकर कठिनाइयों से निपटा जा सकता है। परिवार की मान-मर्यादा बनी रहे। किसी का तिरस्कार न हो। धीरज रखकर हर मुसीबत से निकला जा सकता है।

श्री राम का मैत्री भाव श्रेष्ठतम

श्री राम का मैत्री भाव श्रेष्ठतम है। उनकी मित्रता सीमाओं से परे है। उनकी मित्रता में जात-पात का भेद नहीं है। ऊँच-नीच का कोई स्थान नहीं है। उनके सम्पर्क में जो भी आया, वो उनका ही प्रिय हो गया। यहाँ तक कि वो पेड़-पौधों को भी अपने मित्र की तरह अपना बना लेते हैं। उनसे बातें करते हैं। वो अपना दु:ख-सुख उनसे सांझा करते हैं। सीता जी के अपहरण होने पर वो पेड़-पौधों को ही अपने करीबी मित्रों की तरह पुकारते हैं।

वहीं उनकी मित्रमंडली के सदस्य सुग्रीव, अंगद, जामवंत, नल-नील, विभीषण व हनुमान उनके भक्त बाद में, घनिष्ठ मित्र पहले हैं। उनके मैत्रीभाव का ही प्रताप था कि विभीषण, उनके शत्रु का भाई होते हुए भी उनकी शरण में आ गया। श्री राम असहायोें, वंचितों, पीड़ितों व दबे-कुचलों को अपनी शरण में लेने वाले हैं। सुग्रीव का राज्य छीन लिया गया था और वह अपनी जान बचाते फिर रहा था। श्री राम ने अपनी शरण में लेकर उन्हें अपना मित्र बनाया और उनका छीना हुआ वही वैभव फिर लौटा दिया। सुग्रीव को उन्होंने हमेशा ‘मित्र सुग्रीव’ और विभीषण को ‘महाराज विभीषण’ कहकर ही बुलाया है।

उनके सबसे पहले मित्र केवट थे, जो सरयू नदी को नाव से पार कराने वाले एक आदिवासी मल्लाह थे। श्री राम ने उनकी नाव में बैठकर नदी को पार किया। इस थोड़ी दूर के सफर में ही केवट उनके मुरीद हो गए। नदी को पार कराने पर श्री राम ने इस सेवा के बदले उसे कुछ देना चाहा परंतु केवट बड़े मधुर शब्दों के साथ यह कहते हुए उन्हेें मना करने लगा कि नहीं मित्र, हमारा दोनों का पेशा एक है और मैं आपसे कुछ पारितोषण लूँ, यह हमारे पेशे की मर्यादा नहीं है।

श्री राम ने पूछा कि केवट वो कैसे? केवट कहने लगा कि हे भगवान! आप भवसागर से लोगों को पार लंघाते हो और मैं इस सरयू नदी से पार लंघाता हूँ। इस प्रकार हुआ न हमारा पेशा एक। अत: मैं अब आपसे कुछ नहीं लंंूगा और जब मैं शरीर छोडूं तो आप मेरे कर्मों का हिसाब-किताब ना लेकर मुझे भवसागर से पार लंघा देना। शब्दों के साथ गढ़ी यह मित्रता श्री राम को इतनी प्यारी लगी कि वो चौदह वर्ष वनवास में रहने पर भी केवट को भूले नहीं। इतने लंबे अर्से के बाद जब श्री राम वापिस अयोध्या लौट रहे थे तो पहले अपने इसी मित्र, अपने भक्त केवट को मिलने के बाद ही अयोध्या गए थे। ऐसी विलक्षण मित्रता के स्वामी हैं श्री राम।

युद्ध समाप्त हो चुका था। अपने संकल्प के पक्के श्री राम लंका में नहीं गए क्योंकि चौदह वर्ष पूरे होने में कुछ दिन रह गए थे। उनका मत भी यही था कि वनवास पूरा होने पर किसी और नगर या राजधानी में नहीं जाएंगे। वो सबसे पहले वापिस अयोध्या ही जाएंगे। जहाँ भरत उनके इंतजार में तड़प रहा है। जब दो दिन शेष रह गए तो उनके जाने की तैयारियाँ होने लगी। महाराज विभीषण ने पुष्पक विमान को सजाकर श्री राम के समक्ष प्रस्तुत कर दिया।

श्री राम अपने सभी मित्रों, सुग्रीव, विभीषण, जामवंत, अंगद, नल-नील व हनुमान जी को साथ लेकर वहाँ से विदा होते हैं। लंका में जहाँ पहले रावण का जयघोष होता था, वहाँ अब जय श्री राम के उद्घोष गूंज रहे थे। पूरी वानर सेना और लंका की सेना प्रभु श्री राम की जय-जयकार करके उन्हें सम्मानपूर्वक विदाई देने लगती है। दो दिन की यात्रा के बाद पुष्पक विमान अयोध्या पहुँच जाता है।

अयोध्या के नगरवासियों को श्री राम के आने की सूचना मिल चुकी थी। भरत व शत्रुघन ने अपने बड़े भाई श्री राम के स्वागत में पूरी अयोध्या को सजाकर चमका रखा था। कुलगुरू विशिष्ट जी, महर्षि भारद्वाज जी व माताओं को साथ लेकर भरत उनके स्वागत में वहीं पहुँच गए, जहाँ पुष्पक विमान उतरा था।

चौदह वर्ष के बाद बिछड़े हुए प्रियजन मिलकर भाव-विभोर हो गए। अयोध्या में उनके स्वागत का यह दौर कई दिनों तक चलता रहा। लोगों ने घी के दीप जलाकर पूरे वातावरण को महका दिया। शहरों-नगरों, गाँवों-बस्तियों को रंग-रोगन करके सजाया गया। भरत अपने भाई राम व उनके साथ आए सभी मित्रों को लेकर नगरी-नगरी घूमे और प्रजा से मिलकर इन खुशियों को सांझा किया। प्रजा अपने प्रभु श्री राम को अपने बीच पाकर निहाल हो गई।

अयोध्या का यह त्यौहार आज भी अपनी रौणक से सबको रोशन कर रहा है। श्री राम के तप, बलिदान, वैराग्य तथा प्रेम-प्यार से लबरेज दीपावली का यह त्यौहार आज भी जनमानस को जगमग कर रहा है। हमारी चेतना को जगा रहा है। खुशियों भरा यह त्यौहार सबको मुबारक हो! सबके लिए सुख-समृद्धि व उन्नति लेकर आने वाला हो यह दीपावली पर्व!!

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