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finding: अपने हित के लिए रास्ता निकालना

बुद्धिमान व्यक्ति हर स्थिति में अपने हित के लिए रास्ता निकाल लेता है। मनीषियों का कथन है कि किसी से बदला लेने के स्थान पर सदा बदलाव लाने पर विचार करना चाहिए। ईंट का जवाब पत्थर से देना कोई महानता का कार्य नहीं होता। दूसरे को शय देना अथवा उससे डरकर जीवन जीना एक नकारात्मक तरीका कहलाता है। इससे बचना हर मनुष्य के लिए आवश्यक है।

जीवन में व्यहारिकता से चलने वाला मनुष्य कभी जीवन की रेस में पिछड़ता नहीं है। समझदारी इसी में है कि यदि कोई ईंट फैंके तो उसका जवाब पत्थर से न दिया जाए। उस व्यर्थ जाती हुई ईंट को नष्ट न करके उससे अपना घर बना लेना चाहिए। इस प्रकार शत्रुवत् व्यवहार करने वाले को मुँहतोड़ उत्तर ना देना ही बुद्धिमत्ता की निशानी होती है। यह सकारात्मक तरीका है जिससे अपनी मानसिक शान्ति भंग नहीं होती और दूसरे को भी मुँह की खानी पड़ जाती है।

मनुष्य का भाग्य बड़ा ही प्रबल होता है। जब किस्मत के सिक्के को हवा में उछला जाता है तभी हार-जीत का अनुमान लगाया जाता है। जब वह नीचे जमीन पर आकर गिर जाता है तब उसके भाग्य का फैसला सुना दिया जाता है कि वह हार गया है या जीत उसकी झोली में आई है।

हम लोग अपने कर्मों के द्वारा अपना भाग्य लिखते हैं। यहाँ हम कागज और पत्थर के नसीब की चर्चा करते हैं। वही कागज होता है जिस पर हम लिखते हैं और कुछ समय पश्चात उसकी पुड़िया बनाकर उसमें सामान बेचा जाता है। लोग उस सामान का उपयोग करके उसे कूड़ेदान में फैंक देते हैं। दूसरी ओर उसी कागज पर हमारे धर्म ग्रन्थ लिखे जाते हैं जिन्हें लोग अपने सिर माथे पर रखते हैं, उनका नित्य पाठ करके उनकी पूजा करते हैं। उसके पश्चात उसे सुन्दर से वस्त्र में लपेटकर सम्भाल देते हैं।

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इसी तरह सड़क पर पड़े हुए पत्थर सबके पाँव से ठोकर खाते रहते हैं। लोग उसे अपने पैर से ठोकर मारकर एक किनारे कर देते हैं। इसके विपरीत कुछ भाग्यशाली पत्थर ऐसे होते हैं जिन्हें सुघड़ हाथों से तराशकर भगवान की मूर्ति बनाई जाती है। उसे मन्दिर में स्थापित किया जाता है। लोग प्रात:काल और सायंकाल वहॉं आकर उस मूर्ति की पूजा करते हैं।

मनुष्य को हर परिस्थिति में अपना आत्मसम्मान बचाकर रखना चाहिए। उसे कुचलकर वह निर्जीव जैसा हो जाता है। सहनशीलता रूपी बहुमूल्य गुण का उसे पालन करना चाहिए। निसन्देह महात्मा बुद्ध आदि महापुरुषों की तरह सहनशीलता के अस्त्र से किसी को भी परास्त किया जा सकता है।

सबका यथायोग्य सम्मान करना चाहिए परन्तु आत्मसम्मान की शर्त पर कभी नहीं। इसलिए सम्मानपूर्वक जीवन जीकर अपनी स्वतन्त्र पहचान बनाना हर व्यक्ति के लिए बहुत आवश्यक होता है। अत: अपने स्वाभिमान को कभी दाँव पर नहीं लगाना चाहिए।

जितनी खुशियाँ मनुष्य जीवन पथ पर चलते हुए बाँटता जाता है उतना ही उसका कद बढ़ता रहता है। एक मोमबत्ती से हज़ारों मोमबत्तियों को जलाया जा सकता है, फिर भी उसके प्रकाश में कहीं कोई कमी नहीं आती। उसी तरह दूसरों को खुशियाँ बाँटने वाले मनुष्य की खुशियाँ भी कभी कम नहीं होतीं बल्कि मोमबत्ती के प्रकाश की तरह बढ़ती रहती हैं। अपने पास आने वाले सभी लोगों को वह आनन्दित करता रहता है।

महत्त्व इस बात का नहीं होता कि मोमबत्ती अमीर व्यक्ति के महल में जल रही है अथवा किसी गरीब व्यक्ति की झोंपड़ी में जल रही है। उसकी सार्थकता मात्र उसके प्रकाशित होने में होती है, अन्धेरे से मुक्ति दिलाने में होती है। इसी प्रकार मनुष्य के खुशनुमा व्यवहार की चर्चा हमेशा करनी चाहिए। उसकी जाति, रंग रूप आदि अन्य बातों को नज़रंदाज कर देना चाहिए।

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किसी भी कीमत पर इस जीवन के मूल उद्देश्य को विस्मृत नहीं करना चाहिए। संसार में स्वाभिमान के साथ सहनशील रहकर अपने चारों ओर खुशियाँ बिखेरने वाला मनुष्य ही वातावरण को सुगन्धित कर सकता है। अपने लिए, अपने घर-परिवार और अपने बन्धु-बान्धवों के लिए तो सभी जी लेते हैं। इसीलिए वास्तव में जो दूसरों के लिए जीता है, उसी को इन्सान कहते हैं और वही महान होता है। उसका यश चारों दिशाओं में फैलता है। लोग उसे अपना आदर्श मानते हैं।
-चन्द्र प्रभा सूद

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