Experiences of Satsangis

Experiences of Satsangis: हमने इसे सच्चे सौदे का हवलदार बना दिया है -सत्संगियों के अनुभव -पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज की दया-मेहर

प्रेमी केहर सिंह पुत्र श्री फुम्मण सिंह गाँव पक्का कलाँ जिला भटिंडा से परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज की अपने पर हुई कुछ रहमतों का वर्णन करते हुए बताते हैं:-

बेपरवाह मस्ताना जी के समय के प्रेमी दुनी चंद के कहने पर मैंने पूज्य परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज से सन् 1964 में नाम शब्द की दात प्राप्त की। उस समय दुनी चंद ने परमपिता जी के पास विनती की कि पिता जी, केहर सिंह मिल्ट्री से हवलदारी पैंशन पर आया हुआ है।

इस पर परमपिता जी ने वचन फरमाया, ‘हमने इसे सच्चे सौदे का हवलदार बना दिया है।’ उस समय मुझे बड़ा अचम्भा हुआ कि पता नहीं कौन सी हवलदारी बख्शी है। उसके बाद परमपिता जी ने मेरी सेवा पक्के तौर पर लगा दी। परमपिता जी ने मुझे स्टेज प्रेमी सेवक तब स्टेज सेक्टरी कहा जाता था, बना दिया। इसके साथ ही स्पीकर समिति व छायावान समिति की जिम्मेवारी दे दी गई। फिर मुझे समझ आया कि कौन सा हवलदार बनाया है।

बेटा, शब्द को नहीं छोड़ना:-

एक दिन परमपिता जी ने हम सेवादारों को फरमाया कि जिसने अंदरूनी नज़ारे देखने हैंं, वह चालीस दिन लगातार सुमिरन करके देखे। मैंने कमरे में बैठ कर मालिक सतगुरु द्वारा बख्शे नाम शब्द का सुमिरन करना शुरु कर दिया। मुझे अजीब-अजीब दृश्य दिखाई देने लगे। कई बार कमरे की दीवारें डरावनी शक्लें धारण कर लेती। इस दौरान और भी कई प्रकार के भयानक दृश्य दिखाई देने लगे।

ऐसे दृश्य देखकर मैं डर गया और मैंने सोचा कि मैं तो मुश्किल में फंस गया। मैंने अपने अंदर ही अंदर यह फैसला कर लिया कि दो दिनों बाद आखिरी रविवार को माहवारी सत्संग है। मैं परमपिता जी की हजूरी में पेश होकर अर्ज़ करूंगा कि सच्चे पातशाह जी, या तो अपना नाम वापिस लेकर मुझे पहले जैसा कर दो या फिर मेरा उन भयानक दृश्यों से पीछा छुड़वाओ। मैं एक दिन सरसा चला गया जब मैं दरबार में पहुँचा तो घट-घट व पट-पट की जानने वाले अंतर्यामी सतगुरु जी ने मुझे तेरावास के ऊपर अपने पास बुला लिया।

मेरे कुछ बोलने से पहले ही परमपिता जी ने फरमाया, ‘बेटा! घबरा ना। इससे भी भयानक दृश्य आ सकते हैं। शब्द नहीं छोड़ना। भयानक शेर अपने पंजे का वार भी कर सकता है। भयानक कुएँ में लटकने का दृश्य भी दिख सकता है। अति भयानक साँप डँक मारता भी दिख सकता है तथा और भी ऐसे भयानक से भयानक दृष्टांत भी सामने आ सकते हैं। घबराना नहीं है, तेरा बिगड़ता कुछ नहीं। शब्द को नहीं छोड़ना, सतगुरु हर जगह सहायता करता है।’ परमपिता जी ने मेरे अंदर की स्थिति को जानते हुए मेरे सभी भ्रम व डर को दूर कर दिया।

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इसके बाद मुझे कुछ भी डरावना दिखाई नहीं दिया। मैं निरंतर सुमिरन में बैठने लगा। सतगुरु जी ने कुछ ऐसे दृष्टांत अंदर से प्रत्यक्ष करके दिखा दिए कि यह सारी दुनिया दु:ख रूप है। इस तरह सच्चे पातशाह जी ने मेरा दुनिया से मोह तोड़कर मुझे अपने चरणों में लगा लिया और मैं सेवा में डटा रहा।

सतगुरु सेवा का फल बिन माँगे देता है:-

सन् 1973 में एक बार मेरे मन में आया कि परमपिता जी कई सेवादारों को अपने पवित्र कर-कमलों से प्रशाद देते हैं, मैं इतनी सेवा करता हूँ परंतु मुझे अपने कर-कमलों से कभी प्रशाद नहीं देते। मेरे मन में आया कि मैं इतना पापी हूँ जो मुझे परमपिता जी के हाथों से प्रशाद नहीं मिलता। यह बात मेरे मन में इतनी गहरी बैठ गई कि सेवादारों के प्रति मेरे मन में उलट-पुलट विचार आने लगे। इस बात को लेकर मैं इतना दु:खी हो गया कि मैं कमरे में बैठकर रोने लग गया।

सतगुरु तो घट-घट की जानने वाले हैं। उसी समय परमपिता जी ने जीएसएम सेवादार लक्ष्मण दास को मेरे पास भेजकर मुझे अपने पास तेरावास में बुला लिया। परमपिता जी दो केले अपने पवित्र कर-कमलों में पकड़ कर मुझे कहने लगे, ‘केहर सिंह! इन दो फलियों (केलों) के लिए रोता है। क्या सेवा का फल यही है? सतगुरु सेवा का फल बिन माँगे ही देता है।’ मैंने उसी समय अपने कान पकड़ लिए। परमपिता जी ने मेरे मन में उठे सभी विचारों व शंकाओं को पल में खत्म कर दिया।

जिनको सत्संग की कद्र होती है, वे ड्यूटी निभाकर भी पहुँच जाते हैं:-

सेना से रिटायर होने के बाद मैं पी.डब्ल्यू.डी. महकमे में वर्क मुंशी लग गया। हमारा अफसर बहुत सख्त स्वभाव का था। गैर हाजिर कर्मचारी पर सख्त कार्यवाही की जाती थी। इन्हीं दिनों परमपिता जी की ओर से गांवों-शहरों के सत्संग का प्रोग्राम बन गया। स्टेज प्रेमी सेवक होने के नाते मेरी सेवा भी जरूरी थी। मैं ड्यूटी छोड़कर बिना बताए ही सेवा पर चल रहा था। सत्संगों में मेरी स्टेज सैक्टरी (स्टेज प्रेमी सेवक) व स्पीकर लगवाने की सेवा की ड्यूटी थी। मेरे पास छुट्टी तो थी नहीं, मैं बिना छुट्टी के सेवा पर चल रहा था। एक दिन शाम को परमपिता जी ने मुझे आदेश फरमाया कि तू अपनी ड्यूटी पर चला जा। कल से महमा सरजा गाँव में सत्संग है।

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समय मिला तो दोपहर को आ जाना। मैं सत्वचन कहता हुआ अपने गाँव से होकर समय पर अपनी ड्यूटी पर पहुँच गया। मैं हाजरी लगाकर बाहर ही निकला था कि पाँच मिनट बाद मेरे अफसर आ गए। सतगुरु जी की रहमत से ही मैं ड्यूटी पर हाजिर था। सतगुरु का निराला खेल देखकर मैंने लाख-लाख बार शुक्राना किया। मैंने महमा सरजा के सत्संग पर पहुँचने के लिए दफ्तर वाले कमरे को ताला लगाना चाहा। मैं हैरान था कि जहाँ पर मैंने ताला रखा था, वहाँ पर ताला नहीं था। मैंने सोचा कि किसी ने उठा लिया होगा। वहाँ उसी एरिया में मेरी बहन रहती थी, मैं उनके घर से ताला ले आया।

मैं ताला लगा कर अपनी साईकिल की ओर बढ़ा तो मेरे देखते ही देखते एक छोटा-सा लड़का मेरी साईकिल को ताला लगाकर उसमें से चाबी निकालकर भाग गया। मेरा मन बहुत दुखी हुआ क्योंकि मैं सत्संग पर पहुंंचने से लेट हो रहा था। कदम-कदम पर बाधाएं आ रही थी और मुझे घबराहट हो रही थी। मैंने सोचा कि साईकिल उठाकर दुकान पर ले जाकर ताला खुलवा या तुड़वा लेता हूँ।

मैंने अपने कंधों पर साईकिल रखी ही थी कि उसी समय महकमे का सीमेंट से लोड एक ट्रक आ गया। फिर मुझे असली बात की समझ आई कि ये सारा खेल भी मेरी लाज बचाने के लिए सतगुरु जी ने ही खेला है। मैंने फटाफट लेबर लगवा कर सीमेंट के थैले गिनकर अंदर स्टोर में लगवाए और ड्राईवर को रीसिविंग देकर अपनी जिम्मेवारी निभाई। अपने काम से फारिग होकर जब मैं कमरे का ताला लगाने लगा तो वो पहले वाला ताला पहले वाली निश्चित जगह पर पड़ा था। जब मैं साईकिल की ओर बढ़ा तो देखा कि उसका ताला भी खुला हुआ था।

मैं मालिक सतगुरु का धन्यवाद करता हुआ सही बारह बजे दोपहर को महमा सरजा के सत्संग पर पहुँच गया। सच्चे पातशाह जी ने सब कुछ जानते हुए स्टेज से वचन फरमाए, ‘जिन्हें सत्संग की कद्र होती है, वह अपनी पूरी ड्यूटी निभाकर भी पहुँच जाते हैं।’ इस प्रकार सतगुरु जी ने मुझे बेअंत खुशियां दीं। गौरतलब है कि प्रेमी सेवादार केहर सिंह सतगुरु से ओड़ निभा चुके हैं।

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