Organic farming: कम लागत में आमदनी बढ़ाने का जरिया जैविक खेती
जैविक खेती न केवल कृषि उत्पादन की लागत घटाने का रास्ता है, बल्कि यह मिट्टी की सेहत सुधार कर दीर्घकालिक सतत कृषि का मार्ग भी खोलती है।
भारत सरकार द्वारा समूह में खेती करने वाले किसानों को अधिकतम 10 लाख रुपये तक का अनुदान देना इसी सोच का परिचायक है कि अब जरूरत है इस खेती को जमीनी स्तर पर प्रभावी रूप में लागू किया जाए।
जैविक खेती किसानों के लिए लागत घटाने और आय बढ़ाने का प्रभावी माध्यम बन रही है। इसमें रासायनिक उर्वरकों और पेट्रोलियम आधारित कीटनाशकों पर निर्भरता कम होती है। उनकी जगह गोबर, कम्पोस्ट, हरी खाद और जैविक फफूंदनाशकों जैसे स्थानीय संसाधनों का उपयोग किया जाता है,
जिससे प्रति हेक्टेयर खर्च कम होता है और किसानों की नकदी स्थिति मजबूत होती है। जब किसान समूह बनाकर कार्य करते हैं और उन्हें अनुदान मिलता है, तब वे सामूहिक खरीद, सांझा उपकरण और एकजुट विपणन के जरिए लागत तथा जोखिम दोनों को कम कर पाते हैं।
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बढ़ती है जैविक सक्रियता:
जैविक पद्धतियां मिट्टी की उर्वरता और जैविक सक्रियता को बढ़ाती हैं। इससे मिट्टी की जलधारण क्षमता बेहतर होती है तथा पोषक तत्वों का संतुलन बना रहता है। समय के साथ फसलों की गुणवत्ता और पोषण मूल्य में भी सुधार आता है, जिससे बाज़ार में उनकी मांग बढ़ती है।
विशेषकर स्वास्थ्य के प्रति जागरूक उपभोक्ताओं के बीच जैविक उत्पादों की लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही है। हालांकि जैविक खेती अपनाने में शुरूआती चुनौतियां भी हैं। किसानों को फसल चक्र, खरपतवार नियंत्रण और प्रमाणन प्रक्रिया की जानकारी होना जरूरी होता है। इसलिए केवल आर्थिक सहायता पर्याप्त नहीं है, बल्कि प्रशिक्षण, तकनीकी मार्गदर्शन और कृषि वैज्ञानिकों के सहयोग की भी आवश्यकता है।
पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर लाभ:
रासायनिक इनपुट्स के कम उपयोग से जमीन, पानी और हवा प्रदूषण घटता है। इससे आसपास के समुदायों का स्वास्थ्य बेहतर होता है और खाद्य श्रृंखला में हानिकारक अवशेष कम होते हैं। दीर्घकाल में यह स्वास्थ्य-सम्बंधी खर्चों में कमी और स्थानीय पारिस्थितिकी की बहाली के रूप में लौटता है-एक बड़ा सामाजिक लाभ जो अक्सर आर्थिक गणनाओं में छूट जाता है।
किसानों के प्रशिक्षण पर भी देना होगा ध्यान:
समूह अनुदान तभी मंजूर हों जब किसानों को जैविक प्रबंधन, प्रमाणन और विपणन पर प्रशिक्षण मिले। संयुक्त प्रमाणन केंद्र और सस्ता समूह प्रमाणन प्रक्रिया शुरू की जाए ताकि छोटे किसान छूटें नहीं। राज्य-स्तरीय जैविक मंडियां और डिजिटल प्लेटफार्म बनाये जाएं जहाँ समूह सीधे अपने उत्पाद बेच सकें।
































































