Raksha Bandhan: राखी का प्यारा धागा
रमा ने उसकी फीस देने के लिए अपनी सोने की चूड़ियां गिरवी रख दीं, लेकिन विक्की को कभी पता नहीं चलने दिया। शहर की चकाचौंध में विक्की धीरे-धीरे बदलने लगा। पहले हर रविवार फोन आता था। फिर महीने में एक बार। फिर केवल त्योहारों पर एक हैप्पी राखी दीदी का मैसेज। फिर… चुप्पी।
सावन की नमी भरी हवा खिड़की से टकरा रही थी। आंगन में नीम का बूढ़ा पेड़ धीरे-धीरे झूल रहा था। नीला आकाश बादलों से ढँका हुआ था, और रमा की आँखें वही पुरानी राखियां टटोल रही थीं- जो पिछले आठ सालों से उसने संभाल कर रखी थीं। हर राखी पर लिखा था तुम्हारी दीदी, रमा। लेकिन वह जिसके लिए ये राखियाँ थीं…
वो कभी लौटा ही नहीं। रमा एक सरकारी स्कूल में शिक्षिका थी। गांव की मिट्टी से जुड़ी, भावनाओं से भरपूर, लेकिन भीतर कहीं न कहीं टूटी हुई। हर साल जब रक्षाबंधन आता, वो अपनी पुरानी गुलाबी साड़ी पहनती, हल्दी से बनी राखी सजाती और थाली में दीपक रखकर छत पर बैठ जाती- उस दिशा में मुंह करके, जहां से कभी उसका छोटा भाई विक्की जाता था।
विक्की- हाँ, वही विक्की, जो उसके पीछे भागते हुए कहता था —दीदी! चप्पल मत पहन, मैं तुझे कंधे पे बिठा लूंगा। रमा हँसती, पगले! मैं अब छोटी नहीं हूँ! और विक्की जवाब देता, मेरे लिए तो हमेशा छोटी ही रहोगी, क्योंकि तुम मुझे सबसे बड़ी लगती हो। उनका रिश्ता आम भाई-बहन का रिश्ता नहीं था। माँ-बाप के जाने के बाद रमा ने विक्की को माँ की तरह पाला था। स्कूल के लिए कपड़े, दूध, फीस सब कुछ रमा ही देखती थी। वो दीदी कम और माँ ज्यादा थी।
विक्की बड़ा हुआ। उसने इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए शहर का रुख किया। रमा ने उसकी फीस देने के लिए अपनी सोने की चूड़ियां गिरवी रख दीं, लेकिन विक्की को कभी पता नहीं चलने दिया। शहर की चकाचौंध में विक्की धीरे-धीरे बदलने लगा। पहले हर रविवार फोन आता था। फिर महीने में एक बार। फिर केवल त्योहारों पर हैप्पी राखी दीदी का एक मैसेज। फिर… चुप्पी। रमा ने कई बार पत्र भेजे, लेकिन कोई उत्तर नहीं मिला।
एक बार राखी के साथ एक चिट्ठी भी भेजी थी, जिसमें लिखा था: तेरे बिना ये त्यौहार अधूरा लगता है। शायद तू बहुत व्यस्त है। लेकिन मैं यहाँ वही दीदी हूँ तेरे लिए राखी की थाली सजाए बैठी। उस चिट्ठी को उसने बाद में खुद ही वापस पाया ‘पता गलत है’ की मुहर के साथ। अब वो राखियाँ उसकी डायरी का हिस्सा बन गई थीं। एक-एक राखी को देखकर उसकी आँखें भर आतीं। गाँव के बच्चों से घिरे हुए भी वो अकेली महसूस करती थी।
स्कूल में पढ़ाना रमा के लिए केवल रोजगार नहीं था, बल्कि एक समर्पण था- एक प्रयास उस अधूरेपन को भरने का, जो विक्की की अनुपस्थिति से उसके भीतर घर कर गया था। वह हर बच्चे में विक्की की झलक तलाशती थी। किसी की शरारत में, किसी की मासूम जिज्ञासा में, किसी की भूख में, वह अकसर रुक जाती जैसे विक्की उसके सामने खड़ा हो।
शायद इसी स्नेह और समर्पण ने ही उसे उस पहचान तक पहुँचाया, जब साल 2025 में एक दिन अचानक उसे एक सरकारी पत्र मिला। पत्र में लिखा था आपको राज्य स्तरीय आदर्श शिक्षिका सम्मान हेतु दिल्ली आमंत्रित किया जाता है। यह उसकी जिÞंदगी का पहला ऐसा अवसर था जब वह गांव से बाहर, दिल्ली जा रही थी ट्रेन से, अकेले। स्टेशन पर कदम रखते ही उसे बरसों पहले का वह दृश्य याद आ गया जब उसने विक्की को पहली बार स्टेशन तक छोड़ा था। जाते-जाते बोला था दीदी, जब मैं बड़ा अफसर बनूंगा, तब तुम्हें लेने मैं खुद आउंगा।
दिल्ली के होटल में जब वह पहुंची, तो समारोह की हलचल के बीच मंच से गूंजती एक आवाज उसके कानों में जैसे ठहर गई, वह आवाज… बहुत जानी-पहचानी थी। मंच पर जो मुख्य वक्ता था, वह था विक्रम राठौर, जोकि उसका भाई था जिसका छोटा नाम विक्की था। रमा की आँखें भर आर्इं। यही तो उसका विक्की था। उसी की आँखों वा, उसी के लहजे वाला! बस, अब ज़िंदगी की धूप में थोड़ा तपकर और गंभीर हो गया था।
कार्यक्रम खत्म होने के बाद, वह चुपचाप एक कोने में बैठी रही ना कुछ बोल पा रही थी, ना आगे बढ़ पा रही थी। तभी एक सज्जन धीरे से पास आए और आदरपूर्वक बोले, आप रमा हैं? तो उसने हल्के से सिर हिलाया। वो व्यक्ति बोला, मैं विक्रम सर का सहयोगी हूँ। सर ने कहा था कि यदि रमा दीदी मिलें, तो ये लिफाफा उन्हें दे देना। काँपते हाथों से रमा ने लिफाफा खोला। उसमें एक पत्र था और एक पुरानी राखी।
पत्र: दीदी, पता है, मैंने जानबूझकर आपसे सम्पर्क नहीं किया। इसलिए नहीं कि मुझे तुमसे कोई शिकायत थी, बल्कि इसलिए कि मुझे खुद से शर्म थी। तुमने सब कुछ छोड़कर मुझे बड़ा किया और मैंने क्या किया? सफलता मिलते ही सबसे पहले तुम्हें भूल गया। पर सच तो यह है कि तुम्हारी भेजी हर राखी मैंने संभाल कर रखी। मैं हर साल छत पर जाता, वहीं दिशा में मुंह करके तुमसे क्षमा मांगता। दीदी, तुम अब भी वहीं हो वहीं भावनाओं के आँगन में। और मैं खो गया हूँ कांच के इस शहर में। मैं आऊंगा दीदी- इस बार जरूर आऊंगा। तुम्हारा- वो छोटा विक्की।
रमा की आँखों से अश्रुधारा बह निकली। उसने पत्र को सीने से लगा लिया। उसका मन शांति से भर गया, जैसे कई वर्षों का बोझ उतर गया हो। अगले दिन वह अपने स्कूल लौटी। बच्चों के साथ राखी मनाई। गाना गाया- राखी की डोरी से बंधा, हर दिल का प्यार…। तभी एक गाड़ी वहां आकर रुकी। सफेद कुर्ते में, चश्मा लगाए, हल्की दाढ़ी और हाथ में राखी की थाली लिए खड़ा था- विक्की।
रमा की आँखें छलक आईं। वो कुछ कह नहीं पाई। विक्की ने आगे बढ़कर झुकते हुए कहा- दीदी, मुझे फिर से कलाई पर वो धागा बंधवाना है। रमा ने उसे गले लगा लिया- इतने सालों की राखियाँ आज एक साथ बाँधूंगी। विक्की ने अपने फ्लैट का एक कमरा रमा के लिए सजाया। रमा अब हर रविवार बच्चों को आॅनलाइन पढ़ाती है। वो राखी अब सिर्फ त्यौहार नहीं, हर दिन की स्नेह-रेखा बन चुकी है।
सावन की नमी अब सूनी नहीं लगती। नीम के नीचे बैठी रमा की आँखों में अब इंतजार नहीं, अपनापन झलकता है। क्योंकि राखी का सूना धागा, अब फिर से प्रेम से भीग चुका है। -प्रियंका सौरभ


































































