Old Age: नज़रिया रखें पॉज़िटिव ताकि न सताए बुढ़ापा
बुढ़ापे में अक्सर लोग हिम्मत हार जाते हैं। कोई बीमार हो होता है, कोई चिड़चिड़ा हो जाता है, किसी को घर-परिवार के लोग ही अच्छे नहीं लगते, कोई परिवारजनों के हर काम में अड़चनें पैदा करते हैं। कहने का मतलब बुढ़ापे में इन्सान को अपना जैसा जीवन जीना चाहिए, इन्सान वैसा कर नहीं पाता। इसका सबसे बड़ा कारण होता है इन्सान की सोच, उसका नज़रिया। यदि बुढ़ापे के समय में इन्सान अपनी सोच, अपने नज़रिये को सकारात्मक रखते हैं, तब इन्सान को बुढ़ापे का अहसास ही नहीं होता और इन्सान अपना खुशनुमा जीवन व्यतीत करता है।
विश्व की सबसे अधिक पढ़ी जाने वाली प्रेरक पुस्तकों में शामिल ‘द पावर आॅफ योर सबकॉन्शियस माइंड’ के लेखक जोसेफ मर्फी के अनुसार, ‘अवचेतन मन एक ऐसे खजाने की तरह है, जो व्यवहार, आत्मविश्वास और जीवन के अनुभवों को प्रभावित करता है।’ कहने का मतलब यह है कि परिस्थियाँ चाहे जैसी भी हों, जीवन काल अंतिम दौर में हो, फिर भी यदि आपका आत्मविश्वास प्रबल है, आपकी सोच उत्तम व सकारात्मक है, तब आप बुढ़ापे में भी जवानी-सा अनुभव कर सकते हैं।
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शरीर बूढ़ा होगा, पर मानसिक रूप से बूढ़े न हों:
जो लोग जिज्ञासु होते हैं, जिनमें सीखने की इच्छा और भविष्य के लिए उत्साह बनाए अधिक होता है, ऐसे लोग अक्सर अधिक संतुष्ट और सक्रिय रहते हैं। इसलिए हमेशा अपने मन में कुछ नया सीखने की आदत बनाते रहें।
अवचेतन मन के विचारों से बचें:
अवचेतन मन सही और गलत का फैसला नहीं करता। वह केवल उन विचारों को ही स्वीकार करता है, जिन्हें हम बार-बार दोहराते हैं। खुद को स्वस्थ, आत्मनिर्भर खुश रहने की सोचें। परिवार के साथ अच्छे समय, यात्रा, सेवा कार्य या किसी नए लक्ष्य की कल्पना करें। यह दृष्टिकोण आत्मविश्वास और जीवन के प्रति उत्साह बनाए रखने में मदद करेगा।
जैसी सोच वैसा मन:
अवचेतन मन कल्पना और वास्तविकता के बीच बहुत स्पष्ट अंतर नहीं करता है, इसलिए जीवन में सकारात्मक मानसिक चित्र महत्वपूर्ण माने जाते हैं। यदि आप रोज़ सोचते हैं कि अब मेरी उम्र हो गई है, मैं कुछ नहीं कर सकता, तो मन उसी दिशा में काम करेगा। लेकिन यदि आप कहें कि मैं आज भी सीख सकता हूँ, सक्रिय रह सकता हूँ, तो मन नई ऊर्जा पैदा करने लगता है।
नियमित व्यायाम:
उम्र का कोई भी पड़ाव क्यों न हो, शारीरिक व्यायाम, थोड़ी एक्सरसाईज, योगा करना सदा फायदेमंद होता है। बुढ़ापे में रोजाना 30 मिनट तक सैर (टहलना) जरूर करनी चाहिए। यह दिल को मजबूत बनाता है और पैरों में दर्द नहीं होने देता। साथ ही सुबह-शाम व्यायाम करने से दिलो-दिमाग में सकारात्मक विचार आते हैं।
अच्छी आदतों को कभी न छोड़ें:
बचपन, जवानी के समय से ही आपमें कुछ अच्छी आदतें रही होंगी! जैसे किताबें पढ़ना, बागवानी करना, संगीत सुनना, कुछ नया सीखना इत्यादि। अपनी ऐसी आदतों को बुढ़ापे में भी बनाए रखें। इससे आप न सिर्फ स्वयं सक्रिय अवस्था में रहेंगे, बल्कि दूसरे आपकी इन अच्छी आदतों का अनुसरण करेंगे।
































































