Experiences of Satsangis

तुम्हारी दुकान बंद नहीं होगी… -सत्संगियों के अनुभव – पूजनीय बेपरवाह सार्इं शाह मस्ताना जी महाराज का रहमोकरम

बहन कौशल्या देवी पुत्री श्री मक्खन लाल पुत्र श्री राम किशन, निवासी सुचान कोटली जिला सरसा, हाल आबाद मंडी डबवाली जिला सरसा अपने ऊपर पूजनीय शहनशाह मस्ताना जी महाराज की हुई अपार दया-मेहर का वर्णन इस प्रकार करती हैं कि- करीब 1958 की बात है, मैं उस समय अविवाहित थी और अपने माता-पिता के पास सुचान कोटली में रहती थी। एक बार जब पूजनीय बेपरवाह शहनशाह मस्ताना जी महाराज हमारे गाँव में सत्संग करने पधारे, तो सच्चे पातशाह जी सबसे पहले वैद्य गोबिंद राम जी के घर पधारे। उनके चौबारे में ही बेपरवाह जी का उतारा था। सत्संग भी उसी दिन का था।

जब पूज्य शहनशाह जी वहाँ से सत्संग करने के लिए चलने लगे तो आपजी के स्वागत में प्रेमी काशी राम व उसका भाई जगमाल दोनों ढोल बजा रहे थे और वैद्य गोबिंद राम नाच रहा था। बल्कि वैद्य जी का सारा परिवार ही नाच उठा और संगत भी नाचने लग गई। उनमें एक प्रेमी सिर पर खाली घड़ा रखकर हाथ छोड़कर नाच रहा था। शहनशाह जी यह नज़ारा देखकर बहुत खुश हुए और वचन फरमाया- ‘बल्ले-बल्ले! तू की नाचता है। तेरे को तो माया नचाती है। कोई रन का यार! कोई धन का यार! सतगुरु का यार तो कोई नहीं।’ परम दयालु दातार जी ने उसको सोने का एक डालर दिया। ढोल बजाने वाले दोनों भाइयों को सतगुरु जी ने नोटों के हार पहनाए व वचन फरमाया, ‘सदा ही तुम्हारे ढोल बजेंगे।’ सच्चे पातशाह जी ने बहुत जबरदस्त सत्संग फरमाया व अनेकों अधिकारी जीवों को नाम की अनमोल दात बख्शी।

उसी सत्संग पर हमारे सारे परिवार ने भी नाम-शब्द ले लिया था, पर मैंने नाम-शब्द नहीं लिया, क्योंकि मैंने अपने घर वालों से पूछा नहीं था। जबकि नाम लेने की मेरी बहुत जबरदस्त इच्छा थी। सत्संग की समाप्ति के बाद मेरे पापा जी मुझे कहने लगे कि बेटा! तूने नाम क्यों नहीं लिया! तो मैंने कहा कि पापा, मैं आपसे पूछे बगैर कैसे नाम ले सकती थी। परम दयालु दातार जी ने वैद्य गोबिंद राम जी को वचन किए, ‘बोल! तुझे माया चाहिए या राम!’ वैद्य गोबिंद राम जी ने हाथ जोड़कर अर्ज़ की कि सार्इं जी, मुझे माया नहीं चाहिए,

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पर मेरी दुकान बंद न होवे। सर्व सामर्थ दातार जी ने वचन फरमाए – ‘तेरी दुकान बंद नहीं होगी।’ उसके बाद वैद्य जी की दुकान पर मरीजों की भीड़ हर समय लगी रहती। कभी-कभी तो उसको खाना खाने तक का भी समय नहीं मिल पाता था। वैद्य गोबिंद राम भी अक्सर यही कहा करते थे कि मुझे बेपरवाह सार्इं मस्ताना जी के वचन हैं, इसीलिए दुकान पर भीड़ लगी रहती है। मैं अपने लड़के का भी ख्याल नहीं रख पाता हूँ, मैं अब क्या करूँ! वैद्य जी पहले काफी गरीबी में जीवन जी रहे थे, पर मालिक की रहमत व वचनों से मालामाल हो गए थे। उनके पास पैसों की कोई कमी नहीं रही। एक बार प्रेमी जगमाल ने बेपरवाह जी के पवित्र चरणों में अर्ज़ की कि सार्इं जी, आप बड़ों के जाते हो, गरीबों को नहीं पूछते। यह सुनते ही पूज्य सार्इं जी ने वचन फरमाए- ‘नहीं कुत्ते! अरे! ऐसा नहीं है (पूजनीय सार्इं जी उस भाई के मन को कुत्ता बोल रहे थे, क्योंकि मन कुत्ते ने ही उससे बेपरवाह सार्इं पर यह उंगली उठवाई थी), सुनो! बड़ों को पकड़ेंगे तो इनसे काम लेंगे। बड़े सत्संग करवाएंगे तो गरीबों का भी भला होगा। तू किसी को पानी नहीं पिला सकता, गरीब आदमी है। तू सेवा कैसे करेगा तुझे जब वास्तविकता का पता ही नहीं है। तुम्हारी संभाल सतगुरु ने करनी ही करनी है।’

उस दिन की बात है, मैं अपने घर में सोई हुई अर्धनिंद्रा में थी, तो मुझे एकदम प्रकाश दिखाई दिया और एक तेज नूरानी प्रकाश में ही मुझे बेपरवाह मस्ताना जी महाराज के दर्शन हुए। बेपरवाह जी एक बहुत ही सुंदर बाग के अंदर एक मूढ़े पर विराजमान हैं। अंतर्यामी सतगुरु जी ने मुझे अपने चरणों में अपने पास बिठा कर नाम-शब्द दे दिया और मुझे उसी समय नाम-शब्द याद भी हो गया। इसके उपरांत शहनशाह जी उसी पल अलोप हो गए। मुझे उस समय जो खुशी मिली मैं उसका वर्णन लिख-बोलकर नहीं कर सकती।

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अगले दिन सच्चे पातशाह जी ने सुचान मंडी में सत्संग फरमाया। सत्संग के उपरांत बेपरवाह जी ने नामाभिलाषी जीवों को नाम-शब्द की बख्शिश की। मैंने भी उसी समय नाम-शब्द ले लिया, क्योंकि मेरे पापा जी ने नाम के बारे खुद बोल ही दिया था। वही सपने वाला हू-ब-हू दृश्य, सब कुछ वही था। नाम-शब्द भी वही था, जो सतगुरु जी ने मुझे सपने में बताया था। यह सब कुछ देखकर मैं हैरान रह गई। मुझे सतगुरु जी की असीम शक्ति का उसी समय अहसास हो गया था।

उस दिन सच्चे पातशाह जी ने दो प्रेमियों की कुश्ती भी करवाई थी, जो प्रेमी कुश्ती में जीता उसे शहनशाह जी ने चांदी का डॉलर दिया और जो हार गया था उसे सोने का डॉलर प्रेम निशानी के तौर पर प्रदान किया। मुझ निमाणी पर सदा ही परम दयालु सतगुरु जी की अपार कृपा रही है। जिंदगी में जब भी कभी कोई मुसीबत आई तो सतगुरु जी ने मुझे उसी समय अपना सहारा दिया। मुझे शहनशाह मस्ताना जी महाराज खुद पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज और पूज्य हजूर पिता संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां के स्वरूप में दर्शन देते रहते हैं।

पूर्ण सतगुरु जीव को कोई भी नज़ारा दिखा सकता है। यह जीव की इच्छा शक्ति, तड़प व विश्वास पर निर्भर करता है। पूर्ण सतगुरु अपने शिष्य को उसकी इच्छाशक्ति, सच्ची तड़प तथा दृढ़-विश्वास को देखते हुए उसकी तसल्ली व विश्वास दिलवाने के लिए नज़ारों की कोई कमी नहीं छोड़ता, बल्कि वह तो हर समय अपने शिष्य के लिए खु्रशियों की बरसात करता रहता है। अगर शिष्य अपने सतगुरु के आगे अपनी झोली फैलाए तो सतगुरु उसमें वह रहमत डाले। वो तो दोनों हाथों से अपनी रहमतें लुटाने को उतावला है, कोई लेने वाला, कोई सच्चा साधक ही अपनी झोलियाँ भरवा लेता है।