Avoid the pressure

Avoid the pressure: लोग क्या कहेंगे, इसके प्रेशर से बचें -अपने सपनों के साथ जीएं, दुनिया के डर से नहीं

अपने आस-पास नज़र दौड़ाएं तो हमें ऐसे लोगों का एक बड़ा आंकड़ा मिल जाएगा जो अनावश्यक रूप से लोगों की बातों का डर अपने जेहन में बसाए रखते हैं। इसी डर की वजह से वो आगे नहीं बढ़ पाते। अपने दिमाग में वो इस कदर इन बातों को बैठा लेते हैं जैसे कि कोई उनकी राह रोके खड़ा हो। कुछ नया सीखना हो, कुछ हटकर करना हो, कई तो इसी कारण नहीं कर पाते कि लोग क्या कहेंगे। हमारे पड़ोस में रहने वाली योगिता को ही लें।

वह एक गृहणी है। बच्चे पास के ही स्कूल में पढ़ने जाते हैं। उसका मन होता कि वो स्कूटी सीख ले ताकि बच्चों को स्कूल छोड़ना आसान हो जाए तथा छोटे-मोटे काम भी खुद ही कर लिया करे। उसकी सहेलियां सब कुछ अपने आप कर रही थी। उनको देख कर उसका भी बड़ा मन था कि वो भी स्कूटी सीख ले। मगर लोग क्या कहेंगे, मैं कैसे सीखूंगी, मुझे कौन सिखाएगा इत्यादि बातों से उसका मन घिरा रहता। उसको सहेलियां भी कह चुकी थीं परंतु भीतर की झिझक से वो चाह कर भी यह नहीं कर पा रही थी। मानो वह एक कुंठा में जीअ रही थी।

आखिर एक दिन उसके पति ने उसकी काउसलिंग की। उसको समझाया। बच्चों ने भी पूरा हौंसला दिया। सबने अपना पूरा जोर लगाया तो वो स्कूटी सीखने को तैयार हो गई। बड़ी मुश्किल से उसने अपने अंदर की उस झिझक को हटाया जो उसके लिए रूकावट बनी हुई थी। उसने अपने मन को मजबूत बनाया। आहिस्ता-आहिस्ता स्कूटी को चलाना शुरु किया और आठ-दस दिनों में वो स्कूटी चलाना सीख गई।People

अब दो साल हो गए वो अपने बच्चों को खुद स्कूल छोड़ आती है और ले आती है। बाज़ार से भी जब चाहे अपना सामान ले आती है। अब सोचो योगिता जो अपने मन के डर से जो कुछ नहीं कर पा रही थी, अब उसे किसी का कोई डर नहीं था। उसने बेवजह लोगों का डर मन में बैठा रखा था। इसी डर से वो योग्य होते हुए भी अयोग्य बनी हुई थी।

दुनिया की बातों का क्या

वास्तव में लोगों को किसी से क्या लेना-देना। कोई कुछ भी करे, किसी को उससे कोई वास्ता नहीं होता। ये व्यक्ति खुद ही मनगढंत चीजों को पैदा कर लेता है जिसका खामियाजा भी वो भुगतता रहता है। बाकी लोगों का क्या कहना। दुनिया का काम ही कहते रहना है। जिसने जो कहना है कहता रहे। कहने वाला कहता रहता है और इससे बेपरवाह होकर, करने वाला अपना काम करता है और आगे बढ़ता जाता है।

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हमने जो सपने देखे हैं, उसके साथ जीना चाहिए। उन सपनों को दुनिया को देख दबाएं नहीं अपितु उनके साथ आगे बढ़ें। आपको लगता है मैं यह कर सकता हूँ। मैं इसे दूसरों से बढ़कर कर सकता हूँ। इसे बस मन में सोचते हुए यूँ ही समय ना व्यतीत करें बल्कि बेहतर यही है कि इसे कर डालें। गुज़रा हुआ वक्त फिर हाथ नहीं आता। दुनिया की बातों की परवाह न करें। जो समाज के लिए, अपने लिए अच्छा लगे उसे करने से कतराएं नहीं। उसे नि:संकोच कर डालें। अपने मन को मजबूत बनाएँ और एक जिद्द के साथ अपने काम को कर डालें। लोगों की ओर ध्यान न दें। आप जब सफल होंगे तो लोग आप को सम्मान की नज़र से दखेंगे।

जेन-जी में बढ़ रहा डर

आज की पीढ़ी के बारे एक रिपोर्ट में सामने आया कि इस जनरेशन के लोग बड़े आशंकित रहते हैं। तमाम तरह की निर्मूल शंकाओं में वो घिरे रहते हैं। वो अपने आपको जज किए जाने से बचते हैं। उन्हें यही डर रहता है कि कोई उन्हें जज करेगा तो उसके बारे पता नहीं क्या सोचेगा। यह लिंक्डइन के द्वारा किया गया एक सर्वे है जो जेन-जी को लेकर किया गया था। लिंकडइन के द्वारा अलग-अलग देशों में 18050 कामकाजी लोगों के बीच यह सर्वे किया गया। इसमें यही बात खुलकर सामने आई कि जेन-जी (14-29 की उम्र) सोशल मीडिया पर ज्यादा वक्त गुजारते हैं। पर वो सामने आने से बचते हैं। वो अपने करियर को लेकर भी आशंकित रहते हैं।

सर्वे के प्रमुख निष्कर्ष

44% को डर रहता है कि लोग उन्हें गलत आंकेंगे।

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37% पहले इंटरव्यू या नौकरी मिल जाने पर बातचीत नकली-सी ना लगे, इसका डर सताता है।

83% अपने प्रोफेशनल करियर के लिए बड़ों से बातचीत करने से बचते हैं।

रिपोर्ट के अनुसार जेन एक्स (46-61 की उम्र) जेन-जी से बेहतर स्थिति में है। वो खुलकर बात करने को तैयार रहते हैं। मिलेनियल्स (30-45 की उम्र) व जेन एक्स की बात कुछ और है।

बस, जेन-जी को यही डर है कि उनको जज न किया जाए कि वो योग्य हैं या नहीं। रिपोर्ट के अनुसार जेन-जी करियर के लिए प्रोफेशनल लोगों से नेटवर्क बनाने में झिझकती रहती है। उनको अपने बॉस या सीनियर के सामने जाने में कठिनाई महसूस होती है। इसका सीधा सा अर्थ है कि अपने अवसर को गंवा बैठना। वो पहले ही इस अवधारणा से घिरे रहते हैं कि पता नहीं उनको सुना जाएगा या नहीं। वो अपनी योग्यता को सही से भांप भी नहीं पा रहे।

अपने नेटवर्क व कामकाजी लोगों के बीच दायरा नहीं बढ़ा पा रहे जिससे वो काबिल होते हुए भी पीछे रह जाते हैं। सिंगापुर, आॅस्ट्रेलिया, इटली, ब्राजील, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी व अमेरिका आदि देशों में हुए इस सर्वे ने इस युवा पीढ़ी के मन में बैठे इस डर कि ‘लोग क्या कहेंगे’ को उजागर किया है। एक्सपर्ट बताते हैं कि यह पीढ़ी अच्छी सलाह, नए कनेक्शन और बड़े मौकों से खुद ही दूर हो जाती है जबकि स्क्रीन पर 24 घंटे मौजूद रहना इसी जनरेशन की पहचान है।

लोगों की बातों से डरो नहीं। मन में जो वहम है उसे निकाल दो और अच्छे कार्यों के लिए आगे बढ़ो। कोई क्या कहता है, सोचो ना। लोग तो किसी को नहीं छोड़ते। कोई अच्छे कपड़े पहन लेता है तो भी नहीं छोड़ते। अगर वो फटे-पुराने कपड़ों में है तो भी नहीं छोड़ते। इसलिए दुनिया की बातों पर ना जाओ। प्रभु का नाम लेते रहो और अपने मार्ग पर मस्ती से चलते रहो। -पूज्य गुरु संत डॉ. एमएसजी

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