Children's Story

Children’s Story: बाल कथा: जम्पी कंगारू और संतोषी गधा

एक समय की बात है। एक हरा-भरा खेत था। वहाँ धीरू नाम का एक संतोषी गधा रहता था। वह बहुत शांत, अपने काम के प्रति भावनाशील और धीमी गति से चलने वाला था। वह कभी भागदौड़ की बात नहीं करता था। उसका सिद्धांत था, ‘जहां भी जाएंगे, पहुंच ही जाएंगे। धीरे चलें, लेकिन सही तरीके से चलें।’

एक दिन जंगल में एक नया मेहमान आया। उसका नाम था, जम्पी कंगारू। उसे कूदना-फांदना बहुत पसंद था। वह ऊंची-ऊंची छलांग लगाता और फुटबाल की तरह उछल-कूद कर आनंद लेता। जंगल के सभी पशु-पक्षी इस नए मेहमान को देखकर आश्चर्यचकित हो गए। जम्पी कंगारू ने संतोषी गधे से कहा, ‘तुम्हारी चाल तो बड़ी अजीब है। तुमसे तो पत्थर भी ज्यादा तेज आगे बढ़ सकता है।’

संतोषी गधे ने धीरे से उत्तर दिया, ‘जरूरत से ज्यादा अधीर नहीं होना और अत्यधिक महत्वाकांक्षी नहीं बनना, उसे मेरे जैसा, संतोषी बनना चाहिए। धीमी और स्थिर गति अच्छी होती है। इस भागदौड़ भरे जीवन का क्या लाभ?’ जम्पी को यह बात समझ में नहीं आई। उसने चुनौती देते हुए कहा, ‘चलो, मुकाबला करते हैं। मेरे साथ पहाड़ की चोटी तक चलो, देखते हैं कौन पहले पहुंचता है।’ संतोषी कुछ देर चुप रहा और फिर मान गया।

जम्पी फुटबाल की तरह उछलता हुआ आगे बढ़ने लगा। वह बारबार ऊंची छलांग लगाता, बीच-बीच में थक जाता, कभी उसका पैर फिसल जाता, कभी वह हांफने लगता और पसीना-पसीना हो जाता। दूसरी ओर संतोषी गधा धीरे-धीरे चलता रहा, एक-एक कदम आगे बढ़ाता हुआ, पूरी एकाग्रता के साथ। पहाड़ के पत्थरों के बीच भी उसकी सहनशक्ति देखने लायक थी।

Also Read:  Dal Dhokla: दाल ढोका 

आधे रास्ते में ही जम्पी बहुत थक गया। उसे रास्ते में पानी भी नहीं मिला। दौड़ने की धुन में वह रास्ता भी भूल गया और गलत दिशा में भटक गया। तभी संतोषी वहाँ पहुँच गया। जम्पी ने अपनी हार स्वीकार कर ली और हांफते हुए कहा, ‘मैं हार गया, लेकिन तुम कैसे जीत गए?’ संतोषी ने शांत स्वर में कहा, ‘मैं अभी जीता नहीं हूँ। मैं तो बस आगे बढ़ रहा हूँ और खुशी-खुशी यह गीत गा रहा हूँ ‘आगे बढ़ हे जवान, पीछे न रुकना कभी।’ मुझे पता है कि मेरी सीमाएं क्या हैं और मेरी दिशा सही है या नहीं।’

जम्पी ने कहा, ‘लंबी छलांग लगाना मेरी आदत है। यह मेरी प्रकृति में है लेकिन अधिक उत्साह और जल्दबाजी में मैं अपनी दिशा और रास्ता दोनों भूल गया।’ कमजोर मानी जाने वाली जाति में जन्म लेने के बावजूद संतोषी ने धैर्य, निरंतर प्रयास और आत्मसंयम के बल पर अपनी यात्रा जारी रखी और अपने लक्ष्य पर ध्यान बनाए रखा। वह स्थिर मन और ईश्वर पर विश्वास के साथ आगे बढ़ता गया।

सीख: संतोष और स्थिरता सफल जीवन के सर्वोत्तम गुण हैं। जल्दबाजी करने वाले मूर्ख होते हैं, जबकि धैर्यवान गंभीर होते हैं। धैर्य का फल हमेशा मीठा होता है। -वीरेन्द्र बहादुर सिंह

कोई जवाब दें

Please enter your comment!
Please enter your name here