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love: प्रभु प्रेम में सच्चा समर्पण

जब कोई इन्सान भक्ति की राह पर चलता है तो उसके लिए जरुरी हो जाता है कि वह अपने इस राह पर अडिगता से चलता रहे। भले ही उसकी यह राह कठिनाइयों से भरी हो। उसे सच्चे मन से यह स्वीकार करना होगा कि मेरा भगवान जो भी करता है मेरा उसी में भला है। अपने भगवान को अपना हमसफर बनाकर चलना ही इस राह से गुज़र जाने का सफल साधन है। यही एक स्त्रोत है। वरना अपने आप चलने वाला कभी मंजिल तक पहुँच नहीं सका।

अपने गुरु, पीर-फकीर के प्रति एक समर्पित भावना व दृढ़ विश्वास के साथ सदैव चलते रहना ही एक भक्त का निशाना होता है। इस बात की समझ भी इन्सान को पूर्ण सतगुरु के सत्संग से ही आती है। सत्संग में आने से ही इन्सान के ज्ञान चक्षु खुलते हैं और वह अडिगता से, समभाव से निरंतर परमार्थ की राह पर चलता रहता है। कोई कठिनाई, विपदा उसको बाधित नहीं कर सकती। समय का दौर कितना भी मुश्किलों भरा चल रहा हो, सम्पूर्ण समर्पित भाव से युक्त भक्त जन कभी टस से मस नहीं होते।

इस बारे में पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां अपने अमृतमयी वचनों में जीव को समझाते हैं कि सच्चा भक्त अपने सत्य की राह पर पूरे विश्वास के साथ चलता है। वह अपने गुरु, जिसे वह अपना भगवान मान चुका है उससे कभी विमुख नहीं होता।

इस बारे में पूज्य गुरु जी रामायण के एक प्रसंग पर प्रकाश डालते हैं कि एक भक्त का चरित्र हनुमान जी की तरह उच्चकोटि का होना चाहिए जैसे हनुमान जी अपने आराध्य श्रीराम जी के अनन्य भक्त थे। उनकी आस्था, श्रद्धा श्रीराम जी के प्रति अतुलनीय थी। श्रीराम जी के प्रति उनका समर्पण भाव आज भी प्रासंगिक है। युद्ध में एक बार श्रीराम जी व लक्ष्मण जी नागपाश में मूर्छा की अवस्था में चले गए थे। यह दृश्य बड़ा भयावह था।Love and compassion is mother

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इससे युद्ध का पासा ही पलटता दिखाई दे रहा था। श्रीराम जी की पूरी सेना में मायूसी छा गई और दूसरी तरफ राक्षसी सेना में जैसे जीत का बिगुल बज गया था। इस युद्ध के दोनों मुख्य किरदार अचेत पड़े थे। ये देख जामंवत, सुग्रीव, विभीषण, नल-नील, अंगद आदि सब शोक में डूब गए। सबको लगा कि अब अनर्थ हो गया है। अब इसका कोई हल नहीं होगा। उन सबकी सांसें फूल गई और हार दिखाई देने लगी। ऐसे में हनुमान जी को चैन कहाँ आने वाला था। बैचेनी का आलम इतना था कि अपने प्रभु के बिना जैसे उनका जीवन मुश्किल हो गया था।

हनुमान जी अपने प्रभु की सलामती को तड़प उठे। पूज्य गुरु जी फरमाते हैं कि कोई कच्चा या दिखावे वाला होता तो भाग खड़ा होता कि अब वो खुद ही नहीं रहे, मेरा क्या होगा। लेकिन वो तनिक भी नहीं डगमगाए। उनका विश्वास और भी प्रबल हो गया कि नहीं मेरे प्रभु महान हैं। यह उनकी कोई लीला है। वो जरूर उठेंगे, हनुमान जी अपने इस विश्वास के साथ उनको नागपाश से आजाद करने के चिंतन से व्याकुल हो उठे।

वो बिना समय गंवाए गरूड़ जी के पास गए और अनुनय-विनय करके उनको लेकर आ गए। देखते ही देखते गरुड़ जी ने वो नागपाश का जंजाल काट दिया और श्रीराम जी व लक्ष्मण जी मूर्छा से बाहर आ गए। जैसे ही श्रीराम जी की आँखें खुली तो हनुमान जी की खुशी का ठिकाना न रहा और बोले, भगवन आप सलामत हो न।

हे कृपा निधान! आपकी सलामती सर्वोपरि है। वहीं गरुड़ भी विनम्र भाव से कहने लगे, हे प्रभु! आप धन्य हो। मुझे सेवा का अवसर प्रदान किया। मैं कृतार्थ हो गया। यहां विचारणीय तथ्य यह है कि खुद हनुमान जी गरुड़ को लेकर आए और नागपाश से मुक्त करवाया और खुद ही अपने भगवन के सामने हाथ जोड़े खड़े हैं। ये होता है सच्चा प्यार, सच्चा समर्पण। इतने बड़े काम के लिए उन पर ‘मैं’ का लेशमात्र भी प्रभाव नहीं। सब कुछ ‘तू ही तू’ है। …और आजकल ऐसा मिलना दुर्लभ है।

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पूज्य गुरु जी ने फरमाया कि ऐसा भी दौर आया, साध-संगत ने भी देखा बड़ों-बड़ों की हवा निकल जाती है। अपने-आपको नन्ने खां, फन्ने खां कहने वाले फुस्स हो जाते हैं। साध-संगत ने भी देखा कि कौन उनके साथ उस वक्त खड़ा था। समय के इस दौर ने दिखा दिया कि कौन अपना है और कौन नहीं।

दुनियावी गाने का उदाहरण देते हुए पूज्य गुरु जी ने बड़े स्पष्ट शब्दों में फरमाया कि ‘जेहड़े कहंदे सी मरांगे नाल तेरे, चड़ गए रात दी गड्डी।’ परंतु सच्चे भक्त अपने मार्ग से कभी टस से मस नहीं होते। बल्कि वो सोने की तरह आग में से गुज़र कर और भी निखर जाते हैं। -डेस्क

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