Fast food

Fast food: स्वाद का फंदा दवाइयों की बैसाखी

आज अगर शाम के वक्त किसी भी शहर या कस्बे की चौपाटी, चौराहों या ठेलों के आसपास नजर दौड़ाई जाए, तो वहां उमड़ने वाली बेकाबू भीड़ किसी उत्सव का भ्रम पैदा करती है लेकिन जरा ठहरकर सोचिए, क्या यह वाकई जिंदगी का जश्न है? या फिर हम जाने-अनजाने अपनी ही सेहत की बलि चढ़ाने के लिए कतार में खड़े हैं?

मसालों और तेल से लथपथ, घटिया स्तर के रंगों और रसायनों से तैयार जिस भोजन को लोग ‘जीभ के स्वाद’ और ‘लाइफ का एंजॉयमेंट’ मानकर गले तक ठूंस रहे हैं, वह असल में बीमारियों का धीमा जहर है। आज समाज का एक बड़ा वर्ग स्वास्थ्य के प्रति चरम सीमा तक लापरवाह हो चुका है। खाने लायक क्या है और क्या नहीं, इसका फर्क खत्म होता जा रहा है। नतीजा – कम उम्र में ही अनगिनत गंभीर बीमारियों की चपेट में आते लोग। -रमेश सारस्वत

आज चारों तरफ एक बेहद खतरनाक और खोखली मानसिकता पांव पसार चुकी है: “दुनिया में आए हैं तो खा-पीकर जाएंगे, जिंदगी में और रखा ही क्या है?” या फिर “अरे! बीमार पड़ेंगे तो डॉक्टर और दवाइयाँ किस दिन काम आएंगी?” दवाई खाकर सब ठीक कर लेने का यह भ्रम इंसान को अंदर ही अंदर घुन की तरह चाट रहा है।

food यह सोच न केवल गंदी है, बल्कि आत्मघाती भी है। लोग भूल रहे हैं कि गोलियां और कैप्सूल शरीर को केवल किसी तरह चलने लायक बना सकते हैं, वे प्राकृतिक स्वास्थ्य का विकल्प कभी नहीं हो सकते। हर रोज मुट्ठी भर दवाइयां खाकर जीना कोई जीवन नहीं, बल्कि बीमारियों के साथ किया गया एक दुखद समझौता है।

स्वाद या बीमारियों का आमंत्रण?

चौपाटियों और ठेलों पर जलते री-यूज्ड तेल (बार-बार उबाला गया तेल), अत्यधिक मिर्च-मसाले, और बासी सामग्रियों से सजते व्यंजन सिर्फ स्वाद ग्रंथियों को तृप्त करते हैं, लेकिन अंदर जाकर हमारी आंतों, लिवर और दिल पर भयानक प्रहार करते हैं। आज छोटी-छोटी उम्र में एसिडिटी, फैटी लिवर, हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज़ और यहाँ तक कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का ग्राफ जिस तेजी से ऊपर चढ़ रहा है, उसका एक बड़ा कारण यही बेलगाम खान-पान है।

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असली आनंद शरीर के स्वस्थ और ऊर्जावान होने में है, न कि जीभ को चटकारे देकर अगले दिन डॉक्टर के क्लिनिक के बाहर लाइन लगाने में। जीवन का आनंद अपनों के साथ एक निरोगी और खुशहाल लंबा जीवन जीने में है न कि गलत आदतों की वजह से समय से पहले अपनों को रोता-बिलखता छोड़ जाने में।

समय रहते जागना ही एकमात्र विकल्प

  • स्वाद के लिए नहीं, शरीर के पोषण के लिए खाना सीखें।
  • ‘दवाई से सब ठीक हो जाएगा’ वाले इस आत्मघाती भ्रम से बाहर निकलें।
  • घर के सादे और पौष्टिक भोजन को प्राथमिकता दें और चौपाटियों के घटिया खान-पान से दूरी बनाएं।

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