Medicines

Medicines: बीमारियों का एक मात्र हल नहीं दवाएं

जिन्हें स्वास्थ्य की थोड़ी-सी भी चिंता है, वे संयम बरतते हैं, आहार-विहार में संतुलन बनाए रखते हैं तथा दवाओं से विशेषकर एलोपैथिक दवाओं से परहेज रखते हैं। जो प्रकृति के नियमों का पालन करते हैं, दिनचर्या नियमित रखते हैं, वे बीमार कम पड़ते हैं और पड़ते भी हैं तो उनकी रोगनिरोधक क्षमता इतनी होती है कि वे शीघ्र ठीक हो जाते हैं।

आजकल एलोपैथिक दवाओं से रोग ठीक करने का सर्वत्र प्रचलन है किंतु रोगी की रोग प्रतिरोधक क्षमता कितनी कम होती जा रही है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एक रोग छोड़ता है, दूसरा आक्रमण कर देता है। अब डॉक्टर भी इस बात को मानते हैं कि एलोपैथिक दवाएं अपने पीछे लंबे समय तक चलने वाला घातक प्रभाव छोड़कर जाती हैं। एलोपैथिक दवाएं तब अपना और घातक प्रभाव छोड़ती हैं जब रोग का कारण और लक्षण जाने बिना उन्हें प्रयोग किया जाता है।

बुद्धिमानी इस बात में है कि कम से कम औषधियों का प्रयोग करें, वो भी उस हालत में जब रोग काबू के बाहर हो अर्थात संयम बरतने पर भी न दबाया जा सके। विद्वान चिकित्सकों का कथन है कि स्वस्थ होने वाले रोगियों के संबंध में यह दावे से नहीं कहा जा सकता कि वे मात्र दवाओं के प्रयोग से ही स्वस्थ हुए हैं।side effects of medicine

वस्तुत: प्रकृति हर रोग के निवारण में लगी रहती है और अधिकांश रोगी उसकी ही कृपा से अच्छे होते हैं, श्रेय औषधियों को मिल जाता है जबकि वास्तविकता यह है कि शरीर में पहले से ही रोग निरोधक क्षमता होती है। असंयम बरतने, कुपोषण अथवा कुछ मानसिक कारणों से यह जीवन शक्ति कम होती जाती है और व्यक्ति रोग की चपेट में आ जाता है।

Also Read:  Plants: ऐसे 5 स्पेशल पौधों जो घर की खूबसूरती को बढ़ा देंगे

असंयमित और अव्यवस्थित रहन-सहन अपनाने से शरीर में टूट-फूट होती है, वह रोग और कष्ट के रूप में दिखाई देती है। उचित यही है कि शरीर पर अनावश्यक भार डालना बंद कर थोड़ा विश्राम किया जाए और रूग्ण हुई पाचन प्रणाली को थकने से बचने के लिए या तो हल्के पदार्थों का सेवन किया जाए या उपवास जैसे तरीकों को अपनाया जाए।

सिर दर्द, जुकाम, बुखार जैसे साधारण रोगों में दवा लेकर रोग दबाने की जो उतावली मचाई जाती है, उससे तत्काल क्षणिक आराम भले ही मिलता हो, किंतु रोग और दवाओं की विषाक्ता मिलकर रोगी को एक प्रकार से सदा के लिए अपने चंगुल में फंसे रहने के लिए बाध्य करती है। छोटे-मोटे रोग इन दवाओं के कारण ही असाध्य रोगों में परिणित हो जाते हैं।

रोगों का उपचार तो होना ही चाहिए पर उनमें औषधियों का विशेषकर एलोपैथिक दवाओं का प्रयोग, रोग के असाध्य होने पर ही किया जाना चाहिए अन्यथा छोटे-छोटे रोगों में दवाएं लेकर शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को अनावश्यक नष्ट करने की उतावली जीवन के लिए महंगी पड़ सकती है। दवाएं जिन पदार्थों से निर्मित की जाती हैं, वे हमारे स्वाभाविक खाद्य नहीं हैं अन्यथा वे स्वस्थ रहने पर भी लिए जाते हैं।

उनमें प्राय: मानवी प्रकृति के प्रतिकूल तत्व ही अधिक रहते हैं, जो उन्मत हाथी की तरह अपनी और शत्रु की सेना का विनाश करते हैं। यह सत्य है कि दवाएं रोगाणुओं को मारती हैं पर जीवन रसों को भी हानि पहुँचाए बिना नहीं रहती। अत: आपत्ति धर्म की तरह यदि इनका उपयोग करना भी पड़े तो भी सीमित मात्रा और सीमित समय तक ही इनका सेवन करें।

Also Read:  Ai: एआई का गुलाम नहीं, मालिक बनाएं अपने बच्चों को

रोग की जड़े काटने के लिए उपवास, सीमित आहर, संतुलित एवं सुपाच्य भोजन ही आवश्यक है। आहार विहार का संयम और संतुलन अपनाकर यदा कदा वनौषधियों का सेवन करते रहकर कृत्रिम दवाओं से छुटकारा पाएं। -रमेश सारस्वत

कोई जवाब दें

Please enter your comment!
Please enter your name here