Experiences of Satsangis

Experiences of Satsangis: वाह भई! वाह! पुट्टर ऐसे ही होता है…!सत्संगियों के अनुभव पूजनीय बेपरवाह सार्इं शाह मस्ताना जी महाराज का रहमोकरम

पूज्य साई जी ने उस लड़के की उंगली पकड़ी हुई थी और दूसरी साइड में एक काफी लंबे कद के जिसकी काली दाड़ी थी एक और अजनबी पुरुष भी खड़ा था। उस पुरुष ने उस बालक की दूसरे हाथ की उंगली पकड़ी हुई थी। उस समय मैंने सार्इं जी से पूछा कि सार्इं जी, ये कौन है? तो सार्इं जी ने फरमाया कि ‘पुट्टर! आने वाले समय में ही पता चलेगा।’

जीएसएम अब्दुल रहमान शेर सय्यद इन्सां पुत्र शादी खान जी पैतृक गाँव हर्ष जिला सीकर (राज.) परंतु हाल आबाद शाह सतनाम जी पुरा जिला सरसा बेपरवाह मस्ताना जी महाराज की रहमत का इस तरह वर्णन करते हैं:-

सन् 1955-56 की बात है, पूजनीय बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज उन दिनों हमारे गाँव में प्रेमी गोपी गुज्जर के घर आए हुए थे। उस समय मैं करीब सात वर्ष का था। हमारा घर भी प्रेमी गोपी जी के घर के पास ही था। मैं अपने साथी बच्चों के साथ खेलता-खेलता उनके घर पर चला गया। सतगुरु-दाता की ऐसी रहमत हुई कि ईश्वरीय स्वरूप पूज्य सार्इं जी के प्रेम ने मानो मुझे पकड़ लिया। स्वयं साईं जी मुझसे प्रेममयी बातें करने लगे। एक लड़का वहाँ पर और भी था। वह गुज्जरों का लड़का था। सार्इं जी ने उसे भी मेरे पास बिठा लिया।

सार्इं जी ने अपनी कृपा से हम दोनों को नाम-शब्द भी बख्श दिया और साथ में ये वचन भी कर दिए कि ‘आने वाले समय में सरकार खुद नाम देगी, हम तो नाम का बीज बिखेर रहे हैं।’ पूजनीय सार्इं जी उसके बाद गुज्जर प्रेमी जी के घर भी तीन-चार बार पधारे। सार्इं जी वहाँ जब भी जाते तो कोई ना कोई लड़का भेज कर मुझे भी अपने पास बुला लेते। पूजनीय सार्इं जी मुझसे स्वयं अपने पास बिठा कर प्रेममयी बातें करते। मेरे सिर पर अपना पवित्र कर-कमल रखकर आशीर्वाद देते और मुझे प्रशाद देते और इसी तरह एक बार मुझे लड्डू भी खिलाए। सार्इं जी ने वहाँ पर गुज्जर भाईचारे के प्रेमियों को कहा कि इस लड़के को पर्दे से (ताकि इसके घर वालों को पता न चले) सत्संग पर ले आया करो।

साई जी ने मुझे समझाया कि तू घर में यह बोल दिया कर कि मैं जमात में जा रहा हूँ और तू फिर सरसा में डेरा सच्चा सौदा दरबार में सत्सँग पर आ जाया करना और सुमिरन करते रहना है। मालिक-सतगुरु की रहमत से मैं सतगुरु जी के हुक्मानुसार बहुत सुमिरन करने लगा और मेरा सुमिरन तेज गति से सफलतापूर्वक चलने लगा। उसी समय के दौरान एक रात बहुत गर्मी थी। मैं घर से बाहर आकर एक थड़े पर लेट गया।

उस रात निद्रा की अवस्था में मुझे बेपरवाह सार्इं मस्ताना जी महाराज के दर्शन हुए। उनके साथ बाल स्वरूप में अजनबी सा लड़का भी था, उसे मैंने पहले कभी नहीं देखा था। पूज्य साई जी ने उस लड़के की उंगली पकड़ी हुई थी और दूसरी साइड में एक काफी लंबे कद का जिसकी काली दाड़ी थी एक और अजनबी पुरुष भी खड़ा था। उस पुरुष ने उस बालक की दूसरे हाथ की उंगली पकड़ी हुई थी। उस समय मैंने सार्इं जी से पूछा कि सार्इं जी, ये कौन है? तो सार्इं जी ने फरमाया कि ‘पुट्टर! आने वाले समय में ही पता चलेगा।’

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तो वह समय भी आया तो मुझे पता चला कि वो साइड में खड़े स्वयं पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज ही थे और बीच वाला वह छोटा सा बालक खुद पूज्य हजूर पिता संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां थे लेकिन सच्चाई यह भी थी कि उस समय पूज्य हजूर पिता जी का जन्म भी नहीं हुआ था परंतु पूजनीय सार्इं जी ने उन्हें नन्हें बाल स्वरूप में मुझ को दिखा दिया था। यही मान लें कि मुझ पर स्वयं मेरे सतगुरु की रहमत थी। उस समय तीनों पवित्र बॉडियों के ही सफेद वस्त्र पहने हुए थे। तो तब सार्इं जी ने मुझ से कहा, पुट्टर तू सरसे आ जा।

तो मैंने अर्ज़ की कि सार्इं जी, मेरे पास तो किराये के पैसे ही नहीं हैं। तो मैं सरसा में कैसे आ सकता हूँ? इस पर सर्व-सामर्थ पूजनीय सार्इं जी ने उसी समय मेरे सामने मेरे सिरहाने के नीचे अढ़ाई रूपए रख दिए। जब मैं उठा तो सार्इं जी अदृश्य हो गए। यह अति अद्भुत व दिलचस्प नज़ारा मैंने उस रात अर्ध निंद्रा की अवस्था में उस सपने में ही देखा था। मैंने सिरहाने के नीचे देखा तो सचमुच ही दो सिक्के एक-एक रूपये वाले और एक सिक्का पचास पैसे का रखा हुआ था। उन्हीं दिनों में ही डेरा सच्चा सौदा सरसा में माहवारी सत्संग था।

गाँव की संगत ने मुझे भी अपने साथ ले लिया और सरसा दरबार की तरफ चल पड़ी। मेरे गाँव वाले मुझे कहने लगे कि तेरा किराया हम देंगे। मैंने कहा कि नहीं मैं अपना किराया खुद दूँगा। संगत के कुछ प्रेमियों ने मुझ से पूछा कि तेरे पास पैसे कहाँ से आ गए हैं। मैंने झूठ में कह दिया कि मैं घर से चोरी करके लाया हूँ।

तो जब हम सरसा दरबार में पहुंचे तो सार्इं जी तब तेरावास से बाहर ही विराजमान थे और हमें देखते ही कहने लगे, ‘वाह भई वाह! आ गए राजस्थान वाले।’ इसी बीच संगत ने पूज्य सार्इं जी की पावन हजूरी में मेरी शिकायत कर दी कि सार्इं जी, ये लड़का अपने घर से पैसे चोरी करके लाया है। दया-रहमत के दाता स्वयं सब कुछ जाननहार सतगुरु सार्इं जी मुझे मुखातिब करके बोले, ‘वाह भई वाह! पुट्टर ऐसे ही होता है! इसने तो डाका डाला है।’ पूज्य सार्इं जी बहुत ही खुश हुए और संगत को भी बेअंत खुशियाँ दी।

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डाके वाली बात का या मुझे पता था या स्वयं सार्इं जी को और किसी को क्या पता था। दूसरी दिलचस्प घटना यह थी कि पूजनीय सार्इं जी के हुक्मानुसार मैं अपने गाँव के दो अन्य लड़कों के साथ इकट्ठे बैठकर सुमिरन किया करता था। हमारा गाँव एक छोटी सी पहाड़ी पर था। उस दिन पूजनीय सार्इं जी ने मुझे स्वप्न में पहाड़ की ढलान पर बना एक गढ्ढा दिखाया और आदेश फरमाया कि इस गढ्ढे में बैठकर सुमिरन किया करें। वो गढ्ढा पहाड़ के ऊपरी हिस्से की तरफ था।

हम तीनों लड़के उस गढ्ढे में ही बैठकर सुमिरन किया करते। एक दिन कुछ शरारती लड़कों ने उस गढ्ढे में हमें देख लिया और वो लड़के हमें पत्थर मारने लगे। हमने उन्हें कुछ न कहा और चुपचाप अपने घरों को आ गए। कुछ दिनों बाद जब हम तीनों लड़के अपने गाँव की संगत के साथ सत्सँग पर सरसा दरबार में आए तो सार्इं जी हमें देखते ही बोले कि आ गए भई राजस्थान वाले। फिर हम तीनों लड़कों को इशारे से अपने पास बुलाया और हमें सबसे आगे यानि अपने मुहड़े के पास ही बिठा लिया। घट-घट की जाननहार पूज्य सार्इं जी ने हमें मुखातिब करके फमराया – ‘पुट्टर! पहाड़ के नीचे की तरफ जाकर सुमिरन किया करो। किसी को पता नहीं चलना चाहिए।’

उसके बाद फिर हम पहाड़ के नीचे की तरफ जाकर एक गड्ढे में बैठकर सुमिरन करने लगे। तो पूजनीय सार्इं जी के समय में मैं पांच साल तक साध-संगत के साथ लगातार सत्संग में आता रहा। पूजनीय सार्इं जी का मुझे यह हुक्म था कि तूने डेरा सच्चा सौदा की सेवा करनी है और इस दर को नहीं छोड़ना। सार्इं जी के वचनानुसार पूजनीय परमपिता जी के समय में ही अपना घर-बार, परिवार का मोह जाल आदि छोड़कर मैंने अपना तन-मन आदि सब कुछ डेरा सच्चा सौदा को समर्पित कर दिया और हुक्मानुसार जी.एस.एम. सेवादार के तौर पर सेवा करने लगा।

मालिक की दया-मेहर से मुझे सतगुरु जी की तीनों पातशाहियों की सोहब्बत नसीब हुई है। सतगुरु जी ने मुझे दिखा दिया कि तीनों पवित्र बॉडियां उसी एक ही मालिक का नूर हैं। सतगुरु जी के मौजूदा तीसरे प्रत्यक्ष स्वरूप पूज्य हजूर पिता जी के पवित्र चरणों में यही अरदास है कि हे सतगुरु! मेरा दृढ़विश्वास ऐसे ही बनाए रखना और सेवा-सुमिरन करते-करते ही ओड़ निभा देना जी।

सार्इं जी, ये लड़का अपने घर से पैसे चोरी करके लाया है। दया-रहमत के दाता स्वयं सब कुछ जाननहार सतगुरु सार्इं जी मुझे मुखातिब करके बोले, ‘वाह भई वाह! पुट्टर ऐसे ही होता है! इसने तो डाका डाला है।’ पूज्य सार्इं जी बहुत ही खुश हुए और संगत को भी बेअंत खुशियाँ दी। डाके वाली बात का या मुझे पता था या स्वयं सार्इं जी को, और किसी को क्या पता था।

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