कमला नेहरू कॉलेज में साइकोजेनेसिस Psychogenesis 26 : मानसिक स्वास्थ्य पर संवाद, संवेदनशीलता और समझ को मिला बढ़ावा
नई दिल्ली। (सच्ची शिक्षा न्यूज़) मानसिक स्वास्थ्य को समझने के लिए केवल समस्याओं पर चर्चा करना ही नहीं, बल्कि उन लोगों के अनुभवों को सुनना भी जरूरी है, जो इन चुनौतियों से गुजर चुके हैं। इसी सोच को केंद्र में रखते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय के कमला नेहरू कॉलेज के मनोविज्ञान विभाग ने 14 अक्टूबर 2026 को अपना वार्षिक विभागीय दिवस ‘साइकोजेनेसिस’26’ आयोजित किया।
कॉलेज की प्राचार्य प्रो. (डॉ.) पवित्रा भारद्वाज के नेतृत्व में हुए इस कार्यक्रम की थीम ‘लिव्ड एक्सपीरियंसेज हर्ड : रियल वॉइसेज, रियल चेंज’? रही। इसका उद्देश्य मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाना, इससे जुड़े सामाजिक पूर्वाग्रहों को कम करना और वास्तविक जीवन के अनुभवों को महत्व देना था।
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सहानुभूतिपूर्ण संवाद से मिल सकती है भावनात्मक मजबूती
कार्यक्रम में एम्स, नई दिल्ली की क्लिनिकल साइकोलॉजी की प्रोफेसर डॉ. रचना भार्गव ने मुख्य वक्ता के रूप में ‘वॉइसेज दैट मैटर’ विषय पर अपने विचार रखे। दो दशकों से अधिक के पेशेवर अनुभव के आधार पर उन्होंने मानसिक तनाव के संकेतों को पहचानने, दूसरों की बात ध्यान से सुनने और मानसिक स्वास्थ्य पर सहजता से बातचीत करने की आवश्यकता बताई। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि संवेदनशीलता और सहानुभूति से किसी व्यक्ति को अपनी भावनाएं साझा करने के लिए सुरक्षित माहौल मिल सकता है।
व्यक्तिगत अनुभवों ने दिखाई स्वीकार्यता की अहमियत
कार्यक्रम में आयोजित पैनल चर्चा में मनोरथी फाउंडेशन की संस्थापक डॉ. मोना शर्मा, शांति सहज ट्रस्ट की संस्थापक सुश्री राजेश्वरी और शक्ति शालिनी से जुड़ी मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. दिव्या कुमार ने भाग लिया। चर्चा में विभिन्न आयु वर्गों के लोगों के लिए आपसी सहयोग और समझ के महत्व पर विचार साझा किए गए।
सिजोफ्रेनिया के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए काम कर रहीं सुश्री राजेश्वरी ने परिवार में स्वीकार्यता और सकारात्मक दृष्टिकोण की भूमिका पर प्रकाश डाला। उनकी बेटी मधु ने अपने जीवन के अनुभव साझा किए, जिनमें संघर्ष के साथ साहस और उम्मीद का संदेश भी शामिल था।
व्यक्ति को उसकी समस्या से अलग पहचानना जरूरी
बाल कल्याण समिति की पूर्व अध्यक्ष डॉ. दिव्या कुमार ने चर्चा के दौरान बताया कि कई बार संस्थागत प्रक्रियाओं और बीमारी के निदान पर अधिक ध्यान देने के कारण व्यक्ति के वास्तविक अनुभव पीछे छूट जाते हैं। एक केस स्टडी के माध्यम से उन्होंने समझाया कि किसी व्यक्ति को केवल उसकी समस्या या निदान के आधार पर नहीं देखना चाहिए, बल्कि उसकी परिस्थितियों, भावनाओं और व्यक्तिगत अनुभवों को भी समझना चाहिए।
चर्चा का सार एक महत्वपूर्ण संदेश में सामने आया—पहले समस्या के पीछे मौजूद व्यक्ति को समझें, फिर समस्या पर ध्यान दें। यह दृष्टिकोण मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े लोगों के प्रति अधिक मानवीय और संवेदनशील व्यवहार अपनाने की प्रेरणा देता है।
तस्वीरों के माध्यम से अनुभवों की अभिव्यक्ति
कार्यक्रम में अंतरमहाविद्यालयी ‘फोटोवॉइस प्रतियोगिता’ भी आयोजित की गई। इसके माध्यम से विद्यार्थियों को तस्वीरों के जरिए अपने विचारों और जीवन के अनुभवों को रचनात्मक रूप से व्यक्त करने का अवसर मिला। इस गतिविधि ने मानसिक स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण विषय पर आत्मचिंतन और अभिव्यक्ति के लिए एक अलग मंच प्रदान किया।
विद्यार्थियों और शिक्षकों के सामूहिक प्रयास से सफल आयोजन
कार्यक्रम का समन्वय प्राचार्य प्रो. (डॉ.) पवित्रा भारद्वाज के मार्गदर्शन में मनोविज्ञान संघ की संयोजक प्रो. (डॉ.) मनदीप कौर अरोड़ा और सुश्री संजना चौधरी तथा छात्र संघ की अध्यक्ष धान्या सिंह और उनकी टीम ने किया। आयोजन को हार्ट आउट, मोंगिनिस (फूड पार्टनर), साइकोस्टोरइको (गिफ्टिंग पार्टनर) और ‘सच कहूँ’ तथा ‘सच्ची शिक्षा’ (मीडिया पार्टनर) का सहयोग मिला।
‘साइकोजेनेसिस’26’ ने यह संदेश दिया कि मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता केवल जानकारी देने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। लोगों की बात सुनना, उनके अनुभवों का सम्मान करना और बिना पूर्वाग्रह के उन्हें समझने का प्रयास करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जब वास्तविक आवाजों को सुना जाता है, तभी संवेदनशीलता, स्वीकार्यता और सार्थक बदलाव की राह मजबूत होती है।

































































