Experiences of Satsangis: बस कर! तू क्या समझता है! -सत्संगियों के अनुभव-पूजनीय बेपरवाह सार्इं शाह मस्ताना जी महाराज का रहमोकरम
सचखण्डवासी प्रेमी गोबिंद मदान, सरसा शहर से पूजनीय शाह मस्ताना जी महाराज के एक अलौकिक करिश्में का वर्णन इस प्रकार करता है-
सन् 1959 की बात है, शहनशाहों के शहनशाह मस्ताना जी ने मुझे किसी काम के लिए दिल्ली भेजा। उस वक्त दिल्ली में जो प्रेमी रहते थे, उनका शहनशाह मस्ताना जी से बेमिसाल प्रेम था। जब भी कोई प्रेमी भाई उनको मिलता तो वे उसे सतगुरु की कथा-कहानियाँ सुनाते और सतगुरु का गुणगान करते रहते।
मैं उन सबको एक-एक करके मिला तो उन्होंने मुझे कुल मालिक सतगुरु बेपरवाह मस्ताना जी महाराज की बातें पूछ-पूछ कर मेरी होश भुला दी। उनमें से हर कोई मुझे अपनी तरफ खींचता और अपने घर ले जाता। इस प्रकार आठ दिन निकल गए। मैंने दिल्ली के प्रेमियों को कहा कि मुझे आठ दिन हो गए हैं, मुझे वापिस जाने दो। वो बड़े प्रेम से मुझे विदा करने के लिए बस स्टैंड पर आए और मुझे बस में बैठाकर गए। मैं आठ दिन अच्छी तरह सो भी नहीं पाया था। बस में बैठते ही थोड़ी देर बाद मेरी आँख लग गई।
जब मेरी आँख खुली तो उस वक्त मैं दिल्ली से काफी दूर आ चुका था। मुझे एकदम ख्याल आया कि मैं जिस काम के लिए दिल्ली गया था, वह काम तो भूल ही गया हूँ। अब शहनशाह जी मेरे से नाराज होंगे, मेरा क्या बनेगा। मैं डर रहा था। आज तक शहनशाह जी मुझसे कभी गुस्सा भी नहीं हुए थे। मैंने बहुत बड़ी गलती कर दी है। देखो, अब क्या होता है? मेरा मन अंदर से बोल रहा था कि अगर शहनशाह जी मुझसे गुस्सा हुए तो मैं अपने घर चला जाऊंगा। मुझसे यह फकीरी नहीं होती। इस तरह मन तरह-तरह की दलीलें देता रहा। जैसे-जैसे सरसा दरबार नजदीक आ रहा था मुझे अंदर से भय भी सता रहा था।
मैं सरसा बस स्टैंड से डेरा सच्चा सौदा दरबार (शाह मस्ताना जी धाम) की ओर जा रहा था। मेरे मन ने एक नई दलील दी। मेरा मन बोला कि शहनशाह मस्ताना जी तो भोले फकीर हैं। उन्हें आठ दिन पहले की बात किधर याद होगी। जाकर सार्इं जी से खुशियां लेकर दिल्ली की दो-चार बातें सुनाऊंगा। मन ने मुझे हौंसला दिया कि फिक्र न कर, तेरी क्या गलती है कुछ नहीं होगा। मैं डरता, घबराता हुआ डेरा सच्चा सौदा में पहुंचा।
उन दिनों में डेरा सच्चा सौदा का बड़ा गेट अक्सर बंद रहा करता था और उसके बीच बनी हुई छोटी खिड़की खुली हुई थी। सर्वसामर्थ सतगुरु जी दरबार के कमरा नं. 50 के आगे एक नीम को छोड़कर दूसरी बड़ी नीम के नीचे मूढ़े पर विराजमान थे। उनका सुंदर मुखड़ा मेन गेट की तरफ था। जैसे ही मैंने अपना सिर खिड़की के अंदर से निकाला तो सार्इं जी ने मुझे सामने से देख लिया। शहनशाह जी ने फरमाया ‘आ जा शेर आजा।
मैं डरता-डरता चोरों की तरह आहिस्ता-आहिस्ता कदम रखता हुआ कुल सृष्टि को बनाने वाले सतगुरु की हजूरी में नत्-मस्तक हुआ और ‘धन धन सतगुरु तेरा ही आसरा’ का नारा लगाया। शहनशाह जी ने पहला ही सवाल किया ‘दिल्ली की बात बता।’ मैं तो मन में तैयार होकर आया था कि दिल्ली की बात सुनाऊंगा और पूज्य सार्इं जी का ख्याल पलटने की कोशिश करूंगा कि उधर दिल्ली वाले काम की तरफ ध्यान ही न जाए। मैंने बोलना शुरु किया कि सार्इं जी! अमेरिका का प्रैजिडेंट दिल्ली में आना था। राष्टÑपति भवन में 64000 रुपए में बिजली की लाइटें लगाने का ठेका हुआ।
पार्लियामेंट हाऊस में लाइटें लगाने का काफी खर्च हुआ। सरकार की बड़ी-बड़ी बिल्डिंगों पर बहुत ज्यादा लाइटें लगी हुई थी। दिल्ली शहर लाइटों से चमक रहा था। मैंने अभी इतना ही बोला था कि शहनशाह जी ने अपना सुंदर नूरी मुखड़ा ऊपर मेरी तरफ करते हुए रौब भरी नज़रों से देखते हुए कड़कती आवाज़ में फरमाया, ‘बस कर! तू क्या समझता है, जहाँ से तूं बातें सोच-सोच कर निकाल रहा है, क्या मस्ताना उससे भी नीचे रहता है। खबरदार! तूने यह पहली बार गलती की है। इसलिए तेरे को छोड़ते हैं। सुबह दिल्ली चला जा और वो काम करके फिर शक्ल दिखाना। खबरदार! दोबारा कभी ऐसी गलती की तो।’
सतगुरु घट-घट व पट-पट की जानने वाला होता है। उससे कुछ भी छिपाया नहीं जा सकता। जैसे कांच के गिलास में कोई चीज़ हो तो वह बिल्कुल साफ नज़र आती है। इसी प्रकार सतगुरु अपनी दिव्य-दृष्टि से इन्सान के अंतर-हृदय में झांक कर उसका सब कुछ देख लेता है। जो जीव अपने सतगुरु से जान-बूझकर कोई बात छिपाता है वह सतगुरु की खुशियों व रहमतों से हमेशा महरूम रहता है। सतगुरु का प्रेम पाने के लिए अंदर की सफाई व सच्चाई अति जरूरी है और सब मकर-चक्कर व चतुराई छोड़नी पड़ती है।
जैसे परम पूजनीय परमपिता शाह सतनाम जी महाराज ने ‘पारस दी वट्टी’ के एक भजन में भी लिखा है:-
इह ऐडा भोला ख़सम नहीं, जो मकर चलित्र ना जाने।
इहदे घर विच उही वस सकदी, जो सब चतुराइयां भुल्ल जावे।।


































































